Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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राजनगर में हजरत मामू भाणेज की दरगाह

April 3rd, 2015 · इतिहास के पन्नो से

मामू भाणेज की दरगाह:

राजनगर के पुराना किला के पास ही में मामू भाणेज की दरगाह है | मामू भाणेज की दरगाह भी लगभग चार सौ साल पुरानी हैं, राणा राजसिंह जी के जमाने की | ये एक तरह से स्थानिय पीर हैं, जिनकी यहां के मुस्लिम समुदाय में बहुत ही मान्यता हैं और सम्मान है | ये दरगाह मुस्लिम समुदाय का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है | मामू भाणेज की कब्र पर लोग बहुत से गुलाब के फूल आदि चढ़ाते हें | कई लोग यहां मन्नत मांगते हें और मन्नत पूरी होने पर फिर सजदे में सिर झुकाने के लिये यहां आते हैं | अक्सर शुक्रवार को यहां अच्छी खासी भीड रहती हैं | वर्ष में एक बार तीन दिवसीय उर्स के मेले का भी यहां आयोजन होता है, बहुत से अच्छे अच्छे कव्वाल और गायक कलाकार यहां अपनी प्रस्तुतियां देते हैं |

मामू भाणेज की दरगाह

मामू भाणेज

मामू भाणेज की दरगाह तक कैसे पहुंचेः

राजनगर हुसैनी चौक से होते हुए जब हम राजनगर बस स्टेन्ड की तरफ जाते हैं, तो थोडा आगे बढ़ते ही सीधे हाथ की तरफ उपर घाटी की तरफ रास्ता जा रहा हैं, सुविधा के लिये मार्ग सूचक बोर्ड भी लगाया हुआ हैं | पैदल या दु पहिया वाहन से यहां जाया जा सकता हैं | चढ़ाई के थोडा उपर जाकर हमें अपने दुपहिया वाहनों को सडक के आखिरी छोर पर खडा करके थोडा पैदल जाना होता हैं | लगभग आधा कि.मी. उबड खाबड रास्ते पर पैदल चलने के बाद हम मामू भाणेज की दरगाह तक पहुंच सकते हैं, यहीं पास में राजनगर का पुराना किला और अन्नपूर्णा माताजी का मंदिर भी है | यहां जाने का एक दूसरा रास्ता भी है जो सेवाली मुख्य हाई वे की तरफ से उपर की ओर आता हैं | यहां से राजनगर और काकंरोली की आबादी और राजसमन्द झील के बडे ही मनोहारी दृश्य देखे जा सकते हैं, और हां यहां के सुर्यास्त के दृश्य की तो बात ही कुछ और हैं |

 

मामू भाणेज की दरगाह का एतिहासिक महत्वः

कहते हैं की राजसमन्द और राजनगर के संस्थापक राणा राजसिंह जी के जमाने की बात थी | राणा राजसिंह जी का राजमहल या ये किला उन्होने अपने लिये बनवाया था, वे यहां भी रहते थे और कभी कभार प्रवास भी करते थे, वो जमाना कुछ और था कोई किसी एक जगह पर हमेशा के लिये बस नहीं सकता था | उनके राजमहल मे कई सारी सुविधाएं थी जेसे मंदिर, कुआं रहने के लिये स्थान आदि | वे कुछ समय के लिये अपने परिवारजनो और सेनिकों के साथ किसी अन्य जगह पर चले गये | उससे पहले उन्होने ये महल की देखरेख की जिम्मेदारी पुरोहित पंडितो को दी, और वे चले गये | कुछ समय बाद जब वे फिर से यहां वापस आये तो पुरोहित पंडितो आदि नें ये स्थान पर उन्हें कब्जा देने के लिये मना कर दिया | राजपूत सेनिक और सिपहसालारों नें भी राणा जी को ये कह कर मना कर दिया की वे पुरोहित ये पंडितो पर तलवार नहीं चला सकते, क्यूं की वे यदि ए॓सा करते हैं तो उन्हें ब्रह्म हत्या का पाप लगेगा | राणा राजसिंह जी भी हिम्मत के धनी थे और एक बार जो ठान लेते वो कर के ही रहते थे | उन्होने पडौसी राजाओ से मदद ली, जिसमें कुछ मुस्लिम लडाके सैनिक भी थे, वे सभी राणा राजसिंह जी को अपना राजमहल वापस दिलाने की जंग मे लडे | इसी सेनिक टुकडी में एक मामा भान्जे की जोडी भी थे | वे दोनों बडी वीरता से लडे और अन्त में यहां शहीद हुए |

 

फिर ये जगह बहुत समय से उपेक्षित पडी रही, और दशकों बाद एक मुस्लिम संत को स्वप्न में ये बात पता चली की यहां इतने बडे सूरमा [Read more →]

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द्धारिकाधीश मंदिर में हवेली संगीत समारोह

March 20th, 2015 · उत्सव एवं त्योहार

कांकरोली का द्धारिकाधीश मंदिर अपनी बहुत सी अच्छी बातों और रिवाजों के लिये जाना जाता हैं यहां के दर्शनों कि झांकिया और मंदिर के अनेकानेक दर्शन और कार्यक्रम जनमानस में बडे ही प्रसिद्ध हैं | साथ ही यहां दर्शनों के दौरान होने वाले कीर्तन जो कि यहां के परम्परागत कीर्तनकार या कीर्तनिया जी किया करते हैं, वे बडे ही अच्छे लगते हैं | मंदिर का शांत व श्रद्धापुर्ण वातावरण, यहां प्रभू के दर्शन, चहुं और धूप दीप की सुगंध, पखावज की थाप, हारमोनियम की स्वरलहरियां, और कीर्तनकारों की विशेष हवेली संगीत से सराबोर गायनशैली, आने वाले हर एक श्रद्धालु दर्शनार्थी के मन पर अमिट छाप छोडती हें | वैसे भी पुष्टिमार्गीय संगीत परम्परा में हवेली संगीत का विशेष महत्व हैं |

काकंरोली में कल ही 19-03-2015 को शाम द्धारिकाधीश मंदिर में हवेली संगीत समारोह का आयोजन किया गया था जो कि राजस्थान ब्रजभाषा अकादमी जयपुर और श्री द्धारिकेश राष्ट्रीय साहित्य परिषद के तत्वावधान में आयोजित था | यहां बडोदा से पधारे मंदिर के खास कीर्तनकार भगवती प्रसाद जी गंधर्व, कामां मथुरा से आये दो गायक और स्थानीय कलाकारों नें अपनी गायन शैली की प्रस्तुतियां दी | हवेली संगीत समारोह में कीर्तन के दौरान साजिन्दे भी बडे ही दक्ष थे, मृदंग, पखावज, मंझीरें, और हारमोनियम, बस सिर्फ गिने चुने वाध्ययन्त्रों पर कौशल से ही वे आने वाले हर एक दर्शक को मुग्ध कर देने में सफल रहे | फिर सभी कलाकारों का सम्मान भी किया गया | इन सभी में मुझे भगवती प्रसाद जी गंधर्व की प्रस्तुति दिल को छू लेने वाली लगी | उम्मीद करता हूं ए॓से बहुत से हवेली संगीत से जुडे कार्यक्रम यहां भविष्य में भी होते रहें |

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कांकरोली राजसमन्द का महाशिवरात्री त्यौहार

February 17th, 2015 · उत्सव एवं त्योहार

महा शिवरात्री का त्योहार सभी जगहों पर बडी धूमधाम से मनाया जाता हैं पर हमारे राजसमंद में इस दिन कुछ विशेष ही आलम रहता हैं | कांकरोली में भी बहुत से शिव मंदिर हैं और इस दिन तो शिवजी की पूजा और दर्शन की बडी विशेष महत्ता है | सो हजारों में दर्शनार्थी यहां के शिवमंदिरों में जाते हैं | पुष्प, मालायें प्रसाद आदि चढ़ायें जाते हैं और लोग सपरिवार दर्शन करने जाते है | इसी दौरान प्रसाद, आरतीयों और भजन मंडलियों में भी श्रोताऔं को बडा ही लुत्फ मिलता हैं | कुछ लोग शिवजी का हरा वाला प्रसाद भी ग्रहण करते हैं, दर्शनों हेतु पैदल जाते हैं और इसी बहाने पिकनिक भी हो जाती हैं |

shivratri

Maha Shivratri

राजसमंद जिले में अनेकों शिव मंदिर हैं पर उनमें से कुछ प्रमुख यहां सुचीबद्ध हैं ‍

गुप्तेश्वर महादेव, कांकरोली
चौमुखा महादेव, जलचक्की कांकरोली
विशम्भर महादेव, पुरानी कलेक्ट्री परिसर, राजनगर
रामेश्वर महादेव, राजनगर
कुन्तेश्वर महादेव या फरारा महादेव, फरारा गांव, राजसमंद
कु्भंलगढ़ में नीलकन्ठ महादेव मंदिर, केलवाडा
परशुराम महादेव मंदिर, केलवाडा
महामंगलेश्वर महादेव, मातृकु्ंडिया
आन्जनेश्वर महादेव, आन्जना
भूतेश्वर महादेव, भूतगिरि जी बावजी का आश्रम, सोनियाणा
हरकुन्डेश्वर महादेव, स्टेशन रोड, काकंरोली
रघुकुलेश्वर महादेव, जे.के. टायर फेक्ट्री, कांकरोली
वेवर महादेव, चन्द्रभागा नदी तट, आमेट

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कु्ंभलगढ़ हेरिटेज वाँक

February 5th, 2015 · उत्सव एवं त्योहार, कुंभलगढ़

कु्ंभलगढ़ हेरिटेज वाक:

कु्ंभलगढ़ किले को पर्यटन के लिहाज से और भी ज्यादा समृद्ध करने के लिये कु्ंभलगढ़ हेरिटेज वाँक का कार्यक्रम जिला प्रशासन और राजस्थान के पर्यटन विभाग ने चालू किया हैं | लगभग साल के अतं में ये आयोजन किया जाता हैं ‌| कु्ंभलगढ़ दुर्ग की प्राचीर पर रजिस्ट्रेशन से कुछ प्रतियोगियों को चुना जाता हैं को वहां वाक करते हैं, चलते हैं | इसके लिये पहले से रजिस्ट्रेशन करवाना अनिवार्य होता हैं | इसी क्रम में यहां सांस्कृतिक कार्यक्रमों और नृत्य, गायन आदि के भी आयोजन होते हैं |

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बच्चन जी की मधुशाला में से व्यंग्य

October 18th, 2014 · हास्य

अभी कुछ रोज से में हरिवंश राय बच्चन जी की मधुशाला को फिर से पढ़ने सुनने लग गया था, हरिवंश राय जी ने मधुशाला को लिखा ही इतनी तबीयत से है कि कोई भी इसका मुरिद बने बगैर नहीं रह सकता हैं | यू ट्युब पर बडे ही जोरदार विडियो हैं, कुछ मन्ना डै के गाये हुए, कुछ अमिताभ जी के पर हैं सभी एक से बढ़ कर एक |

पर क्या है कि इन्हीं पक्तियों को पढ़ते पढ़ते आज के माहौल के संदर्भ में एक बात याद आ गई | बरसों पहले लिखी कविता और आज के शहरों के बाजारों में बहुत समानताएं हैं |

तो हरिवंश राय बच्चन कि मधुशाला का एक अंश इस प्रकार है किः

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला,
‘किस पथ से जाऊँ?’ असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ
‘राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।’।

हमारी सरकार को चूंकि शराब से एक बहुत बडे हिस्से में राजस्व प्राप्त होता है तो आजकल गली गली में, हर सडक पर इतनी मधुशालाएं खुल चुकी है कि पूछो मत | बस आप तो अपने गांव या शहर की एक सडक को पकड लो और चलते चलो, मधुशाला आपको मिल ही जायेगी, इस बात की गारंटी है मियां |

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