Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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नाथद्धारा की महिला संत भूरी बाई “अलख”

January 15th, 2017 · शख्सियत

नाथद्धारा की संत भूरी बाई अलख:

संत भूरी बाई

संत भूरी बाई

मेवाड में यूं तो अनेकानेक संत महत्माओं नें जन्म लिये पर उनमें से महिला संत महात्माओें में भूरी बाई अलख का विशेष महत्व है | उन्हें मेवाड की दूसरी मीरा कहा जाता हैं | 1949 में वे एक सुथार खाती परिवार में जन्मी थी, जन्मस्थान था लावा सरदारगढ़ जो कांकरोली से पन्द्रह किलोमीटर की दूरी पर हैं | वे बहुत अल्पशिक्षीत थी | वे मेवाड के चतुर सिंह जी बावजी महाराज को बहुत मानती थी | छोटी आयु में उनका विवाह नाथद्धारा के एक प्रोढ़ धनी चित्रकार फतेहलालजी से हुआ | अपने छोटे से वैवाहिक जीवनकाल में उन्होने बहुत समस्यायें देखीं | उनके पति ज्यादा जीये नहीं और वे विधवा हो गयी |

गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी उन पर भक्तिभाव और आध्यात्म का बहुत गहरा असर था | साधना भक्ति और संसार में रहते हुए भी संसार से विरक्ति की भावना के कारण ही उस समय बहुत से लोग उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाये , लोग उनके पास आते बैठते, गंभीर विषयों पर चर्चाएं करते पर भूरी बाई का चुप रहने पर ही विशेष जोर था | भूरी बाई कहती चुप हो जाओ, सारे सवालों के जवाब स्वतः ही मिल जायेंगे | संत भूरी बाई से उस समय की बडी गुणी हस्ती थी स्वयं ओशो रजनीश जैसे दार्शनिक व चिंतक भी उनसे मिले थे | संत भूरी बाई बातें मेवाडी भाषा में ही करती थी व बडी से बडी बात कम शब्दों में ए॓से कह जाती थी कि बस सुनने वाले सुनते ही रह जाते थे |

उन्होने कहा है किः

चुप साधन चुप साध्य है,
चुप चुप माहि समाय |
चुप समज्या री समझ है,
समज्या चुप व्हे जाय ||

चुप ही साधन व साध्य हैं , चुप चुप में समाता हैं , चुप समझने वालों की समझ हैं और जो समझे वो चुप हो जायें | आज भी उनकी हर तस्वीर या मुर्ति के पास लिखा “चुप” हमें बहुत ही शातं भाव से चुप हो जाने की प्रेरणा देता हैं | वाकई चुप रहने में बहुत सार वाली बात हैं |

संत भुरी बाई का गिलहरी, पक्षीयों, कु्त्ते सहित अन्य जीव जानवरों से बहुत प्रेम था, कहते हैं कि उनके आश्रम में चाय हमेशा बनती ही रहती थी , लोग बडे भक्ति भाव से उनके पास आते , बैठते | महात्मा भूरी बाई को ‘अलख’ नाम किसी महात्मा संत नें भाव से अभिभूत होकर दिया था। उन्ही नें एक बार कहाः

बोलना का कहिए रे भाई
बोलत बोलत तत्त नसाई।
बोलत बोलत बढै विकारा
बिन बोले का करइ बिचारा।।

उनके नाम पर बहुत से जन सेवा हेतु संस्थाएं चल रही हें जिनमें से उदयपुर की ‘‘अलख नयन मंदिर नेत्र संस्थान’’ उल्लेखनीय है, ये संस्था ग्रामीण क्षेत्रों में नेत्र-चिकित्सा हेतु चिकित्सा शिविर आयोजित करती है व जनता की सेवा कर रही है।  [Read more →]

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नोटो की माया

November 12th, 2016 · राजसमन्द जिला

वाह मोदी जी, वाह

मजे आ गये उन सबको जिनको रुपयों से भयंकर लालच था | पैसा पैसा ना रहा, क्या दिन आया हैं, जिनके पास कम है वे राहत की सांस ले रहे हैं और जो बोरे के बोरे भर के बैठे थे वे एक ही चाल में पटकनी खा गये | एक एक शहर से करोडों रुपयों का काला धन बाहर आएगा और जो मझले छोटे नोकरीपेशा या व्यापारी लोग हैं उनको डरने की जरुरत ही नहीं हैं | पचास दिन के तय समय में जाओ और जमा करा दो अपने अपने खातों में |

काश 500-1000 के नोटों पर भी एक्सपायरी डेट होती, पैसा भारत के विशाल मार्केट में बहता  | छोटे गरीब मजदूर, महिलायें, उनकी हम सभी मदद करे, उनको खुल्ले दे दे, अपने तो खाते में जमा करवा सकते हैं हैं पर वे लोग जिनके बेंक खाते नहीं है और परेशान हो रहे हैं उनकी मदद करे व देश के अच्छे नागरिक की तरह अफवाहों पर ध्यान न दें |

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इस बार मानसून मेहरबान रहा राजसमन्द पर

August 29th, 2016 · राजसमन्द जिला

मानसून इस साल राजसमन्द पर मेहरबान रहा हैं और कहा जा रहा है कि औसत से थोडी ज्यादा ही बारिश हुई हैं | वैसे तो राजसमन्द झील में पानी तभी अच्छा आता हैं जब चारभूजा या कुंभलगढ़ इलाके में तेज वर्षा हो | बाघेरी का नाका में भी कुछ रोज पहले तक चार फीट तक का ओवरफ्लो हो रहा था अभी ये एक या सवा फीट हो कर चल रहा हैं | तो बात चल रही थी राजसमन्द झील की, ये अपने आप में एक अनोखी झील हैं और

राजसमन्द झील से जुडी कुछ पुरानी यादेः

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ये दो फोटो सन 1973 के आसपास समय की हैं जब हमारा राजसमन्द तालाब फुल हुआ था | बुजुर्ग लोग अब भी वे किस्से सुनाते नहीं थकते जब वे झील के ओवरफ्लो को देखने के लिये आये थे |

ब्रिटिश राज में इम्पीरियल एयरलाइन्स के जहाज

ब्रिटिश राज में इम्पीरियल एयरलाइन्स के जहाज

ये फोटो है देश की आजादी से पहले का जब हमारे राजसमन्द झील में पानी के हवाईजहाज उतरा करते थे | ब्रिटिश राज में इम्पीरियल एयरलाइन्स के जहाज माल व लोगों को लाने ले जाने के काम आते थे | कहते हैं कि तब उदयपुर का हवाईअड्डा भी अस्तित्व में नहीं था |

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पानी बिन सब सून

July 7th, 2016 · राजसमन्द जिला

पानी की कमी

पानी की कमी

हमारी वेबसाइट के एक पाठक ने हमें अ‍पने गांव की समस्या से रूबरू करवाया हैं | उनका नाम है नरेन्द्र सिंह राजपूत और वे पीपरडा राजसमन्द से हैं | उन्होनें हमें पत्र लिखा हैं वो इस प्रकार हैः

राजसमन्द में आज भी बहुत ऎसे गांव हे जहाँ नल की सुविधाएं नहीं हे | जिस में मेरा गाँव भी हे | मेरा गाँव पीपरडा पोलिकाकर है जहाँ ना तो नल लाइन हे नहीं सरकारी बोरवेल | पीने का पानी भी एक प्राइवेट बोरवेल हे, जहाँ से पीने का पानी लाना पड़ता हे कभी वो बोरवेल ख़राब होजाता हे तो टेंकर मंगवाना पड़ता हे ज़िला अधिकारी से विनीती हे आप नल लाइन हमारे गांव में लगवाने का कष्ट करे, धन्यवाद |

तो नल या जलदाय विभाग से जो भी सज्जन ये पावर रखते हें, वे कृपया मदद करें |

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कांकरोली में नशेखोरी पर लगाम कसनी होगी

June 3rd, 2016 · उलझन

कांकरोली में नशेखोरी पर लगाम कैसे कसी जाये :

राजसमंद का कांकरोली वैसे तो बडा ही शांत कस्बेनुमा शहर हैं, पर यहां विगत कुछ समय से नशेखोरी की समस्या बढ़ती ही जा रही हैं खास कर के युवाओं में | पता नहीं कौन लोग केसे बडी सुलभता से इन्हें नशे के साजो सामान उपलब्ध करा देते हैं कि जहां सुनसान देखो वहीं ये नशेखोर दिखाई दे जाते हैं, पान गुटखा, बीडी सिगरेट तो ठीक है पर शराब, गांजा, चिलम पीना, नशे की दवाइयां गोलीयां व इंजेक्शन लेना और पन्नीयों से पता नहीं क्या क्या करना ………….. क्या यहां का युवा वर्ग पूरी तरह से भटक चुका हैं ?

नशेखोर

कहीं कहीं गांवो में तो महिलाएं भी गुटखे बीडी तम्बाकु और शराब तक का सेवन कर रहीं हैं जो कि गलत हैं |

सरकार को इन पर पूरी तरह से लगाम कसने के लिये बार बार दबिश दे दे कर के इनके आकाओं और नशेखोरों को भी पकडना होगा व उन्हे ठीक करने के प्रयास करने होंगे | कांकरोली शहर की शांति को बनाये रखने के लिये ये बहुत जरुरी हो चुका हैं |

नशे की ललक में ये मूरख नशेडी किसी सीधे साधे व्यक्ति की कार के कांच फोड कर सामान चुरा रहे हैं तो कहीं बेंक के बाहर घात लगाकर बैठे हैं व किसी का बैग ले भाग रहे हें, या शहर की महिलाओं की चेने खींच के परेशान कर रहे हैं |

आम शहरी लोगों की तो हालत ए॓सी ही कि पुलिस के जवानों को वैसे ही कहीं देख ले तो उनका गला सूख जाता हें, वे बेचारे कहां शिकायत करे, किसको कहें और कोई थोडी हिम्मत दिखा के शिकायत करने पहुंच भी जाते हें तो किसी किसी के साथ तो ए॓सा बर्ताव किया जाता हैं कि वे खाकी कोट से तौबा ही कर लेते हें कि [Read more →]

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