Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

Rajsamand District, Rajasthan header image 1

काकंरोली राजसमन्द में पुस्तकालय, लाईब्रेरी

April 26th, 2018 · कांकरोली, राजसमन्द जिला

काकंरोली राजसमन्द में पुस्तकालय  लाईब्रेरी:

चौंक गये ना | पर सही बात है, काकंरोली शहर में अभी कोई पुस्तकालय या पब्लिक लाईब्रेरी नहीं हैं | बहुत पहले लगभग 30 वर्ष पहले शहर में रोटरी और लायन्स क्लब बडे प्रसिद्ध हुआ करते थे, बडे बिजनस मेग्नेट, व्यवसायी लोग आपस मे जानपहचान बढ़ाने, मनोरर्जन और समाज सेवा आदि के लिये इन क्लबों के मेम्बर बनते थे | और ये क्लब कुछ ना कुछ जनसेवा के कार्य करवाते रहते थे जेसे गरमी में पानी की प्याउ, आदि | इन्ही में एक पब्लिक लाईब्रेरी को चलाये रखने का कार्य भी हुआ करता था |

sambodhan

A Book : sambodhan

मुझे याद हे बचपन में बालकृष्ण विधा्भवन स्कूल में एक नियत समय के लिये पब्लिक लाईब्रेरी खुलती थी जहां शहर के लोग फुरसत निकाल कर आया करते थे | मनोरंजन के साधनों की कमी थी, अखबारों, पत्र पत्रिकाओं से ही सारी आवश्यक जानकारीयां मिला करती थी | फिर कुछ समय बाद बस स्टेंड पर पालीवाल मार्केट के यहां , दूसरी मंजिल पर वो पब्लिक लाईब्रेरी या पुस्तकालय चला करता था | और कहते हेँ कि नगरपालीका या पंचायत समिति के तो टेबल कुर्सी आदि होते थे और क्लब पुस्तकों अखबारों आदि कि व्यवस्था कर दिया करता था | ए॓से सहयोग से ये कार्य किया जाता था | बहुत पहले राजनगर में भी एक पुस्तकालय संचालित हुआ करता था, पर अब कहां |

द्धारिकाधीश मंदिर का पुस्तकालयः सालों से ये पुस्तके आम लोगों के देखने पढ़ने के लिये उपलब्ध नहीं थी पर अब द्धारिकाधीश मंदिर में भी एक पुस्तकालय संचालित है और ये सच में बहुत अच्छी बात हैं कि इतने जतन से पुरानी किताबों, ग्रन्थों को यहां संजो के रखा गया हैं एक ब्रजवासी मित्र नें बताया कि यहां कि हर एक किताब कम से कम 80-100 साल या उससे भी पुरानी है, कोई कोइ पुस्तक तो 400 साल पुरानी भी हो सकती हैं | यहां ज्यादातर पुस्तके जो है वे पुष्टिमार्ग और वल्लभ संप्रदाय, कृष्णलीलाओं आदि से संबंधित होनी चाहिये | यहां का शांत और शीतल और एकांतपुर्ण वातावरण पुस्तक प्रेमीयों के लिये स्वर्ग जैसा ही हैं |

अजीम प्रेमजी फाउन्डेशन पुस्तकालयः अजीम प्रेमजी फाउन्डेशन काफी सारे सराहनीय कार्य देश में कर रहा हैं इसी कडी में पचास फीट रोड, कांकरोली पर एक पुस्तकालय का भी संचालन किया जाता हैं | [Read more →]

→ अब तक कोई टिप्पणीं नहींटैग्सः ···

दूधालेश्वर इको डेस्टिनेशन पाइंट, रावली टाडगढ़ अभ्यारण्य

December 24th, 2017 · प्रमुख दर्शनीय स्थल, राजसमन्द जिला

Dudhaleswar Hut

दूधालेश्वर इको डेस्टिनेशन पाइंट पर्यटन हेतु एक बहुत ही अच्छी जगह है जो कि रावली टाडगढ़ अभ्यारण्य, राजसमन्द के भीम तहसील में बरार गांव के नजदीक स्थित हैं | राजनगर से भीम देवगढ़ जाने वाली सडक पर ये लगभग 118 Km दूरी पर ये आता हैं| रावली टाडगढ़ अभ्यारण्य यहां एक बहुत ही प्राकृतिक और रमणीक स्थल हैं, जंगल सफारी, पक्षी प्रेमी, वन्य जीव प्रेमी और प्रकृति प्रेमी, लोग यहां जा कर बहुत आनन्द पा सकते हैं |

घने जंगल से घिरा होने के कारण दूर दूर तक प्रदूषण नहीं हैं, यहां रात को चांद तारे प्रदूषण के ना होने के कारण ए॓से साफ दिखाई देते हैं कि ये लगता है जैसे ये एक अनमोल अनुभव है जो कि शहर से दूर जाने पर ही प्राप्त किया जा सकता हैं | फोरेस्ट डिपार्टमेंट का यहां इको डेस्टिनेशन पाइंट हैं वाजिब दामों पर ठहरने, खाने पीने की भी यहां व्यवस्था हो जाती है | वैसे ये दूधालेश्वर इको डेस्टिनेशन पाइंट अधिकतर बिजी रहता हैं क्योकि सरकारी विभागों के अफसर, या उनके परिचित आदि यहां शनिवार रविवार को आते रहतें हैं |

दूधालेश्वर इस जगह का नाम यहीं के दूधालेश्वर महादेव मंदिर के नाम से पडा हैं, ये प्रकृति और सघन पेडों से घिरा मंदिर है जो कि बहुत ही अच्छा दिखता हैं यहां बंदर काफी हैं पानी के कुंड और एक कुई भी हैं, बरामदे आदि भी बने हुए हें बारिश के दौरान यहां अच्छे नजरे रहते होंगे, क्यूं की हम लोग तो यहां नवंबर माह में गये थे तो सघन जंगल होने के कारण इस वक्त काफी ठंड रहती हैं |

टाडगढ़ के नजदीक होने से रावली टाडगढ़ अभ्यारण्य का नाम ब्रिटिश इतिहासकार कर्नल जेम्स टाड के नाम पर पडा है जो कि अंग्रेजो के शासनकाल में यहां बहुत रहे और उन्होने उस दौरान भारत और मेवाड के इतिहास के बारे बहुत कुछ लिखा जो आज भी प्रासंगिक हैं, उनके ही नाम पर एक तीन कि.मी. का नेचर वाक ट्रेल भी यहां पर है जो हमें पैदल ट्रेक करते हुए जंगल के अंदर जाने को आमन्त्रित करता हैं |

James Tod Nature Trail

फोरेस्ट विभाग से यहां कोई ना कोई गाइड यहां हमेशा होते हैं, जो हमें वन्य जीवन और यहां के जीवों के क्रियाकलापों के बारे में और भी अधिक जानकारी हमें बताते चलते हैं | जंगल सफारी में हम जंगल के अंदर छः सात कि. मी. अपने वाहन से जा सकते हैं जो कि एक कच्चा रास्ता है और यहां भी जानवर नजर आ सकते हैं |

पैदल ट्रेक बहुत ही रोमांचक बन पडता हैं, यहां पैदल ट्रेकिंग और जंगल सफारी के दौरान हमें, जंगली भेंसे, जंगली सूअर, नीलगायें, चीतल, सांप, नेवले, जंगली खरगोश, बिज्जू और बंदर आदि देखने को मिले | पक्षीयों में यहां हमने कबूतर, मोर, बटेर, तीतर, तोते, विभीन्न चिडीयाएं आदि देखीं ये अनुभव बहुत ही मनमोहक था | [Read more →]

→ अब तक कोई टिप्पणीं नहींटैग्सः ······

राजसमन्द झील भरने के पास

August 8th, 2017 · राजसमन्द जिला

राजसमन्द झील में पानी का स्तर अब 28 फीटः

ताजा अपडेटः आज 30-8-018 तक पानी झील में 28 फीट तक आ पहुंचा हैं और आवक जारी है |

यहां के लोगों में राजसमन्द झील के पूरी भरने की आस फिर से जागी है | आज 8-8-017 को यहां पानी का स्तर 24 फीट हो चुका हैं, पिछले साल ये लगभग 19-20 फीट तक ही पहूंचा था | पर इस बार लगभग 10 फीट पानी तो एक ही दिन में आ पहुंचा जो की एक तरह का रिकार्ड ही है | हर एक डेढ़ घंटे में एक एक फीट की रफ्तार से पानी बढ़ा हैं | रात को चार फीट, सुबह देखा तो तेरह फीट, ये तो अचंभा ही था एक तरह से |

जानकारों की मानें तो यहां झील लबालब यानी 32-34 फीट होने पर चादर चलती हैः

कह रहे हैं कि पहले सन 1972-73 में एक बार झील पूरी भरी थी तो कमल बुर्ज की आखिरी छतरी से आगे बनें भाणा लवाणा वांसोल के रास्ते में यहां चादर चली | ये नजारा देखने आसपास के कई सेाकडों लोग यहां पहूंचे | उसके बाद फिर ए॓सा हो ना सका, कालांतर में मार्बल माइंनिंग व्यवसाय के कारण गौमती नदी से झील तक पहुंचने का रास्ते में बहुत से खड्डे और स्लरी के पहाड अवरोध बने, फिर तो ये होना असंभव ही था  |

पर प्रभु की लीला देखों यहां दुनिया में सब कुछ एक पहिये की तरह है, जो गरीब हैं पेसा पाता हैं, जिन्दा मरता है, सूखे पत्ते झडने के बाद नई कौंपले फिर से आती है वैसे ही खाली झीलें भी भरती है | दुख इस बात का है कि कुछ दिन बाद फिर से किसान आयेंगे पाणेत, रेलणी व खेतों को न्यूनतम दामों पर पानी से सिचाईं की मांग लिये | फिर कोई नेता अपने वोट बेंक को दुख मे देख कर घडियाली आंसू बहाएंगे, हाय तौबा करेंगे लडाईयां प्रदर्शन करेंगे | सरकार हाथ ढ़ीले करेगी ही क्यूं कि ए॓सा नियम बन चुकुा है कि दस फीट ही रखा जायेगा झील का पानी |

बाजारों के जानकार अर्थेशास्त्री बता रहे है कि इस बार खूब पानी हुआ है, बम्पर फसले हो रही है किसानों को अनुदान मिल रहे हैं अबके गेहुं सस्ते होगें | पर हाय री आम आदमी कि किस्मत ये तो फूटे चाय के कुल्हड [Read more →]

→ अब तक कोई टिप्पणीं नहींटैग्सः ···

राजसमंद का पिपलान्त्री गांव जहां कन्या जन्म को धूमधाम से मनाया जाता हैं

January 27th, 2017 · प्रमुख दर्शनीय स्थल, शख्सियत

बात करते हैं पिपलान्त्री गांव की जो राजसमंद के ही मोरवड के नजदीक एक छोटा सा गांव हैं | ये मार्बल माइंनिंग एरिया के पास ही का गांव हे और प्रकृति की दृष्टि से देखें, तो अब ये बहुत ही समृद्ध हो चुका हैं | यहां पिपलान्त्री गांव में अनंत हरियाली लाने और बहुत सा विकास करने में यहां के कुछ युवा लोंगों के समूह का विशेष स्थान है इनमें से यही पंचायत समिति के पुर्व सरपंच श्री श्याम सुंदर पालीवाल जी का नाम में लेना चाहता हूं | श्री श्याम सुंदर पालीवाल जी पिपलान्त्री गांव में बी.जे.पी. के कद्दावर नेता हैं, पहले सरपंच भी रह चुके हैं और कार्यकाल में उन्होनें गांव के विकास को अपनी निगाह में प्रथम रखा |

पिपलान्त्री गांव

पिपलान्त्री

श्याम सुंदर जी पालीवाल ने कैसे ये सब कियाः

राज्य द्धारा बहुत सारी योजनाएं राजस्थान के हर एक गांव के विकास हेतु चलाई जाती है पर जानकारी ,कम इच्छाशक्ति, Intrest लेकर कार्य ना करने के कारण ये योजनाएं आधे रास्ते में ही दम तोड देती हैं पर कहते हैं जहां चाह है वहां राह हैं |

श्याम सुंदर जी पालीवाल ने अपने प्रयासों से इसे निर्मल ग्राम पंचायत बनवाया जहां साफ सफाई पर खास जोर रहता हैं | यहां अगर आप जायेंगे तो देखेंगे की ये गांव साफ सडके, हर घर में शौचालय, धु्ंए रहित चुल्हें, स्कूल, साफ पानी की टंकिया, रोजगार हेतु नरेगा आदि कार्यक्रम, सुरम्य प्राकृतिक वातावरण और महिलाओं को रोजगार हेतु प्रोत्साहन आदि के मामले में अन्य गांवो से बिलकुल अलग हैं |

2006 में श्याम सुंदर जी ने अपनी दिवंगत बेटी किरण के नाम से गावं में हरियाली लाने के प्रयास शुरु कर दिये | श्याम सुंदर जी और यहां के युवाओं नें यहां कन्या जन्म को धूमधाम से मनाने और प्रकृति का संवर्धन एक साथ करने के लिये एक ए॓सा प्रोग्राम बनाया है कि बस, हर घर में कन्या जन्म पर वे घर के प्रधान व्यक्ति से 10000 रुपये एवं गांव के निवासीयों के सहयोग से 21000 रुपये एकत्र करते हैं ये इनको फिक्स डिपोजिट करवाते हैं और कन्या के माता पिता द्धारा 111 पेड पोधे लगवाये जातें हैं साथ ही उन्हे इनको सेवा देखभाल करने का भी वृत दिलाया जाता हैं, उन्हे ये भी समझाया जाता है कि वे बेटी को अच्छी शिक्षा और परवरिश देगें , और बालविवाह नहीं करेंगे | ये 31000 रुपये की फिक्स डिपोजिट और पेड पोधों से जो आय होगी उसे कन्या की पढ़ाई, जब कन्या 20 साल की होगी तब उसके विवाह में खर्च किये जायेंगें | तो इस तरह से यहां पिपलान्त्री गांव में कन्या जन्म को बडी धूमधाम से मनाया जाता हैं, लडकियां बोझ नहीं ये समझने की बात हैं |

गांव के आसपास लगभग 900 बीघा जमीन पर मात्र कुछ ही सालों में हरियाली की बहार ले आये ये सज्जन | एलोवेरा, नीम,आवंला, शीशम, आम और ना जाने कैसी कैसी आयुर्वेदिक औषधियां और फल दार पेड यहां अब लहलहा रहे हैं | माइनिंग के अपने कुछ माइनस पाईंट भी हैं पर हरियाली बढ़ने के साथ ही यहां के भूमिगत जल स्तर में भी सुधार हुआ हैं | एलोवेरा जैल, स्कीन प्राडक्ट्स भी यहां के स्वयं सहायता समूहों के द्धारा बनाये जाते हैं जो उपयोगी हें, साथ ही 90 मिनट की एक फिल्म भी रिलीज होने वाली है “पिपलान्त्री” नाम से जिसमे यहां के बारे में सब चित्रित हैं |

भारत के कोने कोने से लोग यहां देखने आते हैं कि किसी गांव का ए॓स॓ कायाकल्प भी किया जा सकता हैं, अभी अभी डेनमार्क, स्वीडन से भी एक टीम ये सब देखने समझने आयी थी कि कैसे कम संसाधनों के प्रयोग करते हुए भी हम प्रकृति की मदद से [Read more →]

→ 3 टिप्पणींयांटैग्सः ····

नाथद्धारा की महिला संत भूरी बाई “अलख”

January 15th, 2017 · शख्सियत

नाथद्धारा की संत भूरी बाई अलख:

संत भूरी बाई

संत भूरी बाई

मेवाड में यूं तो अनेकानेक संत महत्माओं नें जन्म लिये पर उनमें से महिला संत महात्माओें में भूरी बाई अलख का विशेष महत्व है | उन्हें मेवाड की दूसरी मीरा कहा जाता हैं | 1949 में वे एक सुथार खाती परिवार में जन्मी थी, जन्मस्थान था लावा सरदारगढ़ जो कांकरोली से पन्द्रह किलोमीटर की दूरी पर हैं | वे बहुत अल्पशिक्षीत थी | वे मेवाड के चतुर सिंह जी बावजी महाराज को बहुत मानती थी | छोटी आयु में उनका विवाह नाथद्धारा के एक प्रोढ़ धनी चित्रकार फतेहलालजी से हुआ | अपने छोटे से वैवाहिक जीवनकाल में उन्होने बहुत समस्यायें देखीं | उनके पति ज्यादा जीये नहीं और वे विधवा हो गयी |

गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी उन पर भक्तिभाव और आध्यात्म का बहुत गहरा असर था | साधना भक्ति और संसार में रहते हुए भी संसार से विरक्ति की भावना के कारण ही उस समय बहुत से लोग उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाये , लोग उनके पास आते बैठते, गंभीर विषयों पर चर्चाएं करते पर भूरी बाई का चुप रहने पर ही विशेष जोर था | भूरी बाई कहती चुप हो जाओ, सारे सवालों के जवाब स्वतः ही मिल जायेंगे | संत भूरी बाई से उस समय की बडी गुणी हस्ती थी स्वयं ओशो रजनीश जैसे दार्शनिक व चिंतक भी उनसे मिले थे | संत भूरी बाई बातें मेवाडी भाषा में ही करती थी व बडी से बडी बात कम शब्दों में ए॓से कह जाती थी कि बस सुनने वाले सुनते ही रह जाते थे |

उन्होने कहा है किः

चुप साधन चुप साध्य है,
चुप चुप माहि समाय |
चुप समज्या री समझ है,
समज्या चुप व्हे जाय ||

चुप ही साधन व साध्य हैं , चुप चुप में समाता हैं , चुप समझने वालों की समझ हैं और जो समझे वो चुप हो जायें | आज भी उनकी हर तस्वीर या मुर्ति के पास लिखा “चुप” हमें बहुत ही शातं भाव से चुप हो जाने की प्रेरणा देता हैं | वाकई चुप रहने में बहुत सार वाली बात हैं |

संत भुरी बाई का गिलहरी, पक्षीयों, कु्त्ते सहित अन्य जीव जानवरों से बहुत प्रेम था, कहते हैं कि उनके आश्रम में चाय हमेशा बनती ही रहती थी , लोग बडे भक्ति भाव से उनके पास आते , बैठते | महात्मा भूरी बाई को ‘अलख’ नाम किसी महात्मा संत नें भाव से अभिभूत होकर दिया था। उन्ही नें एक बार कहाः

बोलना का कहिए रे भाई
बोलत बोलत तत्त नसाई।
बोलत बोलत बढै विकारा
बिन बोले का करइ बिचारा।।

उनके नाम पर बहुत से जन सेवा हेतु संस्थाएं चल रही हें जिनमें से उदयपुर की ‘‘अलख नयन मंदिर नेत्र संस्थान’’ उल्लेखनीय है, ये संस्था ग्रामीण क्षेत्रों में नेत्र-चिकित्सा हेतु चिकित्सा शिविर आयोजित करती है व जनता की सेवा कर रही है।  [Read more →]

→ 5 टिप्पणींयांटैग्सः ··