Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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ये पेंथर पेंथर क्या है ये पेंथर पेंथर

May 24th, 2016 · नई खबरें

राजसमंद में फिर पेंथर:

राजसमंद में पेंथर संबंधित खबरें इस बार इतनी बनी हैं कि बस, सिर्फ एक छः महिने के अल्प समय में कई बार पेंथर इंसानो के घरों, बाडों और सडकों पर आये हैं | कुछ समय पहले ही राजसमंद के कांकरोली, पडासली, नाथद्धारा, कुंभलगढ़ एरिया ‌और मार्बल की खदानों के आस पास अक्सर पेंथर परिवार देखा गया है | लगता हैं कि पेंथर आदि के लिये राजसमंद की आब औ हवा अनुकुल हैं और इन्हे यहां आसानी से खाना पानी भी मिल रहा हैं तभी ये आम जनता को बार बार दिख ही जाते हैं |

आस पास के गावों के बाडों में से बछडे ले जाना और गायों भेंसों पर हमला तो अनेको बार ये कर चुके हें | प्रशासन भी भरसक प्रयास कर रहा है कि इन्हे पकड कर सेंचुरी या और कहीं सुरक्षित पहुंचाया जाये | पर राजसमंद के फोरेस्ट विभाग के पास संसाधनों की कमी हें, ट्रांकुलाईजेशन एक्सपर्ट भी यहां नहीं हे और ना ही जरुरी साजो सामान |

अभी हाल ही में लंगोट चौराहे के पास जब चार माह का पेंथर का बच्चा कहीं से आकर के मोटरसाइकिल के नीचे बैठ गया था , फिर लोगों की भीड से घबरा कर मकानों के किनारे बनी नाली में छिप गया था उसे भी हमारी काकंरोली की फायर बिग्रेड व पुलिस जवानों की मदद से वन विभाग के जवानों ने पकडा | खैर जो हुआ अच्छा हुआ, पर भविष्य में प्रशासन इन पर ध्यान दे ताकि शहरों में जंगली जीव जानवर ना आयें |

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तेंदुए का सिर पानी भरने वाले स्टील के घडे में अटका

October 3rd, 2015 · नई खबरें

अरे भला ये भी क्या बात हुई | तेंदुए का सिर पानी भरने वाले स्टील के घडे में कैसे अटका, ये शहर ना ना देश भर में चर्चा का विषय बना रहा | हुआ यूं की राजसमन्द में एक तीन साल के नए नए युवा हो रहे तेंदुए ने पानी पीने के लिये गांव के घर का रुख किया पर ये उसका बुरा दिन था पानी पीने के लिये जेसे ही उसने अपना सिर पानी भरने वाले स्टील के घडे में डाला की फिर वो वापस निकाल हीं नहीं पाया | अब वो बेचारा गांव के आस पास बडा ही परेशानी से घूम ही रहा था, कि लोगों ने उसके फोटो खींचे विडियो बनाये और सोशल साइ्ट्स पर भेज डाले | फिर वन विभाग को खबर की गई अब अपने शहर में ए॓सा कोई शूटर या बेहोश करने की भी दवाइयां व उपकरण भी नहीं की तत्काल तेंदुए को राहत दिला दे |

फिर कोई उदयपुर से किसी संबंधित व्यक्ति को बुला ट्रांकुलाइज्ड करवाया गया, और घडे से उसे मुक्त किया गया | फिर उसे कुंभलगढ़ के जंगलों मे छोडा गया | फंस गया बेचारा | अब वो सारी जिदंगी किसी गांव शहर का रुख नहीं करेगा, और अगर आया भी तो किसी घडे से पानी पीने की कोशिश तो हरगिज नहीं करेगा |

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क्या है तुम्हारे पास ?

June 27th, 2015 · कांकरोली

अमिताभः आज मेरे पास बंगला है, गाडी है, बैंक बलेंस है, … तुम्हारे पास क्या है ?
शशि कपूरः मेरे पास……………… मेरे पास माँ है !”

ए॓सा ही सवाल यदि देश की आर्थिक राजधानी मुंबई अपने काकंरोली से पूछे तो ये ही जवाब मिलने वाला हें | हमारे शहर कांकरोली की ए॓रिगेशन पाल का कोई मुकाबला नहीं |

मेरे एक मित्र राहुल दिक्षित नें ये फोटो बना कर शेयर की है, नजारा जोरदार है |

Mumbai and Rajsamand

Mumbai vs Rajsamand

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राजसमन्द झील से सुर्यास्त के कुछ नजारे

May 16th, 2015 · प्रमुख दर्शनीय स्थल

राजसमन्द झील अपने आप में जग प्रसिद्ध हैं यहां झील के किनारे सुर्योदय व सुर्यास्त के नजारे बडे ही मनमोहक होते हें | रोजाना शाम को यहां से राजनगर के पहाडों के पीछे जाता सुर्य ए॓सी लालिमा छोड जाता है कि देखने वाले बस देखते ही रह जाते हैं | और ए॓से ही नजारे के लिये फिर से अगली शाम को यहां आना ही पडता है, इसका कोई विकल्प नहीं, ये जगह सचमुच अद्धितीय हैं | तो क्या आप भी राजसमन्द झील के किनारे से सुर्यास्त के नजारे देखना चाहते है ?

राजसमन्द झील किनारे सुर्यास्त के कुछ क्षणः

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क्या कहा डर, और वो भी साईकिल से

May 16th, 2015 · आपबीती

मेरे एक बचपन के सहपाठी दोस्त हैं, बडे ही भोले और मस्त जीव, आजकल टीचर हें | अभी कुछ समय के अन्तराल में वे मुझसे मिले, वे मोटरसाईकिल पर थे, तो अनायास ही मुझे बचपन में उनका साईकिल नहीं सीखने व चलाने के पीछे का डर याद आ गया | डर वाकई में बहुत बडी चीज हैं, किसी व्यक्ति को यदि किसी चीज से डर बैठ जाये तो बडी मुश्किल पैदा हो जाती हे | जैसे कि छुटपन में जब हम लोग तालाब पर तैरने जाते थे, तो तालाब की पाल पर बने कबूतरखाने की छत पर से कूदने से में बहुत डरा करता था, पर मेरे भाई व दूसरे दोस्त मजे मजे में ये सब खेल की माफिक किया करते थे | तेरना भले ही जानते हो कोई पर लगभग तीस फीट उपर से पानी पर कूदना, डर तो लगता ही था ना भाई | पर उनके लिये ये आम बात थी पर मुझे कोई उस तरफ हाथ पकड कर खींचता भी था तो मेरे तो प्राण ही गले में आ जाते थे |

तो मेरे वो दोस्त साईकिल से जाने क्युं इतना डरा करते थे कि ना तो चलाते ना सीखते, जबकि दूसरे सभी सहपाठी हाथ छोड छोड कर के अपनी छोटी अद्दिया व बडी साईकिलें खेल मैदान में बडे मजे से चलाते थे, लकडी के फट्टे पत्थरों पर तिरछे जमाकर के कूदाते थे या टेढ़े मेढ़े मोडते, या कह लो उस जमाने के स्टंट किया करते थे | मुझे यूं लगता था की या तो वे किसी की साईकिल से बडे बुरे ठुके हुए हैं या कभी ए॓से गिरे हैं कि जेसे कोई ना गिरा हो, तभी इतना डर लगा रहता था उनको | और मुझे तब ये लगता था कि बाकी तो ये महाशय पढ़ाई व अन्य बातों में बडे होशियार हैं पर इस मामले में ये इतने फिसड्डी कैसे हैं, जाने कब ये साईकिलों पर शहर में घूमने के मजे लेंगे | उस समय साईकिल के मालिक होने का मतलब ही रईस होने जेसा था | और मेनें भी दसवी थर्ड डिविजन में पास हो के येन केन अपने पापा से नई साईकिल हथिया ही ली थी | दो चार हम उम्र साईकिल सवार दोस्तों का होना शान समझी जाती थी, वाह क्या दिन थे वे |

तो बात चल रही थी मेरे साईकिलों से डरने वाले दोस्त की, मेनें कहा कि भाई मुझे तुमको व एक और उनके जैसे ही मित्र को अब स्कूटर, मोटरसाईकिल पर जाते आते देखना अच्छा लगता हैं, लगता कि को जैसे किसी को कुछ बाकी था वो मिल गया | दोस्त नें कहा डर से उपर तो निकलना ही था, जिन्दगी सब कुछ सिखा ही देती है, कुछ समय लगता है बस |

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