Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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क्या है तुम्हारे पास ?

June 27th, 2015 · कांकरोली

अमिताभः आज मेरे पास बंगला है, गाडी है, बैंक बलेंस है, … तुम्हारे पास क्या है ?
शशि कपूरः मेरे पास……………… मेरे पास माँ है !”

ए॓सा ही सवाल यदि देश की आर्थिक राजधानी मुंबई अपने काकंरोली से पूछे तो ये ही जवाब मिलने वाला हें | हमारे शहर कांकरोली की ए॓रिगेशन पाल का कोई मुकाबला नहीं |

मेरे एक मित्र राहुल दिक्षित नें ये फोटो बना कर शेयर की है, नजारा जोरदार है |

Rajsamand Pal vs Mumbai

Rajsamand Pal vs Mumbai

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राजसमन्द झील से सुर्यास्त के कुछ नजारे

May 16th, 2015 · प्रमुख दर्शनीय स्थल

राजसमन्द झील अपने आप में जग प्रसिद्ध हैं यहां झील के किनारे सुर्योदय व सुर्यास्त के नजारे बडे ही मनमोहक होते हें | रोजाना शाम को यहां से राजनगर के पहाडों के पीछे जाता सुर्य ए॓सी लालिमा छोड जाता है कि देखने वाले बस देखते ही रह जाते हैं | और ए॓से ही नजारे के लिये फिर से अगली शाम को यहां आना ही पडता है, इसका कोई विकल्प नहीं, ये जगह सचमुच अद्धितीय हैं | तो क्या आप भी राजसमन्द झील के किनारे से सुर्यास्त के नजारे देखना चाहते है ?

राजसमन्द झील किनारे सुर्यास्त के कुछ क्षणः

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क्या कहा डर, और वो भी साईकिल से

May 16th, 2015 · आपबीती

मेरे एक बचपन के सहपाठी दोस्त हैं, बडे ही भोले और मस्त जीव, आजकल टीचर हें | अभी कुछ समय के अन्तराल में वे मुझसे मिले, वे मोटरसाईकिल पर थे, तो अनायास ही मुझे बचपन में उनका साईकिल नहीं सीखने व चलाने के पीछे का डर याद आ गया | डर वाकई में बहुत बडी चीज हैं, किसी व्यक्ति को यदि किसी चीज से डर बैठ जाये तो बडी मुश्किल पैदा हो जाती हे | जैसे कि छुटपन में जब हम लोग तालाब पर तैरने जाते थे, तो तालाब की पाल पर बने कबूतरखाने की छत पर से कूदने से में बहुत डरा करता था, पर मेरे भाई व दूसरे दोस्त मजे मजे में ये सब खेल की माफिक किया करते थे | तेरना भले ही जानते हो कोई पर लगभग तीस फीट उपर से पानी पर कूदना, डर तो लगता ही था ना भाई | पर उनके लिये ये आम बात थी पर मुझे कोई उस तरफ हाथ पकड कर खींचता भी था तो मेरे तो प्राण ही गले में आ जाते थे |

तो मेरे वो दोस्त साईकिल से जाने क्युं इतना डरा करते थे कि ना तो चलाते ना सीखते, जबकि दूसरे सभी सहपाठी हाथ छोड छोड कर के अपनी छोटी अद्दिया व बडी साईकिलें खेल मैदान में बडे मजे से चलाते थे, लकडी के फट्टे पत्थरों पर तिरछे जमाकर के कूदाते थे या टेढ़े मेढ़े मोडते, या कह लो उस जमाने के स्टंट किया करते थे | मुझे यूं लगता था की या तो वे किसी की साईकिल से बडे बुरे ठुके हुए हैं या कभी ए॓से गिरे हैं कि जेसे कोई ना गिरा हो, तभी इतना डर लगा रहता था उनको | और मुझे तब ये लगता था कि बाकी तो ये महाशय पढ़ाई व अन्य बातों में बडे होशियार हैं पर इस मामले में ये इतने फिसड्डी कैसे हैं, जाने कब ये साईकिलों पर शहर में घूमने के मजे लेंगे | उस समय साईकिल के मालिक होने का मतलब ही रईस होने जेसा था | और मेनें भी दसवी थर्ड डिविजन में पास हो के येन केन अपने पापा से नई साईकिल हथिया ही ली थी | दो चार हम उम्र साईकिल सवार दोस्तों का होना शान समझी जाती थी, वाह क्या दिन थे वे |

तो बात चल रही थी मेरे साईकिलों से डरने वाले दोस्त की, मेनें कहा कि भाई मुझे तुमको व एक और उनके जैसे ही मित्र को अब स्कूटर, मोटरसाईकिल पर जाते आते देखना अच्छा लगता हैं, लगता कि को जैसे किसी को कुछ बाकी था वो मिल गया | दोस्त नें कहा डर से उपर तो निकलना ही था, जिन्दगी सब कुछ सिखा ही देती है, कुछ समय लगता है बस |

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राजनगर में हजरत मामू भाणेज की दरगाह

April 3rd, 2015 · इतिहास के पन्नो से

मामू भाणेज की दरगाह:

राजनगर के पुराना किला के पास ही में मामू भाणेज की दरगाह है | मामू भाणेज की दरगाह भी लगभग चार सौ साल पुरानी हैं, राणा राजसिंह जी के जमाने की | ये एक तरह से स्थानिय पीर हैं, जिनकी यहां के मुस्लिम समुदाय में बहुत ही मान्यता हैं और सम्मान है | ये दरगाह मुस्लिम समुदाय का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है | मामू भाणेज की कब्र पर लोग बहुत से गुलाब के फूल आदि चढ़ाते हें | कई लोग यहां मन्नत मांगते हें और मन्नत पूरी होने पर फिर सजदे में सिर झुकाने के लिये यहां आते हैं | अक्सर शुक्रवार को यहां अच्छी खासी भीड रहती हैं | वर्ष में एक बार तीन दिवसीय उर्स के मेले का भी यहां आयोजन होता है, बहुत से अच्छे अच्छे कव्वाल और गायक कलाकार यहां अपनी प्रस्तुतियां देते हैं |

मामू भाणेज की दरगाह

मामू भाणेज

मामू भाणेज की दरगाह तक कैसे पहुंचेः

राजनगर हुसैनी चौक से होते हुए जब हम राजनगर बस स्टेन्ड की तरफ जाते हैं, तो थोडा आगे बढ़ते ही सीधे हाथ की तरफ उपर घाटी की तरफ रास्ता जा रहा हैं, सुविधा के लिये मार्ग सूचक बोर्ड भी लगाया हुआ हैं | पैदल या दु पहिया वाहन से यहां जाया जा सकता हैं | चढ़ाई के थोडा उपर जाकर हमें अपने दुपहिया वाहनों को सडक के आखिरी छोर पर खडा करके थोडा पैदल जाना होता हैं | लगभग आधा कि.मी. उबड खाबड रास्ते पर पैदल चलने के बाद हम मामू भाणेज की दरगाह तक पहुंच सकते हैं, यहीं पास में राजनगर का पुराना किला और अन्नपूर्णा माताजी का मंदिर भी है | यहां जाने का एक दूसरा रास्ता भी है जो सेवाली मुख्य हाई वे की तरफ से उपर की ओर आता हैं | यहां से राजनगर और काकंरोली की आबादी और राजसमन्द झील के बडे ही मनोहारी दृश्य देखे जा सकते हैं, और हां यहां के सुर्यास्त के दृश्य की तो बात ही कुछ और हैं |

 

मामू भाणेज की दरगाह का एतिहासिक महत्वः

कहते हैं की राजसमन्द और राजनगर के संस्थापक राणा राजसिंह जी के जमाने की बात थी | राणा राजसिंह जी का राजमहल या ये किला उन्होने अपने लिये बनवाया था, वे यहां भी रहते थे और कभी कभार प्रवास भी करते थे, वो जमाना कुछ और था कोई किसी एक जगह पर हमेशा के लिये बस नहीं सकता था | उनके राजमहल मे कई सारी सुविधाएं थी जेसे मंदिर, कुआं रहने के लिये स्थान आदि | वे कुछ समय के लिये अपने परिवारजनो और सेनिकों के साथ किसी अन्य जगह पर चले गये | उससे पहले उन्होने ये महल की देखरेख की जिम्मेदारी पुरोहित पंडितो को दी, और वे चले गये | कुछ समय बाद जब वे फिर से यहां वापस आये तो पुरोहित पंडितो आदि नें ये स्थान पर उन्हें कब्जा देने के लिये मना कर दिया | राजपूत सेनिक और सिपहसालारों नें भी राणा जी को ये कह कर मना कर दिया की वे पुरोहित ये पंडितो पर तलवार नहीं चला सकते, क्यूं की वे यदि ए॓सा करते हैं तो उन्हें ब्रह्म हत्या का पाप लगेगा | राणा राजसिंह जी भी हिम्मत के धनी थे और एक बार जो ठान लेते वो कर के ही रहते थे | उन्होने पडौसी राजाओ से मदद ली, जिसमें कुछ मुस्लिम लडाके सैनिक भी थे, वे सभी राणा राजसिंह जी को अपना राजमहल वापस दिलाने की जंग मे लडे | इसी सेनिक टुकडी में एक मामा भान्जे की जोडी भी थे | वे दोनों बडी वीरता से लडे और अन्त में यहां शहीद हुए |

 

फिर ये जगह बहुत समय से उपेक्षित पडी रही, और दशकों बाद एक मुस्लिम संत को स्वप्न में ये बात पता चली की यहां इतने बडे सूरमा [Read more →]

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द्धारिकाधीश मंदिर में हवेली संगीत समारोह

March 20th, 2015 · उत्सव एवं त्योहार

कांकरोली का द्धारिकाधीश मंदिर अपनी बहुत सी अच्छी बातों और रिवाजों के लिये जाना जाता हैं यहां के दर्शनों कि झांकिया और मंदिर के अनेकानेक दर्शन और कार्यक्रम जनमानस में बडे ही प्रसिद्ध हैं | साथ ही यहां दर्शनों के दौरान होने वाले कीर्तन जो कि यहां के परम्परागत कीर्तनकार या कीर्तनिया जी किया करते हैं, वे बडे ही अच्छे लगते हैं | मंदिर का शांत व श्रद्धापुर्ण वातावरण, यहां प्रभू के दर्शन, चहुं और धूप दीप की सुगंध, पखावज की थाप, हारमोनियम की स्वरलहरियां, और कीर्तनकारों की विशेष हवेली संगीत से सराबोर गायनशैली, आने वाले हर एक श्रद्धालु दर्शनार्थी के मन पर अमिट छाप छोडती हें | वैसे भी पुष्टिमार्गीय संगीत परम्परा में हवेली संगीत का विशेष महत्व हैं |

काकंरोली में कल ही 19-03-2015 को शाम द्धारिकाधीश मंदिर में हवेली संगीत समारोह का आयोजन किया गया था जो कि राजस्थान ब्रजभाषा अकादमी जयपुर और श्री द्धारिकेश राष्ट्रीय साहित्य परिषद के तत्वावधान में आयोजित था | यहां बडोदा से पधारे मंदिर के खास कीर्तनकार भगवती प्रसाद जी गंधर्व, कामां मथुरा से आये दो गायक और स्थानीय कलाकारों नें अपनी गायन शैली की प्रस्तुतियां दी | हवेली संगीत समारोह में कीर्तन के दौरान साजिन्दे भी बडे ही दक्ष थे, मृदंग, पखावज, मंझीरें, और हारमोनियम, बस सिर्फ गिने चुने वाध्ययन्त्रों पर कौशल से ही वे आने वाले हर एक दर्शक को मुग्ध कर देने में सफल रहे | फिर सभी कलाकारों का सम्मान भी किया गया | इन सभी में मुझे भगवती प्रसाद जी गंधर्व की प्रस्तुति दिल को छू लेने वाली लगी | उम्मीद करता हूं ए॓से बहुत से हवेली संगीत से जुडे कार्यक्रम यहां भविष्य में भी होते रहें |

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