Rajsamand District, Rajasthan

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पीथल और पाथलः कन्हैयालाल सेठिया

July 30th, 2011 · 11 टिप्पणीयां · इतिहास के पन्नो से

राजस्थान के एक बहुत ही होनहार कवि थे कन्हैयालाल सेठिया | वे राजस्थानी में कवितायें, गीत आदि लिखा करते थे, बडा ही उम्दा लेखन था उनका |वे अपनी रचनाओं में शब्दों की ए॓सी जादूगरी जोडते थे कि बस….. आज के जमाने में भी राजस्थान की महिमा का बखान करते उनके गीत व कवितायें बहुत ही शौक से पढ़ी व सुनी जाती हैं | उनकी एक बहुत ही जोरदार रचना है वह है पीथल और पाथल |

chetak and rana pratap

chetak and rana pratap

ये कविता इंगित करती है हमें तब जब महाराणा प्रताप का जीवन काल बहत ही कठिनाई के दौर से गुजर रहा था, वे मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं करना चाहाते थे और परिणामस्वरूप उन्हें जंगल जंगल में छुप छुप कर गुजर बसर करनी पड रही थी | राणा प्रताप मेवाड को मुगलों से वापस छीनना चाहते थे और उसी कारण छापामार युद्ध कर रहे थे और मुगलों को करारा नुकसान दे रहे थे | उन्हीं कठीनाई के दिनों में एक दिन जब राणा प्रताप नें अपने पुत्र अमरसिंह को घास से बनी रोटी खाने के लिये दी और वह भी एक जंगली बिल्ला ले कर भाग गया, अपने पु्त्र को भूख से रोता देख राणा का मन द्रवित हो उठा और उन्होने आत्मसमर्पण हेतू अकबर को एक पत्र भेजा |

अकबर को खुद यकीन नहीं हुआ की प्रताप इस तरह अधीनता स्वीकार करेगें पर यही जांचने के लिये अकबर नें अपने कवि पीथल को एक पत्र भेजने को कहा | पीथल राणा प्रताप को मन ही मन बहुत सम्मान करता था | पीथल ने कुछ जोश से भरपूर पक्तियां लिखी और महाराणा प्रताप को फिर कभी न झुकने के प्रण को याद दिलाया | और महाराणा प्रताप फिर से मुगलों से लोहा लेने के लिये तत्पर तैयार खडे हुये | और पीथल राणा से जागे स्वाभिमान को देख बहुत हर्षाया | यही सब कुछ है इस ए॓तिहासिक कविता पीथल और पाथल में |

पीथल और पाथलः कन्हैयालाल सेठिया

अरे घास री रोटी ही, जद बन बिलावडो ले भाग्यो |
नान्हों सो अमरयो चीख पड्यो, राणा रो सोयो दुःख जाग्यो ||

हूं लड्यो घणो, हूं सह्यो घणो, मेवाडी मान बचावण नै |
में पाछ नहीं राखी रण में, बैरया रो खून बहावण नै ||

जब याद करूं हल्दीघाटी, नैणा में रगत उतर आवै |
सुख दुख रो साथी चेतकडो, सूती सी हूक जगा जावै ||

पण आज बिलखतो देखूं हूं, जद राजकंवर नै रोटी नै |
तो क्षात्र धर्म नें भूलूं हूं, भूलूं हिन्वाणी चोटौ नै ||

आ सोच हुई दो टूक तडक, राणा री भीम बजर छाती |
आंख्यां में आंसू भर बोल्यो, हूं लिख्स्यूं अकबर नै पाती ||

राणा रो कागद बांच हुयो, अकबर रो सपणो सो सांचो |
पण नैण करया बिसवास नहीं,जद बांच बांच नै फिर बांच्यो ||

बस दूत इसारो पा भाज्यो, पीथल ने तुरत बुलावण नै |
किरणा रो पीथल आ पूग्यो, अकबर रो भरम मिटावण नै ||

म्हे बांध लिये है पीथल ! सुण पिजंरा में जंगली सेर पकड |
यो देख हाथ रो कागद है, तू देका फिरसी कियां अकड ||

हूं आज पातस्या धरती रो, मेवाडी पाग पगां में है |
अब बता मनै किण रजवट नै, रजुॡती खूण रगां में है ||

जद पीथल कागद ले देखी, राणा री सागी सैनांणी |
नीचै सूं धरती खिसक गयी, आंख्यों में भर आयो पाणी ||

पण फेर कही तत्काल संभल, आ बात सफा ही झूठी हैं |
राणा री पाग सदा उंची, राणा री आन अटूटी है ||

ज्यो हुकुम होय तो लिख पूछूं, राणा नै कागद रै खातर |
लै पूछ भला ही पीथल तू ! आ बात सही बोल्यो अकबर ||

म्हें आज सूणी है नाहरियो, स्याला रै सागै सोवैलो |
म्हें आज सूणी है सूरजडो, बादल री आंटा खोवैलो ||

पीथल रा आखर पढ़ता ही, राणा री आंख्या लाल हुई |
धिक्कार मनैं में कायर हूं, नाहर री एक दकाल हुई ||

हूं भूखं मरुं हूं प्यास मरूं, मेवाड धरा आजाद रहैं |
हूं घोर उजाडा में भटकूं, पण मन में मां री याद रह्वै ||

पीथल के खिमता बादल री, जो रोकै सूर उगाली नै |
सिहां री हाथल सह लैवे, वा कूंख मिली कद स्याली नै ||

जद राणा रो संदेस गयो, पीथल री छाती दूणी ही |
हिंदवाणो सूरज चमके हो, अकबर री दुनिया सुनी ही ||

Photo Source: http://www.flickr.com/photos/vighanesh/5856243526/

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11 टिप्पणीयां ↓

  • madan chhajer

    yery good kavita pathal……. so good so nice thank madan chhajer editor hindustan border dailly jodhpur $ barmer

  • Hanuman Neemla

    Very hertly poem

  • जोगारााम सारण

    राणा का जीवन धन्य हैं

  • Rajesh Bhatnagar

    बचपन में ये कविता पढ़ी थी जिसने प्रताप के जीवन से बहुत प्रेरित किया था। कविता आधी अधूरी याद थी। इसे अनेक दिनों से ढूंढ रहा था। आपका धन्यवाद जो आपने मुझे इस कविता से मिला दिया। पढ़कर बहुत रोमांचित हुआ।

  • JASWANT KUMAWAT

    Best song lyrics of maharana pratap

  • JASWANT KUMAWAT

    Photos of maharana pratap

  • Ek Mewari

    Jai Mewar
    Jai Ekling Ji

  • देवेन्द्र पुष्करणा

    कविता बहुत ही सुंदर हे शब्दों का चयन उच्च कोटि का है पर यह केवल कपोल कल्पित है हकीकत में ऐसा कुछ हुवा ही नही था कवी ने कविता में कहा है की हल्दी घाटी युद्ध के बाद राणा प्रताप की ईएसआई दुर्दशा हो गई के वे वन में भटकने लगे और घास की रोटी खाते वक्त अमर सिंह छोटा था तो जंगली बिला रोटी छीन के ले गया और वो रोने लगा , ये कैसे सम्भव है अमर सिंह का जन्म 1569 में हुवा था और हल्दीघाटी युद्ध 1576 में इस हिसाब से अमर सिंह युद्ध के समय 17 वर्ष के थे थे तो छोटे कहा से हुवे राणा ने कोई पत्र नही लिखा था अक़बर को यह एक काल्पनिक कविता है हल्दीघाटी युद्ध में अमर सिंह को रनिवास की सुरक्षा की जिमेदारी थी और कवि के अनुसार एक 17 वर्षीय युवा वीर रोटी के लिये रोया था ……

  • देवेन्द्र पुष्करणा

    गलत प्रचारित की जा रही हे कविता ऐसा कुछ भी नही हुवा था

  • PUROHIT

    kavita aadhi adhuri hai

  • Rinku Giri

    devendra bhai ye bat haldighati yudhdh se pahle ki h|or ha haldighati ke yudhdh me rana g ne us mugal akbar ko buri tarah parajit kiya tha|jyada jankari ke liye rajasthan rajya ki pathy pustak paden|

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