Rajsamand District, Rajasthan

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वही खिलौना लूंगा, मचल गया दीना का लाल

June 4th, 2010 · 1 टिप्पणी · उलझन

“वही खिलौना लूंगा, मचल गया दीना का लाल”

आज न जाने क्युं मुझे स्कुल के समय में पढ़ी एक कविता की चंद पंक्तियां याद आ गई ! हठ के कुछ प्रकार है जैसे बालहठ, त्रियाहठ और राजहठ !

बाल हठ का अभिप्राय है बच्चे की जिद, त्रियाहठ यानी पत्नी की जिद या इच्छापुर्ती की आकांशा, और अंत में होता है राजहठ जो कि शाशक या राजा का हठ या जिद है । ये तीनो ही हठ या जिद के आगे पूरी दुनिया मौन है, लाईलाज, कोई उपचार नहीं, इस चीज का ।

सियारामशरण गुप्त जो कि मैथिली शरण गुप्त के भाई थे उनके द्वारा रचित ये महान कविता की कुछ लाईने पेश हैः

मैं तो वही खिलौना लूंगा मचल गया दीना का लाल
खेल रहा था जिसको लेकर राजकुमार उछाल-उछाल।
व्यथित हो उठी मां बेचारी- था सुवर्ण-निर्मित वह तो !
‘खेल इसी से लाल, नहीं है राजा के घर भी यह तो !

‘राजा के घर! नहीं-नहीं मां, तू मुझको बहकाती है,
इस मिट्टी से खेलेगा क्या राजपुत्र, तू ही कह तो ।
फेंक दिया मिट्टी में उसने, मिट्टी का गुड्डा तत्काल,
‘मैं तो वही खिलौना लूंगा – मचल गया दीना का लाल ।

‘मैं तो वही खिलौना लूंगा – मचल गया शिशु राजकुमार,
‘वह बालक पुचकार रहा था पथ में जिसको बारम्बार ।
‘वह तो मिट्टी का ही होगा, खेलो तुम तो सोने से ।
दौड पडे सब दास-दासियां राजपुत्र के रोने से ।

‘मिट्टी का हो या सोने का, इनमें वैसा एक नहीं,
खेल रहा था उछल-उछलकर वह तो उसी खिलौने से ।
राजहठी ने फेंक दिए सब अपने रजत-हेम-उपहार,
‘लूंगा वहीं, वही लूंगा मैं! मचल गया वह राजकुमार ।

  • सियारामशरण गुप्त

टैग्सः ·······

एक टिप्पणी ↓

  • Sandhya

    Ye kavita maine bachpan me padhi thi aur mujhe itani pasand aayi ki maine ise pura yad kar liya tha

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