Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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वो टाईल्स लगाने वाला कारीगर

January 9th, 2010 · 3 टिप्पणीयां · आपबीती, लघु कहानियां

एक बार की बात हैं, बहुत सालों पहले एक साधारण सा नौकरी पेशा आदमी ने अपनी हैसियत से थोडा उपर की सोच रखते हुए अपने मकान को थोडा व्यवस्थित करने के लिये मकान का काम चालू करवाया ! पता नहीं किस बुरे मुहु्र्त में ये सब शुरु हुआ था कि काम छः महिने से उपर होने पर भी खतम होने का नाम नहीं ले रहा था । कुछ ना कुछ काम बढ़ ही जाता था । वेसे राजस्थानी मेवाडी भाषा में एक कहावत है कि “ब्याह कहे कि मुझे मांड के देख, और मकान कहे कि काम छेड कर देख” सो बस मकान मालिक यह सोचता था कि अब औखली में सर तो दे ही दिया है, हो जाने दो जैसे भी हो, थोडा बहुत उधार भी हो गया तो मेहनत करके चुका देंगे ।

कुछ वक्त बाद बस सीमेंट पिल्लर, पलास्तर, घूटाई आदि के कामों से निबटे तो बारी आई, बाथरुम में टाईल्स लगाने की, तो मकान मालिक नें पहले से ही अच्छी क्वालिटी की टाईल्सों के डब्बे व व्हाईट सीमेंट का एक कट्टा कारीगर से पुछ कर उचित मात्रा में मगंवा दिये थे ! अब ढ़ु्ढ़ां गया टाईल्स लगाने वाला कारीगर को ! बडी मुश्किल से वो मिला । मकान मालिक नें कारीगर को देखाः पतला दुबला सा साधारण कपडे पहने एक सीधा सा दिखने वाला व्यक्ती था वो, शहर के पास के किसी गांव का ही रहने वाला था । सो रेट तय की गई और कारीगर ने कहा कि इतने रुपये में यह कार्य में नियत अवधि में यानी पन्द्रह रोज में कर दुंगा । रुपये आधे अभी व आधे रुपये काम पुरा हो जाने के बाद आप दे देना बाबूजी ।

बात पक्की हो गई, काली सीमेंट, व्हाईट सीमेंट का एक कट्टा और टाईल्सों के डब्बे उसको दे दिये गये । उसने दुसरे दिन से ही काम चालू कर दिया । हाथ में उसके सफाई थी, पर काम चालू करते ही उसने व्हाईट सीमेंट को लगाकर टाईल्से चिपकाई जिससे पुरा कट्टा खत्म हो गया, जो कि लगभग पुरे बाथ में लग सकती थी, आम तौर पर व्हाईट सीमेंट को टाईल्सों के बीच की दरजों में भरने के लिये ही काम में लेते हैं, और टाईल्सों के पीछे काली सीमेंट को लगाया जाता है । अब व्हाईट सीमेंट आती बहुत महंगी है और काली सीमेंट सस्ती ।

कारीगर नें कहाः बापू व्हाईट सीमेंट खत्म हो गई, तो मकान मालिक नें जाकर बाथरुम में देखा तो हतप्रत रह गया, मुर्ख कारीगर नें महंगी व्हाईट सीमेंट को लगाकर टाईल्से चिपकाई जिससे पुरा कट्टा खत्म हो गया । खैर नुकसान तो होना था सो हो गया । बाद में फिर से कारीगर को कारीगरी सिखाई गयी कि व्हाईट सीमेंट को टाईल्सों के बीच की दरजों में भरने के लिये ही काम में लेते हैं, और टाईल्सों के पीछे काली सीमेंट को लगाया जाता है ! कारीगर नें शर्मिंदा होते हुए माफी मांगी और फिर से काम शुरु किया ! तीन दिन बराबर काम करने के बाद अचानक वह गायब हो गया व वापस नहीं आया ।

मकान मालिक को लगा कि हाथ खुला रखने का नहीं है इस दुनिया में हर आदमी की चाबी अपने पास रखो तो वह दोडा चला आता है, अब उसको कहां ढ़ुढ़ें ? एक तो काम लेट हो रहा है मेरा, उपर से आधे पैसे उसको एडवांस दे रखे हैं वो तो अब गये समझों ! खेर मकान मालिक को पता ही था कि ए॓से तो हमेशा ही होता रहा है की काम में देरी, व कारीगरो के कारण नुकसान सब से ज्यादा टेंशन ।

दस दिन बाद अचानक वह टाईल्स लगाने वाला कारीगर मकान पर आया, वह चेहरे से बडा ही मायूस सा दिख रहा था और उसके कपडे, बाल आदि अस्त व्यस्त थे । वह पहले ही मकान मालिक का नुकसान कर चुका था और अब काम लेट और करने के कारण गमजदा व शर्मिंदा भी था । नजरे निचें किये वह काम पर आया और उसनें फिर से अधुरा पडा कार्य प्रारंभ किया ? थोडी देर में मकान मालिक बाबूजी आये । उसने नमस्ते किया, मकान मालिक नें कहा कि देखो भाई मेनें तुमसे पहले हौ बात कि थी कि काम मझे इस समय के अन्दर अन्दर चाहिये और तुमने भी हामी भरी थी, अब पहले ही मेरा इतना नुकसान कर चुके हो अब तुम और क्या चाहते हो ? क्या मुझसे कुछ गलती हो गई है क्या मिस्त्री साहब ?

वह नजरे नींचे किये खडा रहा व सुनता रहा, अचानक उसका गला रुंध गया व उसने बताया कि चंद रोज पहले एक दुर्घटना में मेरे बेटे की मौत हो गई थी, बस इसलिये में नहीं आ पाया, बाबुजी नें कारीगर के चेहरे में अजीब सी सच्चाई को देखा और उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ कि में गुस्से में इस भले आदमी को जाने क्या क्या कह गया ।

अब मकान मालिक निरत्तर थे उन्होनें कारीगर के कंधे पर हाथ रखा, प्यार भरा स्पर्श पाकर वह गदगद हो गया । कारीगर को पराये आदमी से कभी इतना स्नेह नहीं मिला था। मकान मालिक ने कहा भगवान के आगे कोई नहीं चल सकता है, जो होना था वो हो गया, अभी मुझे बताओ क्या में कुछ और तुम्हारी मदद कर सकता हु् ?

कारीगर निर्विकार भाव से खडा बाबुजी को देखता रहा । कुछ देर निःशब्द खडा रहा ।
दो चार दिन में ही उसने काम सफाई के साथ पुरा किया बाकी का पैसा लिया व चला गया ! जाते समय बाबुजी ने उसके चेहरे को देखा, उसमें एक अलग ही तरह का प्रेम था, निर्विकार, निस्वार्थ प्रेम ।

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3 टिप्पणीयां ↓

  • amar singh

    Kabhi Kabhi hum bina soche samjhe aapna nirnay lelety hain aur baad main us par dukh hota hain pehle hum ko puri bat sun aur samaj lene caheey tabhi kuch bolna caheeye

  • bhawani shanker

    our district famous palace as rajnager ,sanwar

  • TARAN SINGH

    VAASTAV MAIN ES WEBSITE KI JITNI TAARIF KI JAAYE.UTNI KAM H. ES SITE MAIN JAAKAR AISA LAGTA H JAISE RAJSTHAN KE GAAVO MAIN BHIRMAN KAR
    RAHE HO.

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