कबीर दास जी का जीवन चरित्र:
कबीर कबीर हैं, उनके जैसा कोई और नहीं, वे सिर्फ दुनिया में आये, गये नहीं, आज भी उन दोहों को पढ़ते या सुनते वक्त वो ही रुहानी ताकत का एहसास होता हैं | कबीर नें जितने सरल शब्दों में व्यक्ति, समाज धर्म आदि का चित्रण किया वह कोई शायद ही कर पाये | स्कूल में पढ़े कबीर के दोहे आज भी प्रासंगिक हैं, इतना मर्म है, इतनी समझ है इन दोहों में मानों कबीरदास जी नें पूरी जिंदगी का फलसफा डाल दिया है |
पेशे से कबीर एक जुलाहे थे | कबीर नें बडे ही सादे शब्दों में उस जमाने के रीती रिवाजों के बारे में लिखा, वे एक ईश्वर है इस बात में यकीन करते थे | उनके लिखे दोहे इतने आसान शब्दों में है कि उन्हे कोई निपट गवांर आदमी भी आसानी से समझ सकता हैं | कबीर के दौहों में से कुछ यहां प्रेषित हैं | और जब ओशो को आप पढ़ेंगे तो जानेंगे की कबीर कितने महान थे, रजनीश नें कबीर के बारे में जो कुछ लिखा तब ही असल मैं जान पाया कबीर को |
कबीरदास जी के कुछ दोहेः
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
पल में परलय होएगी, बहूरी करोगो कब ||
चलती चक्की देख कर, दिया कबीरा रोए
दुई पाटन के बीच में, साबूत बचा ना कोए ||
बुरा जो देखन में चला, बुरा ना मिलया कोए
जो मन खोजा आपणा, तो मुझसे बुरा ना कोए ||
धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होए
माली सींचे सौ घडा, ऋतु आए फल होए ||
सांई इतना दिजीये, जामें कुटंब समाए
मैं भी भूखा ना रहूं, साधू न भूखा जाए ||
कबीरा खडा बाजार में, मांगे सबकी खैर
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर ||
पोथी पड पड जग मुआ, पंडित भया ना कोए
ढ़ाई आखर प्रेम के, जो पढ़े सो पंडित होए ||
कबीरा गर्व ना किजीये, उंचा देख आवास
काल परौ भुइं लेटना, उपर जमसी घास ||
पाहन पूजै हरि मिले, तो मैं पूजूं पहार
ताते यह चाकी भली, पीस खाए संसार ||
कंकर पत्थर जोरी के, मस्जिद लयी बनाय
ता चढ़ी मुल्ला बांग दे, क्या बहिरा हुआ खुदाय ||
जब तूं आया जगत में, लोग हसें तू रोए
एसी करनी ना करी, पाछे हसें सब कोए ||
ज्यों नैनों में पुतली, त्यों मालिक घट माहिं
मूरख लोग ना जानहीं, बाहिर ढ़ूंढ़न जाहिं ||
माला फेरत जुग भया, मिटा ना मन का फेर
कर का मनका छोड दे, मन का मनका फेर ||
जब में था हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं
सब अंधियारा मिटी गया, जब दीपक देख्या माहिं ||
गुरु गोविंद दोऊ खडे, काके लागुं पाय
बलिहारी गुरु आपकी, जिन गोविंद दियो बताए ||
जाति ना पूछो साधू की, पूछ लिजिये ज्ञान
मोल करो तलवार का, पडी रहन दो म्यान ||
माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोय
इक दिन एसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय ||
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