मैं हमेशा से ही अपने हद में रहना पसंद करता हूं, वो हद खर्च करने की हो, चाहे किसी रोजमर्रा के कार्य से जुडी कोई बात हो या कोई और पर अपनी हद में रह कर अपनी हैसियत के मुताबित काम करना ही मेरी नजर में सही है | किसी मशहूर लेखक ने लिखा है कि हर किसी को अपनी हद में रहना चाहिये जैसे की किसी आदमी को सडक पर चलते चलते छडी घुमाने की आदत हैं या उसका ये शौक है पर अगर सडक खाली है तो मजे से घुमाओ पर यदि किसी राह चलते को छडी छूती भी है तो यह उस दूसरे आदमी की आजादी का हनन है | सही मायनों में यह शौक दूसरे के लिये दुविधा है, फफूंद हैं और जी का जंजाल है |
पर जाने क्यों आस पास के ही कुछ लोग, वे ही सब कुछ हैं दुनिया में, कोई दूसरा तो जैसे है कि नहीं | दूसरों की आजादी की कद्र करना भी तो कुछ बात होती है पर नहीं, हम तो लकीर के फकीर हैं, वहीं अपनी धुनी रमायेगें, दुसरों को परेशानी हो तो अपने ठेंगे से |
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में राजसमन्द से ही एक चौंतींस वर्षीय स्नातक, व्यवसायी युवक हूं, 1997 में मुझे कम्प्यूटर और नई तकनीकी आदि के बारे में जानने का मौका मिला तभी से हमेशा कुछ ना कुछ सीखने की कोशिश करता हूं | इसी क्रम में राजसमन्द के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देने वेबसाईट, वह भी हमारी सरल सुलभ हिन्दी भाषा में बनाने का
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