Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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क्या कहा डर, और वो भी साईकिल से

May 16th, 2015 · 1 टिप्पणी · आपबीती

मेरे एक बचपन के सहपाठी दोस्त हैं, बडे ही भोले और मस्त जीव, आजकल टीचर हें | अभी कुछ समय के अन्तराल में वे मुझसे मिले, वे मोटरसाईकिल पर थे, तो अनायास ही मुझे बचपन में उनका साईकिल नहीं सीखने व चलाने के पीछे का डर याद आ गया | डर वाकई में बहुत बडी चीज हैं, किसी व्यक्ति को यदि किसी चीज से डर बैठ जाये तो बडी मुश्किल पैदा हो जाती हे | जैसे कि छुटपन में जब हम लोग तालाब पर तैरने जाते थे, तो तालाब की पाल पर बने कबूतरखाने की छत पर से कूदने से में बहुत डरा करता था, पर मेरे भाई व दूसरे दोस्त मजे मजे में ये सब खेल की माफिक किया करते थे | तेरना भले ही जानते हो कोई पर लगभग तीस फीट उपर से पानी पर कूदना, डर तो लगता ही था ना भाई | पर उनके लिये ये आम बात थी पर मुझे कोई उस तरफ हाथ पकड कर खींचता भी था तो मेरे तो प्राण ही गले में आ जाते थे |

तो मेरे वो दोस्त साईकिल से जाने क्युं इतना डरा करते थे कि ना तो चलाते ना सीखते, जबकि दूसरे सभी सहपाठी हाथ छोड छोड कर के अपनी छोटी अद्दिया व बडी साईकिलें खेल मैदान में बडे मजे से चलाते थे, लकडी के फट्टे पत्थरों पर तिरछे जमाकर के कूदाते थे या टेढ़े मेढ़े मोडते, या कह लो उस जमाने के स्टंट किया करते थे | मुझे यूं लगता था की या तो वे किसी की साईकिल से बडे बुरे ठुके हुए हैं या कभी ए॓से गिरे हैं कि जेसे कोई ना गिरा हो, तभी इतना डर लगा रहता था उनको | और मुझे तब ये लगता था कि बाकी तो ये महाशय पढ़ाई व अन्य बातों में बडे होशियार हैं पर इस मामले में ये इतने फिसड्डी कैसे हैं, जाने कब ये साईकिलों पर शहर में घूमने के मजे लेंगे | उस समय साईकिल के मालिक होने का मतलब ही रईस होने जेसा था | और मेनें भी दसवी थर्ड डिविजन में पास हो के येन केन अपने पापा से नई साईकिल हथिया ही ली थी | दो चार हम उम्र साईकिल सवार दोस्तों का होना शान समझी जाती थी, वाह क्या दिन थे वे |

तो बात चल रही थी मेरे साईकिलों से डरने वाले दोस्त की, मेनें कहा कि भाई मुझे तुमको व एक और उनके जैसे ही मित्र को अब स्कूटर, मोटरसाईकिल पर जाते आते देखना अच्छा लगता हैं, लगता कि को जैसे किसी को कुछ बाकी था वो मिल गया | दोस्त नें कहा डर से उपर तो निकलना ही था, जिन्दगी सब कुछ सिखा ही देती है, कुछ समय लगता है बस |

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