Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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चिट्ठी आयी है

March 17th, 2007 · अब तक कोई टिप्पणी नहीं की गई · नई खबरें, राजसमन्द जिला

क्या अपने देश की, अपने शहर में रहते हुए घर की आधी रोटी खाना अच्छा है या दूर बाहर कहीं अनजान देश या शहर में जाकर चार रोटी वो भी बटर के साथ अच्छा है ?  इस प्रश्न पर हम कई बार आकर अटक जाते हैं। हमारे सामने ही यहां वहां आस पास एसे ढ़ेर सारे उदाहरण भरे पडे हुए हैं जो लोग बाहर जाकर बहुत सारा पैसा कमा कर वापस अपने देस आना चाहते हैं। पर क्या वे लोग अपने देस में अपने लोगों के बीच वापस आ पाते है ? या फिर आते हैं तो भी फोरमेलिटी करने के लिये, वो भी तब जब परिवार में किसी की डोली उठ रही हो या फिर अर्थी ।

हमने तो महसुस कि या है कि बडे शहरों में जाकर व्यापार या नौकरी करने वाले शादी ब्याह अपने पुराने शहर में ही आकर के करते हैं एसा क्यों ईसके पीछे हमें कुछ कारण लगते हैं जेसे बडे शहरों में जेसे कमाना आसान है वेसे ही खर्चे करना भी अत्यन्त आसान है। जो ठाठ बाठ से शादी आदमी गांव में आकर दो लाख रुपये में कर सकता है वहीं पर उतने पेसों से तो चन्द मेहमानों को बडे शहर में ढ़ंग के होटल में एक दिन खाना भी नहीं खिलाया जा सकता है। क्या यह सच है या फिर ये जो इस तरह के लोग कहते हैं कि हमारा तो परिवार है ये हे वो है, वो छुटता नहीं है इसलिये यहीं ये सब करना पडता है। रोटी के लिये दूर गए भले ही तो क्या हुआ आखिर गये तो हमारी ये जान तो यहीं पर अटकी हुई है ।

यहां छोटे गांव शहरों में कई लोग एसे हैं जिनके पास कमाई के उचित साधन नहीं है व इसलिये वे कोई भी मोके को छोडना नहीं चाहते हैं, चाहे बाहर जाना है या कुछ भी काम करना है फिर चाहे इसके लिये उन्हें कितनी बडी कुरबानी देनी पडे । काफी लोग अपने परिवार सहित बाहर जा कर नहीं रह पाते हैं कारण खर्चा । अपनों से दूर रह कर परए देस में जीना, ये भी कोई जीना है भला। सभी लोग सपने देखते हैं, देखने भी चाहियें आखिर सपने उन्ही लोगों के सच होते हैं जो सपने देखते हैं, व फिर उन्हें क्रियान्वित करने का अथक प्रयास करते हैं। 

पता नहीं क्यों ये मन बार बार यह बात क्यों सोचता है। ये सही है या गलत ? देस की आधी रोटी खाते हुए अपने बुढ़े होते जा रहे माँ बाप के पास ही रहना उचित है या कुछ सालों के लिये कहीं बाहर जाकर पैसा कमा कर लाना ? और क्या लोग वाकई में बाहर से कमा कर अपने शहर आ पाते हैं, हमने तो काफी कम लोगों को एसे देखा है जो फिर से वापस पुराने शहर या गांव में आकर जीवन की नई शुरुआत करते है।  पता नही क्यों हमे लगता है कि एक दिन उपर जाना तो है हि, और फिर पेसे कमाने कि तो कोई लिमिट ही नहीं हैं कोई कितना कमा सकता है, क्या बन सकता है । कहते हैं ना कि फिर तो “स्काई इज द लिमिट” । पर फिर भी अगर मोका है कुछ बनने का कुछ कर दिखाने का तो बाहर जरुर जाना चाहिये। अभी नहीं तो कभी नहीं । पर कई व्यक्ती एसे भी हैं जो ना घर के रहे ना घाट के, मरते हए मां बाबुजी को पानी भी नहीं पिला पाए । अच्छे टेलेन्टेड होने के बावजुट व बाहर जाकर अथक काम करने के बाद भी वे अपनी उस मंजिल को नहीं पा सके। तो क्या वे सहीं है। कुछ नहीं बिगडा है अभी भी, अब तो आ जाओ, फिर से एक बार तुम्हारी अपनी मिट्टी तुम्हें पुकार रही है। हमरे खयाल से एक लिमीट तक अगर कुछ एसा जुगाड हो जाए तो बस फिर क्या है,  ज्यादा पेसे कमाने के पीछे नहीं पडना चाहिये। अपनी मस्ती में मस्त रहो, खुद भी खुश , दुसरे भी खुश । 

या फिर क्यों ना ये प्रयत्न किया जाए कि केसे स्वयं खुश रहना है व केसे अपने परिवार जनों व मित्रगणों को खुश रखना है । पर आजकल तो खुशीयां पेसे से खरीदी जाती है । बिवी नाराज है तो एक सोने की चेन दिलवा दो, उन्हें बडा चैन मिलेगा । बच्चे को खुश करना है तो महंगी बाइक दिलवाओ, बस हो गया काम। खुशियां बाटंने से बढ़ती है व दुख बाटंने से कम होता है। क्युं ना अपने साफ दिल को एक तरह का आईना बनाया जाए व देखा जाए कि कहां है हम, क्या थे, क्या हो गए, और ये क्या कर रहे हैं हम  ? क्या यह सब करने के लिये ही बने है हम, क्या ये सब करना ही आपकी हमारी जिन्दगी का मकसद है,  ? 

हर व्यक्ती दोडा जा रहा है एक प्रकार की अन्धी दौड में, जाने कहां ये रास्ता पहुंच रहा है, किसी को पता नहीं, हर कोई चरम पर जाना चाहता है, पर क्या कोई पहुंच पाया है। बहुत बडी माया है पेसे की, कहते है ना बाप बडा ना भईया, सबसे बडा रुपईया । वेसे देस की रोटी जेसे टापिक पर तो हम एक बडी सी कोपी भर सकते हें । एसी ही वेराग्य की फालतु बातें फिर कभी सहीं। क्यों ना नाम फिल्म से पंकज उधास का गाया हुआ वह प्रसिद् गीत सुना जाए “चिट्ठी आयी है” । आंखों से आंसु छलक ना पडे तो कहना ।

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