Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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रंग रोगान कम्पलीट

March 15th, 2007 · अब तक कोई टिप्पणी नहीं की गई · उत्सव एवं त्योहार, तकनिकी, नई खबरें

लिजीये जी हमारे कार्यस्थल पर अब फिर से नया सा हो गया है। पिछले पांच छः दिन से यही सब रंग रोगान का कार्य चल रहा था, सो हम नेट पर भी आनलाईन नहीं रह पाये। आजकल तो बडी तकलीफ होती है, जब कभी कुछ दिन के लिये इंटरनेट से रिश्ता टुट जाए तब । पहले शुरुआती दिनों में एसा कुछ महसुस नहीं होता था पर अब तो जैसे इस इंटरनेट का नशा सर चढ़ कर बोल रहा है। लत ए॓सी बुरी हो गई है कि अव्वल तो अपने को कहीं जाने का काम नहीं पडता है, और पडता भी है तो जेसे जिस प्रकार शराबी व नशेडी लोग हर कहीं उनका ठीकाना ढ़ुंढ़ ही लेते हैं उस ही प्रकार हमारी निगाहें हर सडक के खंभों साईबर केफे के बने एड या इस तरह के साईन बोर्ड को तलाश करती रहती है। ज्यादा नहीं पर एक आधे घंटे ही अगर नैट पर थोडा समय व्यतीत कर लिया तो मन थोडा हल्का हो जाता हैं, एसा महसुस होता है कि अब सारे जरुरी काम हो गये हैं अब कुछ भी आलतु फालतु काम हो तो देख लेते हैं, हालांकि जरुरी क्या है व आलतु फालतु काम क्या क्या होते हैं वे हमारे जेसे ईन्टरनेट के लतीं लोग भली भांती जानते ही होंगे ।

दिन भर नेट पर आनलाईन रहो तो कुछ खास काम याद नहीं आते है, पर जेसे ही नेट से कुछ घन्टों या दिनों के लिये दुर जाओ की ये नेट का जाला फिर से हमें याद करने लगता है, व धीरे धीरे सारे खास जरुरी काम याद आने लगते हैं। 

पेन्टर साहब से सौदा तय होने के बाद रंग रोगान लाया गया जिनमें ये पुट्टी, प्राईमर, प्लास्टीक पेन्ट, आईल पेन्ट, ब्रश, रोलर, रेतमाल के पत्ते, तारपीन का तेल व टचवुड का पोलिश सागवान के लिये आदि थे। पेन्टर साहब ने कहा कि पहले थोडी घिसाई करेंगे फिर एक हाथ प्राईमर का फिर, प्लास्टिक पेन्ट का कलर, फिर लास्ट में एक बार घिसाई, हल्की पु्ट्टी व फाईनल टच करेंगे ।  अब आप पुछेंगे कि ये पेन्ट का काम अभी क्यों, अभी तो दिवाली भी दुर है। हुआ क्या कि हम लोग काफी पहले से रंग रोगान कराने की सोच रहे थे पर हमेशा काम को टालते आ रहे थे। अब सोमवार व शीतला सप्तमी भी आ गई थी तो छुट्टी तो थी ही । साथ में ही सही पेंटर भी मिल गया, फिर क्या चाहिये था, बस कर डाला । 

अब पेन्टर साहब तो अपने असिस्टेंट के साथ उनका काम कर रहे हैं पर अपने राम जी क्या करे । नींद निकाल कर के व टी.वी. देख देख कर भारी बोर हो गये, फिर साफ सफाई व काम के मामले में भारी आलसी जो ठहरे। अब नेट की कनेक्टीवीटी दुसरे कम्प्युटर पर तो थी नहीं सो उस पर बेठने का मन ही नहीं करता था । बडी मुश्किल से अब जाकर सारा पेन्ट का काम कम्पलीट हुआ है व हम फिर से कम्प्यूटर और इन्टरनेट के मेदान में आ डटे हैं।

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