Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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देखादेखी व होड का फिर से एक नया दौर

February 19th, 2007 · 1 टिप्पणी · नई खबरें, राजसमन्द जिला, हास्य

वेसे तो हर कहीं एक की देखादेखी दुसरे लोग करते ही हे, पर हमारे राजसमन्द में यह देखादेखी करने की रीत काफी पुरानी व बहुतायत में प्रचलित है। यहां एक समय था कि जब यह कांकरोली एक छोटा सा कस्बा था, खेर कस्बा से ज्यादा तो अभी भी नहीं हे, पर उस समय जलचक्की से आगे विरान मैदान थे, इधर मुखर्जी चोराहा व जे.के साईड भी यही हाल था । राजनगर जब कोई तांगे में बेठ कर जाता था तो वह एक अलग शहर सा प्रतीत होता था । तो भई हम बात कर रहे थे हमारे यहां की देखादेखी की । एक दौर आया जब हर कोई जो थोडा सा भी फाईनेन्शियली ठीक ठाक था मार्बल के धन्धे में कुदा, किसी के घुटने फुटे तो किसी का करोबार जम गया । होडाहोड में जाने कितने लोग जो पेसा नहीं चुका पाए , यहां से दिवालिया होकर भाग गए ।

कुछ समय बाद लोगों को मशीनरी व डायमन्ड टुल्स में मार्जीन अच्छा दिखने लगा, ईसके बाद दौर आया कम्प्युटर की दुकानों व साईबरकेफे का, जिनको कम्प्युटर की A B C D भी मालुम नहीं थी। वे लोग भी जाने कहां से इस धन्धे में कुद पडे, ना जाने बाहर से कितने लोग यहां यह धन्धा करने के मकसद से आये थे पर उन्हें वापस उलटे पैर कुछ ही समय में भागना पडा। यहां पर हाल एसा हे कि तीन लोग काम धन्धा छोड कर भाग जाते हैं तो दो नए आ जाते हें हर तरफ कम्पीटीशन। अभी फिलहाल में यहां पर मोबाईल रिपेयरि्ग की दुकाने खुलने का दौर चल रहा है, कुछ समय पहले यकायक दो तीन महीनों में ही हमारे शहर में जुते की चार दुकाने खुली जिनमें से एक तो लिबर्टी का शोरुम है। लगभग सभी शहरी लोगों को पता होगा की दो ‍- तीन साल पहले यहां होडा होड में कितनी आईस्क्रीम व ज्युस की दुकाने खुली थी व अभी कितने उन में से काम धन्धे चला रहें हैं। फिर चला साडी शाँप का दौर, फिर कार्ड व गिफ्ट की दुकानें खुली, हाई टेक हजामत वाले भी आये व गए, कम्प्यूटर कोर्स, ट्युशन चलाने वाले, PMT PET कोचिंग वाले व अंग्रेजी सिखाने वाले आये और गए। एक समय आया जब धडाधड तीन पूल क्लब खुल गए लोगों के मनोंजन के लिये। उसके बाद एसे ही कार डेकोर वाले, रेडीयम के स्टीकर वाले, कचौरी समोसे, चाट आदि की दुकानें वाले आए, धेर्यवान व्यवसाई लोग रह गए हैं, बाकी तो आते जाते रहते हैं।

अभी हाल में ही रेडिमेड के वस्त्रों की दुकाने खुलने का भी दौर जारी है हर कोई यह समझता है कि वो किसी समिती के चन्द उधार के पैसे ला कर, नए जिन्स टी.शर्ट पहन कर के ये धन्धा तो कर ही लेगा । अब करना क्या है,बस अच्छा फ्रेन्ड सर्कल मेन्टेन करना है 250 की जिन्स या टी.शर्ट 300 या फिर 350 में बेचना है ना पढ़ाई का लोचा ना हिसाब का टेन्शन । सक्सेस तो जैसे हो ही जाएंगे। पता नहीं आजकल की युवा पीढ़ी को क्या होता जा रहा हे वे लोग थोडे से अल्प परिश्रम में व कम से कम समय में ढ़ेर सारा पैसा कमाना चाहते हैं ।  

अपना तो भई नए काम धन्धे चालू करने वाले लोगों को यही कहना है कि भाई, पहले तो काम धन्धे का प्रशिक्षण भली भांती प्रप्त करें ईसके बाद चाहे छोटे स्तर से काम शुरु किया जाए तो कोई गम नहीं पर मन में दृढ़ संकल्प करें की सफल हो कर ही दम लेंगे, व इसके लिये पुरे प्रयास करें । किसी की देख देखी नहीं करें । फिर भी काम सही नहीं चल रहा हे तो धेर्य रखें क्योंकि किसी भी काम में सफलता प्रप्त करने में थोडा समय तो लगता ही हे। सब कुछ अल्प समय व कम मेहनत में ही हो जाता तो लोग एसे ही जिन्दल, अंबानी नहीं बनते।

इधर कुछ लोग एसे हें यहां जो अपने अपने वाहनों पर देखादेखी में बडे मजे से PRESS या POLICE लिखवा कर घुम रहे हें। पता नहीं एसा करने से क्या खास वट्ठ पडता है इनका अन्य लोगों पर। एक बार की बात हे हम जब टेक्सी करके कहीं घुमने गए तो जिस गाडी में हम लोग गए थे उस पर बडा सा PRESS लाल रगं में लिख हुआ था, हमें तो कारण जानने कि इच्छा हुई व हम ड्राइवर अंकल से पुछ बेठे, उन्होने बताया की एसा लिखने से हजार झंझट से मुक्ती मिल जाती है। पुलिस वाले भी बिना कारण नहीं रोकते, नो एनट्री में भी जा सकते हैं और सभी सोचते हैं कि प्रेस वाले जा रहें हें कुछ विशेष कारण होगा वगेरह वगेरह । ईस प्रकार से ही काफी लोग अपने वाहनों पर POLICE लिखवा कर व वेसे ही मोनो व कलर का प्रयोग करते हुए जनता को जेसे बताना चाहते हें कि हम पुलिस में हैं या हमारे फलां फलां चन्द जी पुलिस में है तो फोकट में खाली पीली अडने का नहीं । पता नहीं क्यों लोग एसा करते हैं ।

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