Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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वर्ष 2011 और संगीत व मनोरंजन जगत की विशेष हानि

December 23rd, 2011 · नई खबरें

जी हां यह एकदम सही बात हैं कि वर्ष 2011 में संगीत और मनोरंजन जगत को विशेष हानि हुई | वैसे तो हर साल कुछ ना कुछ विशेष होता ही है पर इस बार साल के आखिरी समय में कुछ ए॓सा घटित हुआ है जो अनोखा हैं | जहां इस साल दुनिया भर में कुख्यात क्रूर नेता गद्दाफी और आतंकवादी ओसामा बिन लादेन की मृत्यु हुई, वही हमारे भारतीय सिनेमा और संगीत जगत के महान सितारे देव आनंद, शम्मी कपूर साहब हमसे बिछड़ गये, साथ ही गजल सम्राट जगजीत सिंह और महान लेखक, संगीतकार, गीतकार, और बहुमुखी प्रतिभा के धनी भूपेन हजारिका और नवाब पटौदी जेसे जोरदार क्रिकेटर भी हम सब को छोड कर चले गये | निश्चित ही ये साल इस लिहाज से बडा ही दुखदायी रहा |

बडे अनमोल हीरों को हमने खोया है पर दुनिया का क्या है, चलती रही है चलती रहेगी | साथ ही इस बार ये साल हमसे मणिकौल जैसे निर्देशक, एक्टर नवीन निश्चल और मिं. इंडिया के विलेन बॉब क्रिस्टो को भी छीन ले गया हैं, जो अपने बेहतर कार्यों के लिये जाने जाते हैं | ये लोग अब हमसे विदा हो चुके हैं पर ये सारे लोग अपने बहुत उत्कृष्ठ कार्यों के कारण संगीत और मनोरंजन जगत में हमेशा जाने जायेंगे | साथ ही वे अपने हजारों लाखों प्रशंसकों की यादों में हमेशा ही जिंवित रहेंगे। कहते हैं अच्छे लोगों को भगवान जल्दी उपर बुला लेते हैं, शायद सही हैं |

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शिक्षक त्रिलोकी मोहन पुरोहित

December 18th, 2011 · शख्सियत

राजसमंद की ख्यतिप्राप्त शख्सियतों में से आज हम मिलवाते हैं आपको कांकरोली के एक अति विशिष्ट शिक्षक त्रिलोकी मोहन जी पुरोहित से | कांकरोली के त्रिलोकी मोहन जी पुरोहित पेशे से एक टीचर यानी शिक्षक हैं, और शिक्षा प्रदान करना ही इनका पेशा हैं | ये बहुत ही प्रखर बुद्धि वाले व्यक्ति हैं | मंच संचालन करना हो, संस्कृत के बारे मे जानकारी की बात हो, या ज्योतिष के बारे में को बात हो, इनका कोई सानी नहीं, शिक्षक होने के कारण इनके नालेज का दायरा बहुत विस्तृत है | एक साधारण से टीचर के पेशे वाला कोई व्यक्ति इतना असाधारण बन जाए तो आश्चर्य की बात है ही | पर पुरोहित सा. ने सब कुछ अपनी स्वयं की मेहनत से हासिल किया |

स्कूल के दिनों में त्रिलोकी मोहन जी का पढ़ाने का तरीका भी विशेष प्रकार का था यानी नई शैली लिये था, बच्चो से दोस्ताना व्यवहार करना और छोटे मोटे उदाहरण आदि से समझाना आदि, और शायद इस कारण ही वे जिस जिस स्कूल में पढ़ाने गये, वहां के बच्चे आज भी गुरुदेव का नाम लेते नहीं थकते | इन सब के साथ ही त्रिलोकी मोहन जी समाज, राज्य व देश के प्रति गंभीर जज्बा रखते हैं और उम्दा लेखक और रचनाकार भी हैं, इनकी व्यंग्य रचनाएं तो बस देखे ही बनती है, पढ़ियेगा इन्हें एक बार जरुर |

गुरुदेव त्रिलोकी मोहन पुरोहित के ब्लाग का पता हैः http://tmpurohit.blogspot.com

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महाराणा राज सिंह जी

October 14th, 2011 · इतिहास के पन्नो से, राजसमन्द जिला

कुछ बातें महाराणा राज सिंह जी के बारे में:

maharana raj singh ji

maharana raj singh ji

कांकरोली राजसमंद या कहें की राजनगर के राजा महाराणा राज सिंह जी का जन्म 24 सितंबर 1629 को हुआ | उनके पिता महाराणा जगत सिंह जी और मां महारानी मेडतणीजी थी | मात्र 23 वर्ष की छोटी उम्र में यानी 1652-53 में उनका राज्याभिषेक हुआ था | महाराणा राज सिंहजी ना सिर्फ एक कलाप्रेमी, जन जन के चहेते, वीर और दानी पुरुष थे बल्कि वे धर्मनिष्ठा, प्रजापालक और शासन संचालन में भी बहुत कुशल थे | उनके कार्यकाल के दौरान सभी को उनकी दानवीरता के बारे में जानने का मौका मिला |

महाराणा राज सिंह जी ने कई बार सोने चांदी, अनमोल धातुएं, रत्नादि के तुलादान करवाये और योग्य लोगों को सम्मान से नवाजा | राजसमंद झील के किनारे नौचोकी पर बडे बडे पचास प्रस्तर पट्टों पर उत्कीर्ण राज प्रशस्ति शिलालेख बनवाये जो आज भी नौचोकी पर देखे जा सकते हैं | इनके अलावा उन्होनें अनेक बाग बगीचे, फव्वारे, मंदिर, बावडियां, राजप्रासाद, द्धार और सरोवर आदि भी बनवाये जिनमें से कुछ कालान्तर में नष्ट हो गये | उनका सबसे बडा कार्य राजसमंद झील पर पाल बांधना और कलापुर्ण नौचोकी का निर्माण कहा जा सकता है जिसमें उस जमाने में करोडों रुपयों की लागत लगी थी |

राणा राज सिंह जी की वीरता और प्रभुभक्तिः

महाराणा राज सिंह जी एक महान इश्वर भक्त भी थे द्धारिकाधीष जी और श्रीनाथ जी के मेवाड में आगमन के समय स्वयं पालकी को उन्होने कांधा दिया और स्वागत किया, जिससे हमें उनकी धर्मनिष्ठा के बारे में पता लगता है | महाराणा राज सिंहजी ने बहुत से लोगों को अपने शासन काल में आश्रय दिया, उन्हे दूसरे आक्रमणकारी लोगों से बचाया व सम्मान पुर्वक जीने का अवसर दिया | इसी कडी में उन्होने एक राजपूत राजकुमारी चारूमति के सतीत्व की भी रक्षा की | महाराणा की वीरता का इससे बडा क्या उदाहरण हो सकता है, कि अपने से काफी शक्तिशाली राजा ओरंगजेब को भी जजिया कर हटाने और निरपराध भोली जनता को परेशान ना करने के बारे में पत्र भेज डाला | कहा जाता है कि उस समय मुगल बादशाह ओरंगजेब की शक्ति अपने चरम पर थी, पर प्रजापालक राजा राजसिहजी ने इस बात की कोई परवाह नहीं की |

महाराणा राज सिंह जी के शासन काल का समय एक स्वर्णिम युग थाः

राणा राज सिंह स्थापत्य कला के बहुत प्रेमी थे | कुशल शिल्पकार, कवि, साहित्यकार और दस्तकार उनके शासन के दौरान हमेशा उचित सम्मान पाते रहे | वीर योद्धाओं व योग्य सामंतो को वे खुद सम्मानित करते थे अतः कहा जा सकता है कि राणा राज सिंहजी के शासन काल का समय मेवाड में एक तरह का स्वर्णिम युग था |

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जिदंगी का फलसफा

October 12th, 2011 · उलझन

दलाई लामा

दलाई लामा

वाह क्या बात कही है लामाजी नेः

वाकई आज के आम आदमी की जिदंगी यही है, हमेशा रोजाना दुखी होते हुए थोडी सी खुशी मिलने का चांस भी अगर होता है तो उसे हम कल पर छोड देते हैं | आज क्यों नहीं किया जाए वह जिससे हमें कुछ खुशी मिलती हें | शुरु में पैसा कमाने के लिये शरीर और सेहत से हम खेलते हैं, पैसा भी खूब कमाते हैं पर खर्च,,, नहीं नहीं एक दमडी खर्चा कैसे हो जाए |

और जीवन के अंत में जब डाक्टर आखिरी रास्ता मोर्निंग व इवनिंग वाक बताते हैं तो हम कमर कस कर घूमना चालू कर देते हैं, जैसे पूरी जिंदगी की सेहत का रखरखाव अभी बस कुछ दिन महीने घुमने से हो जाएगा | जीते ए॓से हैं कि जैसे मौत कभी आएगी ही नहीं और जब मरते हैं तो लगता है कि कभी जीये ही नहीं |

बस आए और चले गये…………..अरे किया क्या, अपने आप को बुद्धू बनाते रहे हम ………… कितने लोगों के चेहरे पर हम खुशी ला सके………कितने लोग है जो हमें वाकई में याद रखेगें |

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कुंभलगढ़ दुर्ग का महत्व

September 29th, 2011 · कुंभलगढ़

गौरवशाली इतिहास का साक्षी अजेय कुंभलगढ़ दुर्ग  :

यहीं पर जन्म हुआ था महाराणा प्रताप का जिन्होने आजीवन संघर्ष किया और मुगलों के साथ लोहा लिया | प्रताप ने पूरे जीवन भर मुगलों के साथ स्वतन्त्रता के लिये संघर्ष किया और युद्ध में छापामार प्रणाली का उपयोग किया ‌| उस जमाने में मुगल साम्राज्य अपने समय का सबसे वृहद और विशाल और ताकतवर साम्राज्य था पर प्रताप नें कभी भी मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की, वे आजीवन जंगलों में विचरण करते रहे, लडते रहे पर कभी समर्पण नहीं किया |

kumbhalgarh light and sound

kumbhalgarh light and sound

महाराणा प्रताप नें स्वाभिमान के साथ अपना माथा उंचा रखा, प्रताप के जीवनकाल का अधिकांश समय कु्भंलगढ़ में ही बीता | क्यूं कि यहां उंचे गढ़ पर रहते हुए मुगल फौजों का सामना चित्तौडगढ़ दुर्ग की तुलना में बहुत ही बेहतर तरीके से किया जा सकता था |

चारों तरफ अरावली की पहाडीयों से घिरा होने के कारण यह कु्भलगढ़ का किला अपने समय में बहुत ही दुर्गम स्थल पर था और पहाडों की तलहटी में होने वाली छोटी से छोटी हलचल को भी दूर से ही देखा जा सकता था, और उंचाई पर चौकसी कर रहे विश्वसनीय दूत दूर की गतिविधियों की सुचना अपने महाराणा को पहुंचा सकते थे | महाराणा प्रताप युद्ध कला में बडे निपुण थे ‌और राष्ट्रभक्त तथा स्वतन्त्रता, स्वाधीनताप्रेमी होने के कारण आज भी पूरे भारतवर्ष के लोगों के दिलों में बसते है | उन्हें प्रातः स्मरणीय भी इसलिये ही कहा जाता है | प्रताप जैसे महान महाराजा का प्रातः एक बार स्मरण करना ही मोक्ष प्राप्ति के जैसा है |

कुंभलगढ़ के आसपास पहाडी क्षेत्र होने के कारण यहां काफी आदिवासी भील रहते थे, प्रताप नें ऊन्हे अपना मित्र बनाया | कहा जाता है कि एक एक भील दस दस किलोमीटर की दूरी पर पहाडों की चोटी पर रहते हुए भी पहाड की तलहटी में सेना की हलचल आदि की सूचना तुरंत एक दूसरे को देते थे |

उनके तरीके भी अलग थे जेसे थे ढ़ोल बजाकर या आग जलाकर धु्ंए से खतरे की सूचना पहु्ंचाना | इस तरीके से प्रताप का सारा काम आसान हो जाता था | छोटी मोटी हलचल की सूचना भी प्रताप को शीघ्र मिल जाती थी | इस तरह छापामार प्रणाली से तुरंत या तो मुगलों की सेना की टुकडियों का या तो रसद लूट लिया जाता या उन्हे अचानक आक्रमण से मार डाला जाता | यह एक खास तरह की युद्ध प्रणाली थी जिसे गुरिल्ला युद्ध या छपामार युद्ध प्रणाली कहा जाता है यह महाराणा प्रताप नें खुद अल्प साधनों के साथ जंगल में विकसित की थी |

अकबर प्रताप को हराने के लिये लालायित था और उसकी मुगल फौजें कुंभलगढ़ पर लगातार हमले करती रहती थी | एक बार किले में रसद सामग्री खत्म हो जाने की वजह से प्रताप को अपने सहयोगियों के साथ रणकपुर की तरफ जाना पडा था औ‌र थोडे से कुछ समय के लिये मुगलों का इस किले पर कब्जा हो गया था | पर जल्दी ही महाराणा प्रताप नें पुनः अपने लोगों को एकत्र किया और आक्रमण करके इसे वापिस हासिल किया, साथ ही महाराणा प्रताप नें बांसवाडा, डूंगरपुर और अन्य राज्यों के राजाओं को भी मुगलों की अधीनता से मुक्ति दिलवायी | समूचा कुंभलगढ़ दुर्ग साक्षी है मेवाड के शासकों के अनूठे शौर्य का उनके कला प्रेम और देशप्रेम का | यहां कुंभलगढ़ में हमेशा से ही साहित्य व कला को बहुत संरक्षण मिला |

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