Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

Rajsamand District, Rajasthan header image 1

महाराणा राज सिंह जी

October 14th, 2011 · इतिहास के पन्नो से, राजसमन्द जिला

कुछ बातें महाराणा राज सिंह जी के बारे में:

maharana raj singh ji

maharana raj singh ji

कांकरोली राजसमंद या कहें की राजनगर के राजा महाराणा राज सिंह जी का जन्म 24 सितंबर 1629 को हुआ | उनके पिता महाराणा जगत सिंह जी और मां महारानी मेडतणीजी थी | मात्र 23 वर्ष की छोटी उम्र में यानी 1652-53 में उनका राज्याभिषेक हुआ था | महाराणा राज सिंहजी ना सिर्फ एक कलाप्रेमी, जन जन के चहेते, वीर और दानी पुरुष थे बल्कि वे धर्मनिष्ठा, प्रजापालक और शासन संचालन में भी बहुत कुशल थे | उनके कार्यकाल के दौरान सभी को उनकी दानवीरता के बारे में जानने का मौका मिला |

महाराणा राज सिंह जी ने कई बार सोने चांदी, अनमोल धातुएं, रत्नादि के तुलादान करवाये और योग्य लोगों को सम्मान से नवाजा | राजसमंद झील के किनारे नौचोकी पर बडे बडे पचास प्रस्तर पट्टों पर उत्कीर्ण राज प्रशस्ति शिलालेख बनवाये जो आज भी नौचोकी पर देखे जा सकते हैं | इनके अलावा उन्होनें अनेक बाग बगीचे, फव्वारे, मंदिर, बावडियां, राजप्रासाद, द्धार और सरोवर आदि भी बनवाये जिनमें से कुछ कालान्तर में नष्ट हो गये | उनका सबसे बडा कार्य राजसमंद झील पर पाल बांधना और कलापुर्ण नौचोकी का निर्माण कहा जा सकता है जिसमें उस जमाने में करोडों रुपयों की लागत लगी थी |

राणा राज सिंह जी की वीरता और प्रभुभक्तिः

महाराणा राज सिंह जी एक महान इश्वर भक्त भी थे द्धारिकाधीष जी और श्रीनाथ जी के मेवाड में आगमन के समय स्वयं पालकी को उन्होने कांधा दिया और स्वागत किया, जिससे हमें उनकी धर्मनिष्ठा के बारे में पता लगता है | महाराणा राज सिंहजी ने बहुत से लोगों को अपने शासन काल में आश्रय दिया, उन्हे दूसरे आक्रमणकारी लोगों से बचाया व सम्मान पुर्वक जीने का अवसर दिया | इसी कडी में उन्होने एक राजपूत राजकुमारी चारूमति के सतीत्व की भी रक्षा की | महाराणा की वीरता का इससे बडा क्या उदाहरण हो सकता है, कि अपने से काफी शक्तिशाली राजा ओरंगजेब को भी जजिया कर हटाने और निरपराध भोली जनता को परेशान ना करने के बारे में पत्र भेज डाला | कहा जाता है कि उस समय मुगल बादशाह ओरंगजेब की शक्ति अपने चरम पर थी, पर प्रजापालक राजा राजसिहजी ने इस बात की कोई परवाह नहीं की |

महाराणा राज सिंह जी के शासन काल का समय एक स्वर्णिम युग थाः

राणा राज सिंह स्थापत्य कला के बहुत प्रेमी थे | कुशल शिल्पकार, कवि, साहित्यकार और दस्तकार उनके शासन के दौरान हमेशा उचित सम्मान पाते रहे | वीर योद्धाओं व योग्य सामंतो को वे खुद सम्मानित करते थे अतः कहा जा सकता है कि राणा राज सिंहजी के शासन काल का समय मेवाड में एक तरह का स्वर्णिम युग था |

→ 3 टिप्पणींयांटैग्सः ······

जिदंगी का फलसफा

October 12th, 2011 · उलझन

दलाई लामा

दलाई लामा

वाह क्या बात कही है लामाजी नेः

वाकई आज के आम आदमी की जिदंगी यही है, हमेशा रोजाना दुखी होते हुए थोडी सी खुशी मिलने का चांस भी अगर होता है तो उसे हम कल पर छोड देते हैं | आज क्यों नहीं किया जाए वह जिससे हमें कुछ खुशी मिलती हें | शुरु में पैसा कमाने के लिये शरीर और सेहत से हम खेलते हैं, पैसा भी खूब कमाते हैं पर खर्च,,, नहीं नहीं एक दमडी खर्चा कैसे हो जाए |

और जीवन के अंत में जब डाक्टर आखिरी रास्ता मोर्निंग व इवनिंग वाक बताते हैं तो हम कमर कस कर घूमना चालू कर देते हैं, जैसे पूरी जिंदगी की सेहत का रखरखाव अभी बस कुछ दिन महीने घुमने से हो जाएगा | जीते ए॓से हैं कि जैसे मौत कभी आएगी ही नहीं और जब मरते हैं तो लगता है कि कभी जीये ही नहीं |

बस आए और चले गये…………..अरे किया क्या, अपने आप को बुद्धू बनाते रहे हम ………… कितने लोगों के चेहरे पर हम खुशी ला सके………कितने लोग है जो हमें वाकई में याद रखेगें |

→ 1 टिप्पणींटैग्सः ····

कुंभलगढ़ दुर्ग का महत्व

September 29th, 2011 · कुंभलगढ़

गौरवशाली इतिहास का साक्षी अजेय कुंभलगढ़ दुर्ग  :

यहीं पर जन्म हुआ था महाराणा प्रताप का जिन्होने आजीवन संघर्ष किया और मुगलों के साथ लोहा लिया | प्रताप ने पूरे जीवन भर मुगलों के साथ स्वतन्त्रता के लिये संघर्ष किया और युद्ध में छापामार प्रणाली का उपयोग किया ‌| उस जमाने में मुगल साम्राज्य अपने समय का सबसे वृहद और विशाल और ताकतवर साम्राज्य था पर प्रताप नें कभी भी मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की, वे आजीवन जंगलों में विचरण करते रहे, लडते रहे पर कभी समर्पण नहीं किया |

kumbhalgarh light and sound

kumbhalgarh light and sound

महाराणा प्रताप नें स्वाभिमान के साथ अपना माथा उंचा रखा, प्रताप के जीवनकाल का अधिकांश समय कु्भंलगढ़ में ही बीता | क्यूं कि यहां उंचे गढ़ पर रहते हुए मुगल फौजों का सामना चित्तौडगढ़ दुर्ग की तुलना में बहुत ही बेहतर तरीके से किया जा सकता था |

चारों तरफ अरावली की पहाडीयों से घिरा होने के कारण यह कु्भलगढ़ का किला अपने समय में बहुत ही दुर्गम स्थल पर था और पहाडों की तलहटी में होने वाली छोटी से छोटी हलचल को भी दूर से ही देखा जा सकता था, और उंचाई पर चौकसी कर रहे विश्वसनीय दूत दूर की गतिविधियों की सुचना अपने महाराणा को पहुंचा सकते थे | महाराणा प्रताप युद्ध कला में बडे निपुण थे ‌और राष्ट्रभक्त तथा स्वतन्त्रता, स्वाधीनताप्रेमी होने के कारण आज भी पूरे भारतवर्ष के लोगों के दिलों में बसते है | उन्हें प्रातः स्मरणीय भी इसलिये ही कहा जाता है | प्रताप जैसे महान महाराजा का प्रातः एक बार स्मरण करना ही मोक्ष प्राप्ति के जैसा है |

कुंभलगढ़ के आसपास पहाडी क्षेत्र होने के कारण यहां काफी आदिवासी भील रहते थे, प्रताप नें ऊन्हे अपना मित्र बनाया | कहा जाता है कि एक एक भील दस दस किलोमीटर की दूरी पर पहाडों की चोटी पर रहते हुए भी पहाड की तलहटी में सेना की हलचल आदि की सूचना तुरंत एक दूसरे को देते थे |

उनके तरीके भी अलग थे जेसे थे ढ़ोल बजाकर या आग जलाकर धु्ंए से खतरे की सूचना पहु्ंचाना | इस तरीके से प्रताप का सारा काम आसान हो जाता था | छोटी मोटी हलचल की सूचना भी प्रताप को शीघ्र मिल जाती थी | इस तरह छापामार प्रणाली से तुरंत या तो मुगलों की सेना की टुकडियों का या तो रसद लूट लिया जाता या उन्हे अचानक आक्रमण से मार डाला जाता | यह एक खास तरह की युद्ध प्रणाली थी जिसे गुरिल्ला युद्ध या छपामार युद्ध प्रणाली कहा जाता है यह महाराणा प्रताप नें खुद अल्प साधनों के साथ जंगल में विकसित की थी |

अकबर प्रताप को हराने के लिये लालायित था और उसकी मुगल फौजें कुंभलगढ़ पर लगातार हमले करती रहती थी | एक बार किले में रसद सामग्री खत्म हो जाने की वजह से प्रताप को अपने सहयोगियों के साथ रणकपुर की तरफ जाना पडा था औ‌र थोडे से कुछ समय के लिये मुगलों का इस किले पर कब्जा हो गया था | पर जल्दी ही महाराणा प्रताप नें पुनः अपने लोगों को एकत्र किया और आक्रमण करके इसे वापिस हासिल किया, साथ ही महाराणा प्रताप नें बांसवाडा, डूंगरपुर और अन्य राज्यों के राजाओं को भी मुगलों की अधीनता से मुक्ति दिलवायी | समूचा कुंभलगढ़ दुर्ग साक्षी है मेवाड के शासकों के अनूठे शौर्य का उनके कला प्रेम और देशप्रेम का | यहां कुंभलगढ़ में हमेशा से ही साहित्य व कला को बहुत संरक्षण मिला |

→ 1 टिप्पणींटैग्सः ········

पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता पर आल्हाखंड की कविता – संयोगिता का अपहरण

September 28th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

पृथ्वीराज चौहान के जीवन की रोमांचक कहानीः

prithviraj chauhan

prithviraj chauhan

पृथ्वीराज चौहान का जन्म अजमेर के वीर राजपूत महाराजा सोमश्वर के यहां हुआ था | पृथ्वीराज मध्यकालीन भारतीय इतिहास के सबसे बहुत ही प्रसिद्ध हिन्दू राजपूत राजाओं में एक थे उनका राज्य राजस्थान और हरियाणा तक फैला हुआ था | वे बहुत ही साहसी, युद्ध कला मे निपुण और अच्छे दिल के राजा थे, साथ ही बचपन से ही तीर कमान और तलवारबाजी के शौकिन थे |

पृथ्वीराज चोहान को कन्नौज के राजा जयचंद की पुत्री संयोगिता पसंद आ गई, राजकुमारी संयोगिता से प्रेम होने पर, पृथ्वीराज चौहान ने स्वयंवर से ही उठा लिया और गन्धर्व विवाह किया और यही कहानी अपने आप में एक मिसाल बन गई | चन्द्रवरदाई और पृथ्वीराज चौहान दोंनो बचपन के मित्र थे और बाद में आगे चलकर चन्द्रवरदाई एक कवि और लेखक बने जिन्होनें हिंदी/अपभ्रंश में एक महाकाव्य पृथ्वीराज रासो लिखा |

एक विदेशी आक्रमणकारी मुहम्मद गौरी ने बार बार युद्ध करके पृथ्वीराज चौहान को हराना चाहा पर ए॓सा ना हो पाया | पृथ्वीराज चौहान ने १७ बार मुहम्मद गोरी को युद्ध में परास्त किया और दरियादिली दिखाते हुए कई बार माफ भी किया और छोड दिया पर अठारहवीं बार मुहम्मद गोरी नें जयचंद की मदद से पृथ्वीराज चौहान को युद्ध में हार दी और बंदी बना कर अपने साथ ले गया | पृथ्वीराज चौहान और चन्द्रवरदाई दोंनो ही बन्दी बना लिये गये और सजा के तौर पर पृथ्वीराज की आखें गर्म सलाखों से फोड दी गई | अंत में चन्द्रवरदाई जो कि एक कवि और खास दोस्त था पृथ्वीराज चौहान का | दोनों नें भरे दरबार में गौरी को मारने की योजना बनाई जिसके तहत चन्द्रवरदाई नें काव्यात्मक भाषा में एक पक्तिं कहीः

“चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है मत चुके चौहान।”

और अंधे होने के बावजुद पृथ्वीराज चौहान नें इसको सुना और बाण चलाया जिसके फलस्वरूप मुहम्मद गौरी का प्राणांत हो गया । फिर चन्द्रवरदाई और पृथ्वीराज चौहान दोंनों ने पकडे जाने पर फिर से बंदी जीवन वय्तीत करने के बजाय दोनों नें अपना एक दूसरे को मार डाला | इस तरह पृथ्वीराज ने अपने अपमान का बदला ले लिया | उधर संयोगिता नें जब ये दुखद समाचार सुना तो उसने भी अपने प्राणो का अंत कर दिया |

वाकई में पृथ्वीराज चौहान की एतिहासिक कहानी है बहुत ही जोरदार | पढ़ते सुनते में ही रोंगटे खडे हो जाते हैं | सोचो सच में कैसा आदमी रहा होगा | संयोगिता का अपहरण करके एक कविता हैं आल्हाखंड की, बडी ही रोचक है जरुर पढ़ियेगा |

आल्हाखंडः संयोगिता का अपहरण

आगे आगे पृथ्वीराज हैं, पाछे चले कनौजीराय |
कबहुंक डोला जैयचंद छिने, कबहुंक पिरथी लेय छिनाय |
जौन शूर छीने डोला को, राखे पांच कोस पर जाय |
कोस पचासक डोला बढ़िगो, बहुतक क्षत्री गये नशाय |
लडत भिडत दोनो दल आवैं, पहुंचे सौरां के मैदान |
राजा जयचंद नें ललकारो, सुनलो पृथ्वीराज चौहान |
डोला ले जई हौ चोरी से, तुम्हरो चोर कहे हे नाम |
डोला धरि देउ तुम खेतन में, जो जीते सो लय उठाय |
इतनी बात सुनि पिरथी नें , डोला धरो खेत मैदान |
हल्ला हवईगो दोनों दल में, तुरतै चलन लगी तलवार |
झुरमुट हवईग्यो दोनों दल को, कोता खानी चलै कटार |
कोइ कोइ मारे बन्दूकन से, कोइ कोइ देय सेल को घाव |
भाल छूटे नागदौनी के, कहुं कहुं कडाबीन की मारू |
जैयचंद बोले सब क्षत्रीन से, यारो सुन लो कान लगाय |
सदा तुरैया ना बन फुलै, यारों सदा ना सावन होय |
सदा न माना उर में जनि हे, यारों समय ना बारम्बार |
जैसे पात टूटी तरुवर से, गिरी के बहुरि ना लागै डार |
मानुष देही यहु दुर्लभ है, ताते करों सुयश को काम |
लडिकै सन्मुख जो मरिजैहों, ह्वै है जुगन जुगन लो नाम |
झुके सिपाही कनउज वाले, रण में कठिन करै तलवार |
अपन पराओ ना पहिचानै, जिनके मारऊ मारऊ रट लाग |
झुके शूरमा दिल्ली वाले, दोनों हाथ लिये हथियार |
खट खट खट खट तेग बोलै, बोले छपक छपक तलवार |
चले जुन्नबी औ गुजराती, उना चले विलायत वयार |
कठिन लडाई भई डोला पर, तहं बही चली रक्त की धार |
उंचे खाले कायर भागे, औ रण दुलहा चलै पराय |
शूर पैंतीसक पृथीराज के, कनउज बारे दिये गिराय |
एक लाख झुके जैचंद कें, दिल्ली बारे दिये गिराय |
ए॓सो समरा भयो सोरौं में, अंधाधु्ंध चली तलवार |
आठ कोस पर डोला पहुंचै, जीते जंग पिथोरा राय |

→ 12 टिप्पणींयांटैग्सः ·······

हल्दीघाटी का युद्ध – महाराणा प्रताप, Maharana Pratap and War of Haldighati

September 22nd, 2011 · इतिहास के पन्नो से, प्रमुख दर्शनीय स्थल

हल्दीघाटी का युद्धः

haldighati darrah

haldighati darrah

मुगलों और महाराणा प्रताप की सेना के बीच हल्दीघाटी में एक ए॓तिहासिक युद्ध हुआ | युद्ध बडा घमासान था | युद्ध के दौरान दोनों सेनाओं के हजारों सेनिक मारे गये, पर यह युद्ध अनिर्णीत ही रहा |

हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप के प्रिय अश्व चेतक के बलिदान को क्या कोई भूल सकता है | महाराणा प्रताप के प्रिय घोडे चेतक का बलिदान आज के समय में भी प्रासंगिक हैं ‌|

पर इसके पश्चात भी महाराणा प्रताप नें संघर्ष करना नहीं छोडा और अपने भील सहयोगियों की सेना के साथ अरावली की पहाडीयों में छिप छिप कर वे मुगल सेना पर बारम्बार वार करते रहे | मेवाड के भील जाति के लोग अपनी निष्ठा ‌और निश्छल प्रेम के कारण जाने जाते हैं ‌| भीलों नें प्रताप का पल पल साथ दिया |

इसी कारण ही महाराणा प्रताप को राजस्थान और‌ मेवाड में देवता तुल्य माना जाता रहा हैं | उन्हें प्रातः स्मरणीय भी कहा जाता है, यह मेवाड के लोगों की असीम श्रद्धा और भावना है |

महाराणा प्रताप का संघर्ष एक व्यक्ति, जाति विश॓ष या किसी छोटे बडे भूभाग का संघर्ष नहीं था, यह एक तरह का स्वाधीनता का संघर्ष था, हजारों लोग उनके साथ थे, और उन्हे आम जनता का सहयोग प्राप्त हुआ | प्रताप जनता के प्रति वफादार थे औ‌र स्वहित की बजाय पूरी प्रजा के हित की बात करते थे |

→ 5 टिप्पणींयांटैग्सः ·····