Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता पर आल्हाखंड की कविता – संयोगिता का अपहरण

September 28th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

पृथ्वीराज चौहान के जीवन की रोमांचक कहानीः

prithviraj chauhan

prithviraj chauhan

पृथ्वीराज चौहान का जन्म अजमेर के वीर राजपूत महाराजा सोमश्वर के यहां हुआ था | पृथ्वीराज मध्यकालीन भारतीय इतिहास के सबसे बहुत ही प्रसिद्ध हिन्दू राजपूत राजाओं में एक थे उनका राज्य राजस्थान और हरियाणा तक फैला हुआ था | वे बहुत ही साहसी, युद्ध कला मे निपुण और अच्छे दिल के राजा थे, साथ ही बचपन से ही तीर कमान और तलवारबाजी के शौकिन थे |

पृथ्वीराज चोहान को कन्नौज के राजा जयचंद की पुत्री संयोगिता पसंद आ गई, राजकुमारी संयोगिता से प्रेम होने पर, पृथ्वीराज चौहान ने स्वयंवर से ही उठा लिया और गन्धर्व विवाह किया और यही कहानी अपने आप में एक मिसाल बन गई | चन्द्रवरदाई और पृथ्वीराज चौहान दोंनो बचपन के मित्र थे और बाद में आगे चलकर चन्द्रवरदाई एक कवि और लेखक बने जिन्होनें हिंदी/अपभ्रंश में एक महाकाव्य पृथ्वीराज रासो लिखा |

एक विदेशी आक्रमणकारी मुहम्मद गौरी ने बार बार युद्ध करके पृथ्वीराज चौहान को हराना चाहा पर ए॓सा ना हो पाया | पृथ्वीराज चौहान ने १७ बार मुहम्मद गोरी को युद्ध में परास्त किया और दरियादिली दिखाते हुए कई बार माफ भी किया और छोड दिया पर अठारहवीं बार मुहम्मद गोरी नें जयचंद की मदद से पृथ्वीराज चौहान को युद्ध में हार दी और बंदी बना कर अपने साथ ले गया | पृथ्वीराज चौहान और चन्द्रवरदाई दोंनो ही बन्दी बना लिये गये और सजा के तौर पर पृथ्वीराज की आखें गर्म सलाखों से फोड दी गई | अंत में चन्द्रवरदाई जो कि एक कवि और खास दोस्त था पृथ्वीराज चौहान का | दोनों नें भरे दरबार में गौरी को मारने की योजना बनाई जिसके तहत चन्द्रवरदाई नें काव्यात्मक भाषा में एक पक्तिं कहीः

“चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है मत चुके चौहान।”

और अंधे होने के बावजुद पृथ्वीराज चौहान नें इसको सुना और बाण चलाया जिसके फलस्वरूप मुहम्मद गौरी का प्राणांत हो गया । फिर चन्द्रवरदाई और पृथ्वीराज चौहान दोंनों ने पकडे जाने पर फिर से बंदी जीवन वय्तीत करने के बजाय दोनों नें अपना एक दूसरे को मार डाला | इस तरह पृथ्वीराज ने अपने अपमान का बदला ले लिया | उधर संयोगिता नें जब ये दुखद समाचार सुना तो उसने भी अपने प्राणो का अंत कर दिया |

वाकई में पृथ्वीराज चौहान की एतिहासिक कहानी है बहुत ही जोरदार | पढ़ते सुनते में ही रोंगटे खडे हो जाते हैं | सोचो सच में कैसा आदमी रहा होगा | संयोगिता का अपहरण करके एक कविता हैं आल्हाखंड की, बडी ही रोचक है जरुर पढ़ियेगा |

आल्हाखंडः संयोगिता का अपहरण

आगे आगे पृथ्वीराज हैं, पाछे चले कनौजीराय |
कबहुंक डोला जैयचंद छिने, कबहुंक पिरथी लेय छिनाय |
जौन शूर छीने डोला को, राखे पांच कोस पर जाय |
कोस पचासक डोला बढ़िगो, बहुतक क्षत्री गये नशाय |
लडत भिडत दोनो दल आवैं, पहुंचे सौरां के मैदान |
राजा जयचंद नें ललकारो, सुनलो पृथ्वीराज चौहान |
डोला ले जई हौ चोरी से, तुम्हरो चोर कहे हे नाम |
डोला धरि देउ तुम खेतन में, जो जीते सो लय उठाय |
इतनी बात सुनि पिरथी नें , डोला धरो खेत मैदान |
हल्ला हवईगो दोनों दल में, तुरतै चलन लगी तलवार |
झुरमुट हवईग्यो दोनों दल को, कोता खानी चलै कटार |
कोइ कोइ मारे बन्दूकन से, कोइ कोइ देय सेल को घाव |
भाल छूटे नागदौनी के, कहुं कहुं कडाबीन की मारू |
जैयचंद बोले सब क्षत्रीन से, यारो सुन लो कान लगाय |
सदा तुरैया ना बन फुलै, यारों सदा ना सावन होय |
सदा न माना उर में जनि हे, यारों समय ना बारम्बार |
जैसे पात टूटी तरुवर से, गिरी के बहुरि ना लागै डार |
मानुष देही यहु दुर्लभ है, ताते करों सुयश को काम |
लडिकै सन्मुख जो मरिजैहों, ह्वै है जुगन जुगन लो नाम |
झुके सिपाही कनउज वाले, रण में कठिन करै तलवार |
अपन पराओ ना पहिचानै, जिनके मारऊ मारऊ रट लाग |
झुके शूरमा दिल्ली वाले, दोनों हाथ लिये हथियार |
खट खट खट खट तेग बोलै, बोले छपक छपक तलवार |
चले जुन्नबी औ गुजराती, उना चले विलायत वयार |
कठिन लडाई भई डोला पर, तहं बही चली रक्त की धार |
उंचे खाले कायर भागे, औ रण दुलहा चलै पराय |
शूर पैंतीसक पृथीराज के, कनउज बारे दिये गिराय |
एक लाख झुके जैचंद कें, दिल्ली बारे दिये गिराय |
ए॓सो समरा भयो सोरौं में, अंधाधु्ंध चली तलवार |
आठ कोस पर डोला पहुंचै, जीते जंग पिथोरा राय |

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हल्दीघाटी का युद्ध – महाराणा प्रताप, Maharana Pratap and War of Haldighati

September 22nd, 2011 · इतिहास के पन्नो से, प्रमुख दर्शनीय स्थल

हल्दीघाटी का युद्धः

haldighati darrah

haldighati darrah

मुगलों और महाराणा प्रताप की सेना के बीच हल्दीघाटी में एक ए॓तिहासिक युद्ध हुआ | युद्ध बडा घमासान था | युद्ध के दौरान दोनों सेनाओं के हजारों सेनिक मारे गये, पर यह युद्ध अनिर्णीत ही रहा |

हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप के प्रिय अश्व चेतक के बलिदान को क्या कोई भूल सकता है | महाराणा प्रताप के प्रिय घोडे चेतक का बलिदान आज के समय में भी प्रासंगिक हैं ‌|

पर इसके पश्चात भी महाराणा प्रताप नें संघर्ष करना नहीं छोडा और अपने भील सहयोगियों की सेना के साथ अरावली की पहाडीयों में छिप छिप कर वे मुगल सेना पर बारम्बार वार करते रहे | मेवाड के भील जाति के लोग अपनी निष्ठा ‌और निश्छल प्रेम के कारण जाने जाते हैं ‌| भीलों नें प्रताप का पल पल साथ दिया |

इसी कारण ही महाराणा प्रताप को राजस्थान और‌ मेवाड में देवता तुल्य माना जाता रहा हैं | उन्हें प्रातः स्मरणीय भी कहा जाता है, यह मेवाड के लोगों की असीम श्रद्धा और भावना है |

महाराणा प्रताप का संघर्ष एक व्यक्ति, जाति विश॓ष या किसी छोटे बडे भूभाग का संघर्ष नहीं था, यह एक तरह का स्वाधीनता का संघर्ष था, हजारों लोग उनके साथ थे, और उन्हे आम जनता का सहयोग प्राप्त हुआ | प्रताप जनता के प्रति वफादार थे औ‌र स्वहित की बजाय पूरी प्रजा के हित की बात करते थे |

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रहीम के कुछ दौहे

September 19th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

रहीम का पूरा नाम अब्दुल रहीम खानखाना था और वे भी भारत में जन्में महान कवियों में से एक थे | पन्द्रहवी शताब्दी के दौरान जब उन्होने अपने आस पास के समाज की कुरितियों को देका तो बेबाकी से उन्होनें अपने विचार प्रकट किये दोहों के रूप में | वे दौहै आज भी स्कूलों में पढ़ाये जाते हैं | कठिन से कठिन बात को वे बडे ही सरल शब्दो में ए॓से कह जाते थे कि बस | इसी हाजिरजवाबी और कला प्रेम ने उन्हें बादशाह अकबर के नौ रत्नों में से एक का ओहदा दिलवाया | रहीम ना सिर्फ एक विचारशील कवि थे बल्कि जुजारू योद्धा भी थे | रहीम के हर दौहे बहुत ही खास संदेश देते हैं और हमें दुनिया को देखने का एक जबरदस्त नजरिया देते है |

तो पेश है रहीम के कुछ प्रसिद्ध दौहेः

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोडौ चटकाय |
टुटे से फिर ना जुडे, जुडे गांठ पड जाय ||

बिगरी बात बनै नहीं, लाख करो किन कोय |
रहिमन फाटे दूध को, मथे ना माखन होय ||

रहिमन बात अगम्य की, कहिन सुनन की नाहिं |
जै जानत ते कहत नहीं, कहत ते जानत नाहिं ||

जो रहिम ओछे बढ़े, तो अति ही इतराय |
पयादे से फरजी भयो, टेढ़ों टेढ़ों जाय ||

रहिमन विपदाहू भली जो, थोरे दिन होय |
हित अनहित या जगत में जानि परत सब कोय ||

रहिमन औछे नरन सों, बैर भलों ना प्रीत |
काटे चाटे स्वान के, दोउ भाति विपरीत ||

गही सरनागति राम की, भवसागर की नाव |
रहिमन जगत उधार को, और ना कोउ उपाय ||

रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन को फेर |
जब नीकै दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर ||

दीन सबन को लखत है, दीनहिं लखे न कोय |
जो रहिम दीनहिं लखौं, दीन बंधू सम होय | |

राम ना जाते हरिन संग, सिय ना रावन साथ |
जो रहीम भावी कतहूं, होत आपने हाथ ||

पावस देखि रहीम मन, कोइल साधे मौंन |
अब दादुर वक्ता भये, हमको पूछत कौन ||

रहिमन वे नर मर चुके, जे कहं मागन जाहि |
उनते पहले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहीं ||

जो गरीब तों हित करे, धनी रहीम ते लोग |
कहा सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग ||

रहिमन कठिन चितान तै, चिंता को चित चैन |
चिता दहति निर्जीव को, चिंता जीव समेत ||

बडे बडाई ना करै, बडो ना बोले बोल |
रहिमन हीरा कब कहै, लाख टका मम मोल ||

ज्यों नाचत कठपुतरी, करम नचावत गात |
अपने हाथ रहिम ज्यों, नहिं आपने हाथ ||

तरुवर फल नहीं खात है, सरवर पियहीं ना पान |
कहि रहीम परकाज हित, संपति संचहि सुजान ||

रहिमन देखि बडेन को, लघु ना दिजीये डारि |
जहां काम आवे सुई, कहां करे तरवारी ||

समय पाय फल होत है, समय पात झर जाय |
सदा रहै नहीं एक सी, का रहीम पछताय ||

जो बडेन को लघू कहे, नहिं रहीम घटि जाहिं |
गिरिधर मुरलीधर कहे, कछु दःख मानत नाहिं ||

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कुछ नए हिन्दी चुटकुले

September 18th, 2011 · हास्य

हो सकता है इनमें से कुछ हिन्दी चुटकुले आप पहली बार पढ़ रहे हों | तो पढ़िये और आनन्द लिजिये हिन्दी जोक्स का |

कुछ नए हिन्दी चुटकुले:

सरदार जी ने आधे रास्ते में अपना लंच बाक्स खोल कर देखाः
क्यूं की उनको ये पता करना था कि वे दफ्तर जा रहे हैं या वहां से वापस लौट रहे हैं |

गुजराती प्रेमी अपनी प्रेमीका से बोलाः डार्लिंग मेरे कान में कुछ हल्का सा, कुछ नरम सा, कुछ नमकीन सा कुछ मीठा सा कहो…………अरे कहो ना |
प्रेमिका बोलीः ढ़ोकला |

चित्रगुप्त यमराज से बोलेः धरती से आजकल यहां पर लोग कम क्यूं आ रहे हैं, लगता है आजकल तुम काम ठीक से कर नहीं पा रहे हो, तुम्हारा रिटायर होने का समय आ गया |
यमराज बोलेः क्या करूं में अपने भैसें पर जाता हूं, किसी को लाउ, इतने में तो सरकारी एक सौ आठ गाडी फुर्ती से आ जाती हैं |

हिन्दी की टीचर बोलीः कितने प्रकार के काल होते हैं और उनके नाम क्या क्या हैं ?
जोनीः पांच तरह के काल होते हैं, लोकल काल, एस टी डी काल, ट्रंक काल, आई एस डी काल और सतश्रीअ काल |

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कुंभलगढ़ का बादल महल

September 18th, 2011 · कुंभलगढ़

कुंभलगढ़ का बादल महल:

कु्ंभलगढ़ में बादल महल महाराणा फतेहसिंह जी नें उन्नीसवीं सदी के दौरान बनवाया था | महाराणा फतेहसिंह जी की गहरी रुची भवन निर्माण कला में थी और इसिलिये उन्होनें गढ़ के सबसे उंचे स्थाप पर पुराने खंडहरों को तुडवाकर बादल महल बनवाया | कु्ंभलगढ़ के किले में यह जगह बहुत ही खूबसूरत है और इसे फतेहप्रकाश के नाम से भी जाना जाता हैं |

painting at badal mahal

painting at badal mahal

अपने चौडे खूबसुरत गलियारों, मेहराबों और सुंदर चित्रकारी की कला के कारण यह स्थल बहुत अच्छा दिखाता हैं साथ ही उंचाई पर होने के कारण यहां हमेशा हवायें चलती रहती हैं | यहां खिडकियों से दूर दूर के नयनाभिराम दृश्य देखे जा सकते हैं | बादलों की उंचाई के घमन्ड को भी झुकाता यह बादल महल आज भी अपने नाम को सार्थक करता है |

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