Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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गणपति विसर्जन की सवारी

September 11th, 2011 · उलझन

आज मेनें प्रतिवर्ष की ही भाति कांकरोली में आयोजित होने वाली गणपति विसर्जन की सवारी को देखा | सवारी में शहर के हर तरफ के एरिया के गणपति एक बडी रेलीनुमा सवारी में इकट्ठे ले जाये जाते हैं और अतं में जल में विसर्जन किये जाते हैं | मुंबई में लोकमान्य तिलक नें अपने प्रयास शुरु किये और इसे फिर गणपति उत्सव हर साल जोशोखरोश से मनाया जाने लगा | और मुंबई की तर्ज पर छोटे शहरों में भी अब ये सारे खेल चालू हो चुकें हैं, क्या कोई मुझे बता सकता हैं कि बीस साल पहले यहां कहां गणपति और गरबा नृत्य के आयोजन होते थे |

सवारी में आम आदमीयों व महिलाओं कें चेहरे पर बडे ही आश्चर्य और डर के मिश्रित भाव आते मुझे महसूस हुए | सवारी में सेंकडों गणपति भक्त गुलाल से सराबोर थे और नाच गा रहे थे | गणपति की जय जयकार के नारे लगाये जा रहे थे पर कई लडकों के हाथों में नंगी तलवारे भी थी और वे ना जाने क्या दिखाना चाहते हैं ये समझ में नहीं आता | आगे पुलिस व ट्रेफिक वाले जवान भी चल रहे हैं पर शायद वे ये सभी चीजों से बेखबर हैं | नंगी तलवारों का यहां भक्ति के माहौल में क्या प्रयोग पर नहीं, आखाडा प्रदर्शन के नाम पर लगता है हमारे भारत में सब कुछ जायज हैं |

अजीब हालत है हमारे शहर की मोटरसाईकिल ले कर चलो तो ट्रेफिक के जवान हेलमेट और लाइसेंस मांगते हैं पर किसी प्रदर्शन के दौरान खुलेआम हथियारों के प्रदर्शन की छूट, क्या इन हथियारों के मालिक अपने साथ जेब में लाइसेंस लिये घुमते भी हैं या नहीं, कानून कहता है कि छः इंच से बडे फल वाले कोई भी नुकीले या धारदार हथियार का सरेराह प्रदर्शन गलत हैं | भगवान गणपति गणेश के प्रति श्रद्धा का भाव होना एक अलग बात है और इस सवारी के दौरान अपनी शक्ति प्रदर्शन करना  |

एक अलग बात हैं…………….पता नहीं कुछ संघठन क्या दिखाना चाहते हैं जनता को | फिर पीछे मेनें देखा की टेम्पों में कानफोडू आवाज में फिल्मी गानों के डी.जै. का बजना और उस पर ताकत, जवानी के उन्माद में नाचते युवक पता नहीं ये क्या हो रहा हैं, गणेश भगवान की सवारी में लावारिस के अपनी तो जैसे तेसे कट जायेगी और डी.जै. पे नाच मारी बीदंणी | क्या ये गानों का बजना वो भी ए॓से अवसर पर, वाकई में शोभा देते हैं ? मेरी समझ से तो ये सब बाहर हैं |

ये गणपति की सवारी भी क्या साधारण ढ़ंग से नहीं निकाली जा सकती है जिसमें ये सब हो, जेसे कीः

  • कुछ सुमधुर आवाज में भजन गाते हुए भजनमंडली के लोग
  • अच्छी साफ सुथरी धुनें बजाते हुए बेन्ड
  • कोई बुजुर्ग पंडित सभी को प्रसाद देते हुए चले
  • समाज के कुछ सभ्य लोग साथ चले और जयघोष करें जो शहर के समाज में अपनी एक अच्छी छवि रखते हैं
  • पुष्पवर्षा करते शहरी घरेलू लोग
  • मंगलगीत गाती हुई महिलाएं

अगर कुछ सालों में ए॓सा करने में अगर लोग कामयाब होते हें तो आम जनता के बीच एक अच्छा भक्तिपुर्णता का संदेश जरुर जायेगा |

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कलक्टर नवीन जैन को भगवान सुरक्षित घर भेजे

September 2nd, 2011 · नई खबरें

कुछ दिन पुर्व ही राजसंमद के कलक्टर रह चके युवा नवीन जैन जो अपने बच्चे पत्नी सहित शाहजहांपुर के एक रेस्तरां में गये थे, वे रहस्यमय ढ़ंग से गायब हो गये, उन्होने जाते जाते कार में अपने परिवार वालों के लिये नोट लिख छोडा की अपना ध्यान रखना | नवीन जैन बडी ही नेक ओर इमानदार छवि वाले इंसान हैं, साथ ही दफ्तरों में बाबूओं के आतंक, रिश्वतखोरी और भष्टाचार के सख्त विरोधी भी | नवीन जैन नें कलक्टर रहते हुए कुछ अच्छे काम किये, जो आम जनता के लिये तो अच्छे रहे पर भष्ट अफसरों व बाबूओं की नजरों में वे शायद आ गये | उन्हे अपने घर परिवार वालों को इतने लंबे समय तक के कार्यकाल में एक अदना सा घर भी ना दे पाने का शायद मलाल था | भगवान उन्हें सुरक्षित घर भेजे ‌|

आजादी के इतने सालों बाद भी आज हमारा सिस्टम सही काम नहीं कर पा रहा हैं | इसके पीछे आखिर वजह है क्या ? भले लोगों के साथ हमेशा ए॓सा ही होता हैं | या तो दूर कहीं रेगिस्तानों में उनके ट्रांस्फर कर दिये जाते हैं या उनकी पावर कम करके कोई दूसरा ए॓सा पद दे दिया जाता हैं जहां वह ताकतवर आदमी भी अपने आप को पंगू समझने लगे ‌| ये बात कोई छोटी मोटी बात नहीं है भष्टाचार और बाबूराज की ताकत इतनी है कि कलक्टर का पावर भी कम पडने लगा हैं | ब्यूरोक्रेट, उपर के बडे लेवल के नेता आदि किसी आई ए एस को भी अपने इशारों पर नचाने से बाज नहीं आते | यही साबित होता है कि चाहे लाख रामदेव, अन्ना आादोलन कर ले पर हम भारतवासी सुधरने वाले नहीं है | राजस्थान भी अब बिहार बन चुका है इस बात में कोई संशय नहीं |

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पन्ना धायः सत्य नारायण गौयंका

August 30th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

पन्ना धाय की अदम्य वीरता, त्याग और बलिदान की कहानीः

पन्ना धाय का त्याग

पन्ना धाय का त्याग

जब मेवाड के महाराजा राणा सांगा का देहान्त हुआ तब उनके पु्त्र उदयसिंह बहुत छोटे थे, बनवीर को सोंपा गया था काम नन्हें उदयसिंह की रक्षा व लालन पालन करके बडा करने का और समुचित शिक्षा दिलवाने का पर बनवीर के मन में कुछ ‌और ही चल रहा था | उसनें नन्हें बालक उदयसिंह का वध करके खुद राजगद्दी हथियाने की सोची |

पन्ना धाय उस समय नन्हें राजकुमार उदयसिंह की धाय मां थी और उनके लालन पालन में व्यस्त थी | साथ ही पन्ना धाय एक बहुत ही स्वाभिमानी, देशभक्त और राणा का एहसान मानने वाली महिला थी | पन्ना धाय का भी एल पुत्र था जो लगभग उम्र में उदयसिंह के जितना ही था |

जब पन्ना को बनवीर के गंदे नापाक इरादों का पता चला तो उसने नन्हें बालक उदयसिंह की जगह अपने पुत्र को सुला दिया तभी बनवीर नें नंगी तलवार लिये कक्ष में प्रवेश किया और पन्नाधाय से पूछा की कहां है उदयसिंह तो पन्ना धाय नें सिर्फ इशारा किया और तत्काल बनवीर नें पन्ना के पुत्र को मौत के घाट उतार दिया, वह समझ रहा था की मेनें मेवाड के होने वाले राजा उदयसिंह को मार डाला है पर हकीहत में पन्ना धाय नें अपने पुत्र की कुर्बानी दे दी थी और मेवाड राजवंश के चिराग को बचा लिया था |

एक गुप्त रास्ते से पन्नाधाय नें बालक उदयसिंह को झूठे पत्तल से भरे टोकरे में रखवाकर किसी विश्वासपात्र के हाथों महल से बाहर सुरक्षित जगह पहुंचा दिया | कोई महिला या नारी अपने राजा के पु्त्र की रक्षा करने के लिये इतना बडा बलिदान करे ये बहुत बडी बात है और पन्नाधाय एक बहुत बडा उदाहरण है नारी शक्ति के त्याग और बलिदान का | पन्ना नें अपने पुत्र का बलिदान करते हुए राणा के पु्त्र के जीवन को बचा लिया था और आज भी वह अपने इस अनोखे बलिदान के लिये जानी जाती है | पन्ना धाय अमर है | हिन्दी के लेखक कवि सत्य नारायण गौयंका नें इस पूरी घटना पर एक बहुत अच्छी रचना की है वह पेश हैः

पन्ना धायः सत्य नारायण गौयंका

चल पडा दुष्ट बनवीर क्रूर, जैसे कलयुग का कंस चला
राणा सांगा के, कुंभा के, कुल को करने निर्वंश चला ||

उस ओर महल में पन्ना के कानों में ए॓सी भनक पडी
वह भीत मृगी सी सिहर उठी, क्या करे नहीं कुछ समझ पडी ||

त्तक्षण मन में संकल्प उठा, बिजली चमकी काले घन पर
स्वामी के हित में बलि दूंगी, अपने प्राणो से भी बढ़ कर ||

धन्ना नाई की कुन्डी में, झटपट राणा को सुला दिया
उपर झूठे पत्तल रखकर, यों छिपा महल से पार किया ||

फिर अपने नन्हे मुन्ने को झट गुदडी में से उठा लिया
राजसी वसन भूषण पहना, फौरन पलंग पर लिटा दिया ||

इतने में ही सुन पडी गरज, है उदय कहां, युवराज कहां
शोणित प्यासी तलवार लिये, देका कातिल था वहां खडा ||

पन्ना सहमी, दिल झिझक उठा, फिर मन को कर पत्थर कठोर
सोया प्राणों का प्रण जहां, दिखला दी उंगली उसी ओर ||

छिन में बिजली सी कडक उठी, जालिम की उंची खडग उठी
मां मां मां मां की चीख उठी, नन्ही सी काया तडप उठी ||

शोणित से सनी सिसक निकली, लोहू पी नागन शांत हुई
इक नन्हा जीवन दीप बुझा, इका गाथा करूण दुखांत हुई ||

जबसे धरती पर मां जनमी, जब से मां नें बेटे जनमें
ए॓सी मिसाल कुर्बानी की, देखी ना गई जन जीवन में ||

तू पूण्यमयी, तू धर्ममयी, तू त्याग तपस्या की देवी
धरती के सब हीरे पन्ने, तुझ पर वारें पन्ना देवीं ||

तू भारत की सच्ची नारी, बलिदान चढ़ाना सिखा गई
तू स्वामिधर्म पर, देशधर्म पर ह्दय लुटाना सिखा गई ||

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कबीर के दौहे

August 30th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

कबीर दास जी का जीवन चरित्र:

कबीर कबीर हैं, उनके जैसा कोई ‌और नहीं, वे सिर्फ दुनिया में आये, गये नहीं, आज भी उन दोहों को पढ़ते या सुनते वक्त वो ही रुहानी ताकत का एहसास होता हैं | कबीर नें जितने सरल शब्दों में व्यक्ति, समाज धर्म आदि का चित्रण किया वह कोई शायद ही कर पाये ‌| स्कूल में पढ़े कबीर के दोहे आज भी प्रासंगिक हैं, इतना मर्म है, इतनी समझ है इन दोहों में मानों कबीरदास जी नें पूरी जिंदगी का फलसफा डाल दिया है |

पेशे से कबीर एक जुलाहे थे | कबीर नें बडे ही सादे शब्दों में उस जमाने के रीती रिवाजों के बारे में लिखा, वे एक ईश्वर है इस बात में यकीन करते थे | उनके लिखे दोहे इतने आसान शब्दों में है कि उन्हे कोई निपट गवांर आदमी भी आसानी से समझ सकता हैं | कबीर के दौहों में से कुछ यहां प्रेषित हैं | और जब ओशो को आप पढ़ेंगे तो जानेंगे की कबीर कितने महान थे, रजनीश नें कबीर के बारे में जो कुछ लिखा तब ही असल मैं जान पाया कबीर को |

कबीरदास जी के कुछ दोहेः

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
पल में परलय होएगी, बहूरी करोगो कब ||

चलती चक्की देख कर, दिया कबीरा रोए
दुई पाटन के बीच में, साबूत बचा ना कोए ||

बुरा जो देखन में चला, बुरा ना मिलया कोए
जो मन खोजा आपणा, तो मुझसे बुरा ना कोए ||

धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होए
माली सींचे सौ घडा, ऋतु आए फल होए ||

सांई इतना दिजीये, जामें कुटंब समाए
मैं भी भूखा ना रहूं, साधू न भूखा जाए ||

कबीरा खडा बाजार में, मांगे सबकी खैर
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर ||

पोथी पड पड जग मुआ, पंडित भया ना कोए
ढ़ाई आखर प्रेम के, जो पढ़े सो पंडित होए ||

कबीरा गर्व ना किजीये, उंचा देख आवास
काल परौ भुइं लेटना, उपर जमसी घास ||

पाहन पूजै हरि मिले, तो मैं पूजूं पहार
ताते यह चाकी भली, पीस खाए संसार ||

कंकर पत्थर जोरी के, मस्जिद लयी बनाय
ता चढ़ी मुल्ला बांग दे, क्या बहिरा हुआ खुदाय ||

जब तूं आया जगत में, लोग हसें तू रोए
एसी करनी ना करी, पाछे हसें सब कोए ||

ज्यों नैनों में पुतली, त्यों मालिक घट माहिं
मूरख लोग ना जानहीं, बाहिर ढ़ूंढ़न जाहिं ||

माला फेरत जुग भया, मिटा ना मन का फेर
कर का मनका छोड दे, मन का मनका फेर ||

जब में था हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं
सब अंधियारा मिटी गया, जब दीपक देख्या माहिं ||

गुरु गोविंद दोऊ खडे, काके लागुं पाय
बलिहारी गुरु आपकी, जिन गोविंद दियो बताए ||

जाति ना पूछो साधू की, पूछ लिजिये ज्ञान
मोल करो तलवार का, पडी रहन दो म्यान ||

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोय
इक दिन एसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय ||

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सलीम भाई अंडे वाला

August 27th, 2011 · शख्सियत

सलीम अंडे वाला ये आदमी का टाईप एकदम अलग ही है, एकदम जुदा | कांकरोली शहर के जलचक्की तिराहे पर पेट्रोलपंप के पास लगाते है ये बायल अंडे, आमलेट, भुर्जी आदि की लारी जो कि इनका मुख्य व्यवसाय है | इनकी ये फर्म बहुत ही पुरानी है और शहर में कोई सिंगल आदमी ए॓सा नहीं होगा जो सलीम भाई अंडे वाले को ना जानता हो | लारी लगाने का भी टाईम फिक्स है, ना पहले ना लेट, और फिक्स मजदूरी हुई, समय हुआ कि ये चले | कहते हैं कि छोटा काम और धीरे चलने वाला समय आदमी को और भी ज्यादा सहनशील ‌और मजबूत बना देती है वेसा ही अनोखा इनका जीवन चरित्र भी है, कठिनाइयों से ना हारने का इनका जज्बा देखाने लायक है |

बारिश का मौसम, जलती हुई धुंआ देती सिगडी, और फिर भन्नाटेदार आमलेट व अंडे की खुशबू (जिन्हे अंडे नहीं पसंद वो बदबू भी कह सकते हैं) हर किसी शौकिन को जैसे जलचक्की पर आमन्त्रित करती है | कुल मिला कर ए॓सा प्राकर्तिक मसालेदार काम्बीनेशन तैयार होता है कि बस समां बंध जाता है | फिर इनका एक महावाक्य है कि संडे हो या मंडे रोज खाओ अंडे | कुछ भी हो इनके हाथ से बना आमलेट, बायल अंडा और भुर्जी जो एकबार खाये वह फिर जलचक्की से यूं ही निकल ना पाये | टेस्ट बडा ही जोरदार बिठाते हैं सब का ये, सबसे बडी बात बंदा हमेशा जो है उसमें खुश रहता हैं, और दूसरों का भी भरपूर मनोरंजन करता है | तकलीफों और कठिनाइयों से ना हारने का जोरदार जज्बा है इनका | मैं खुद व्यक्तिगत तौर पर उनके अनूठे व्यक्तित्व का और विशेष प्रकार की बोलचाल की स्टाइल का बडा प्रशंसक हूं | हां तो कभी समय मिले और अंडे से एलर्जी नहीं हो तो जरुर जाइयेगा इनकी लारी पर |

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