Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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हरिवंशराय बच्चन की मधुशाला

September 11th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

हरिवंशराय बच्चन जो कि हिन्दी के विख्यात कवि थे, कौन अरे वो ही अपने एक्टर अमिताभ बच्चन जी के बाबूजी | उन्होनें बहुत सी कविताएं और रचनायें लिखीं जिनमें से मुख्य हैं मधुशाला, निशा निमंत्रण, सतरंगिनी, खादी के फूल, दो चट्टानें, आरती और अंगारे, मधुबाला, मधुकलश, प्रणय पत्रिका आदि | उन्होने हिन्दी कविता के इतिहास में एक बहुत ही जबरदस्त रचना लिख डाली जो आज भी कला प्रेमियों के दिलों मे राज करती हैं वह रचना है “मधुशाला” |

मधुशाला पहली बार सन 1935 में प्रकाशित हुई थी | इतने प्रसिद्ध होने के बाद मधुशाला के साल दर साल नए संसकरण छपते गये | कुछ खास रूबाइयों को खुद मन्ना डे ने और अमिताभ ने स्वयं भी कई जगहों पर गाया | इसमें एक एक नपे तुले शब्दों का प्रयोग किया गया और वो भी इतने इत्मीनान से की बस, सुनने वाला सुनता ही रह जाता हैं, चाहे वो पीने वाला हो या ना भी हो, हां बस कविता की थोडी सी समझ होना जरूरी हैं | कुछ एक अंश यहां प्रेषित हैं, जरुर पढ़ियेगा, साथ मैं ही है अपने महानायक अमिताभ जी का खुद गाया हुआ गीत जो कि वे अपने पिताश्री को समर्पित कर रहे थे |

हरिवंशराय बच्चन की मधुशालाः

मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला
पहले भोग लगा लूँ तेरा, फ़िर प्रसाद जग पाएगा
सबसे पहले तेरा स्वागत, करती मेरी मधुशाला॥१॥

प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूणर् निकालूँगा हाला
एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला
जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका
आज निछावर कर दूँगा मैं, तुझपर जग की मधुशाला॥२॥

भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला
कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला
कभी न कण- भर ख़ाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ!
पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला॥३॥

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला
‘ किस पथ से जाऊँ? ‘ असमंजस में है वह भोलाभाला
अलग- अलग पथ बतलाते सब, पर मैं यह बतलाता हूँ –
‘ राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला॥४॥

चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
‘ दूर अभी है ‘ , पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला
हिम्मत है न बढ़ूँ आगे, साहस है न फ़िरूँ पीछे
किंकतर्व्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला॥५॥

मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला
हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला
ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का
और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला॥६॥

मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला
अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला
बने ध्यान ही करते- करते जब साकी साकार, सखे
रहे न हाला, प्याला साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला॥७॥

हाथों में आने से पहले नाज़ दिखाएगा प्याला
अधरों पर आने से पहले अदा दिखाएगी हाला
बहुतेरे इनकार करेगा साकी आने से पहले
पथिक, न घबरा जाना, पहले मान करेगी मधुशाला॥८॥

लाल सुरा की धार लपट सी कह न इसे देना ज्वाला
फ़ेनिल मदिरा है, मत इसको कह देना उर का छाला
ददर् नशा है इस मदिरा का विगतस्मृतियाँ साकी हैं
पीड़ा में आनंद जिसे हो, आये मेरी मधुशाला॥९॥

लालायित अधरों से जिसने, हाय, नहीं चूमी हाला
हषर्- विकंपित कर से जिसने हा, न छुआ मधु का प्याला
हाथ पकड़ लज्जित साकी का पास नहीं जिसने खींचा
व्यर्थ सुखा डाली जीवन की उसने मधुमय मधुशाला॥१०॥

नहीं जानता कौन, मनुज आया बनकर पीनेवाला
कौन अपरिचित उस साकी से जिसने दूध पिला पाला
जीवन पाकर मानव पीकर मस्त रहे, इस कारण ही
जग में आकर सवसे पहले पाई उसने मधुशाला॥११॥

सूयर् बने मधु का विक्रेता, सिंधु बने घट, जल, हाला
बादल बन- बन आए साकी, भूमि बने मधु का प्याला
झड़ी लगाकर बरसे मदिरा रिमझिम, रिमझिम, रिमझिम कर
बेलि, विटप, तृण बन मैं पीऊँ, वर्षा ऋतु हो मधुशाला॥१२॥

अधरों पर हो कोई भी रस जिह्वा पर लगती हाला
भाजन हो कोई हाथों में लगता रक्खा है प्याला
हर सूरत साकी की सूरत में परिवतिर्त हो जाती
आँखों के आगे हो कुछ भी, आँखों में है मधुशाला॥१३॥

साकी बन आती है प्रातः जब अरुणा ऊषा बाला
तारक- मणि- मंडित चादर दे मोल धरा लेती हाला
अगणित कर- किरणों से जिसको पी, खग पागल हो गाते
प्रति प्रभात में पूणर् प्रकृति में मुखरित होती मधुशाला॥१४॥

साकी बन मुरली आई साथ लिए कर में प्याला
जिनमें वह छलकाती लाई अधर- सुधा- रस की हाला
योगिराज कर संगत उसकी नटवर नागर कहलाए
देखो कैसें- कैसों को है नाच नचाती मधुशाला॥१५॥

वादक बन मधु का विक्रेता लाया सुर- सुमधुर- हाला
रागिनियाँ बन साकी आई भरकर तारों का प्याला
विक्रेता के संकेतों पर दौड़ लयों, आलापों में
पान कराती श्रोतागण को, झंकृत वीणा मधुशाला॥१६॥

चित्रकार बन साकी आता लेकर तूली का प्याला
जिसमें भरकर पान कराता वह बहु रस- रंगी हाला
मन के चित्र जिसे पी- पीकर रंग- बिरंग हो जाते
चित्रपटी पर नाच रही है एक मनोहर मधुशाला॥१७॥

हिम श्रेणी अंगूर लता- सी फ़ैली, हिम जल है हाला
चंचल नदियाँ साकी बनकर, भरकर लहरों का प्याला
कोमल कूर- करों में अपने छलकाती निशिदिन चलतीं
पीकर खेत खड़े लहराते, भारत पावन मधुशाला॥१८॥

आज मिला अवसर, तब फ़िर क्यों मैं न छकूँ जी- भर हाला
आज मिला मौका, तब फ़िर क्यों ढाल न लूँ जी- भर प्याला
छेड़छाड़ अपने साकी से आज न क्यों जी- भर कर लूँ
एक बार ही तो मिलनी है जीवन की यह मधुशाला॥१९॥

दो दिन ही मधु मुझे पिलाकर ऊब उठी साकीबाला
भरकर अब खिसका देती है वह मेरे आगे प्याला
नाज़, अदा, अंदाजों से अब, हाय पिलाना दूर हुआ
अब तो कर देती है केवल फ़ज़र् – अदाई मधुशाला॥२०॥

छोटे- से जीवन में कितना प्यार करूँ, पी लूँ हाला
आने के ही साथ जगत में कहलाया ‘ जानेवाला’
स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी
बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन- मधुशाला॥२१॥

क्या पीना, निद्वर्न्द्व न जब तक ढाला प्यालों पर प्याला
क्या जीना, निरिंचत न जब तक साथ रहे साकीबाला
खोने का भय, हाय, लगा है पाने के सुख के पीछे
मिलने का आनंद न देती मिलकर के भी मधुशाला॥२२॥

मुझे पिलाने को लाए हो इतनी थोड़ी- सी हाला!
मुझे दिखाने को लाए हो एक यही छिछला प्याला!
इतनी पी जीने से अच्छा सागर की ले प्यास मरूँ
सिंधु- तृषा दी किसने रचकर बिंदु- बराबर मधुशाला॥२३॥

क्षीण, क्षुद्र, क्षणभंगुर, दुबर्ल मानव मिट्टी का प्याला
भरी हुई है जिसके अंदर कटु- मधु जीवन की हाला
मृत्यु बनी है निदर्य साकी अपने शत- शत कर फ़ैला
काल प्रबल है पीनेवाला, संसृति है यह मधुशाला॥२४॥

यम आयेगा साकी बनकर साथ लिए काली हाला
पी न होश में फ़िर आएगा सुरा- विसुध यह मतवाला
यह अंतिम बेहोशी, अंतिम साकी, अंतिम प्याला है
पथिक, प्यार से पीना इसको फ़िर न मिलेगी मधुशाला॥२५॥

शांत सकी हो अब तक, साकी, पीकर किस उर की ज्वाला
‘ और, और’ की रटन लगाता जाता हर पीनेवाला
कितनी इच्छाएँ हर जानेवाला छोड़ यहाँ जाता!
कितने अरमानों की बनकर कब्र खड़ी है मधुशाला॥२६॥

जो हाला मैं चाह रहा था, वह न मिली मुझको हाला
जो प्याला मैं माँग रहा था, वह न मिला मुझको प्याला
जिस साकी के पीछे मैं था दीवाना, न मिला साकी
जिसके पीछे था मैं पागल, हा न मिली वह मधुशाला!॥२७॥

देख रहा हूँ अपने आगे कब से माणिक- सी हाला
देख रहा हूँ अपने आगे कब से कंचन का प्याला
‘ बस अब पाया! ‘ – कह- कह कब से दौड़ रहा इसके पीछे
किंतु रही है दूर क्षितिज- सी मुझसे मेरी मधुशाला॥२८॥

हाथों में आने- आने में, हाय, फ़िसल जाता प्याला
अधरों पर आने- आने में हाय, ढलक जाती हाला
दुनियावालो, आकर मेरी किस्मत की ख़ूबी देखो
रह- रह जाती है बस मुझको मिलते- मिलते मधुशाला॥२९॥

प्राप्य नही है तो, हो जाती लुप्त नहीं फ़िर क्यों हाला
प्राप्य नही है तो, हो जाता लुप्त नहीं फ़िर क्यों प्याला
दूर न इतनी हिम्मत हारूँ, पास न इतनी पा जाऊँ
व्यर्थ मुझे दौड़ाती मरु में मृगजल बनकर मधुशाला॥३०॥

मदिरालय में कब से बैठा, पी न सका अब तक हाला
यत्न सहित भरता हूँ, कोई किंतु उलट देता प्याला
मानव- बल के आगे निबर्ल भाग्य, सुना विद्यालय में
‘ भाग्य प्रबल, मानव निर्बल’ का पाठ पढ़ाती मधुशाला॥३१॥

उस प्याले से प्यार मुझे जो दूर हथेली से प्याला
उस हाला से चाव मुझे जो दूर अधर से है हाला
प्यार नहीं पा जाने में है, पाने के अरमानों में!
पा जाता तब, हाय, न इतनी प्यारी लगती मधुशाला॥३२॥

मद, मदिरा, मधु, हाला सुन- सुन कर ही जब हूँ मतवाला
क्या गति होगी अधरों के जब नीचे आएगा प्याला
साकी, मेरे पास न आना मैं पागल हो जाऊँगा
प्यासा ही मैं मस्त, मुबारक हो तुमको ही मधुशाला॥३३॥

क्या मुझको आवश्यकता है साकी से माँगूँ हाला
क्या मुझको आवश्यकता है साकी से चाहूँ प्याला
पीकर मदिरा मस्त हुआ तो प्यार किया क्या मदिरा से!
मैं तो पागल हो उठता हूँ सुन लेता यदि मधुशाला॥३४॥

एक समय संतुष्ट बहुत था पा मैं थोड़ी- सी हाला
भोला- सा था मेरा साकी, छोटा- सा मेरा प्याला
छोटे- से इस जग की मेरे स्वगर् बलाएँ लेता था
विस्तृत जग में, हाय, गई खो मेरी नन्ही मधुशाला!॥३५॥

मैं मदिरालय के अंदर हूँ, मेरे हाथों में प्याला
प्याले में मदिरालय बिंबित करनेवाली है हाला
इस उधेड़- बुन में ही मेरा सारा जीवन बीत गया –
मैं मधुशाला के अंदर या मेरे अंदर मधुशाला!॥३६॥

किसे नहीं पीने से नाता, किसे नहीं भाता प्याला
इस जगती के मदिरालय में तरह- तरह की है हाला
अपनी- अपनी इच्छा के अनुसार सभी पी मदमाते
एक सभी का मादक साकी, एक सभी की मधुशाला॥३७॥

वह हाला, कर शांत सके जो मेरे अंतर की ज्वाला
जिसमें मैं बिंबित- प्रतिबिंबित प्रतिपल, वह मेरा प्याला
मधुशाला वह नहीं जहाँ पर मदिरा बेची जाती है
भेंट जहाँ मस्ती की मिलती मेरी तो वह मधुशाला॥३८॥

मतवालापन हाला से ले मैंने तज दी है हाला
पागलपन लेकर प्याले से, मैंने त्याग दिया प्याला
साकी से मिल, साकी में मिल अपनापन मैं भूल गया
मिल मधुशाला की मधुता में भूल गया मैं मधुशाला॥३९॥

कहाँ गया वह स्वगिर्क साकी, कहाँ गयी सुरभित हाला
कहाँ गया स्वपनिल मदिरालय, कहाँ गया स्वणिर्म प्याला!
पीनेवालों ने मदिरा का मूल्य, हाय, कब पहचाना?
फ़ूट चुका जब मधु का प्याला, टूट चुकी जब मधुशाला॥४०॥

अपने युग में सबको अनुपम ज्ञात हुई अपनी हाला
अपने युग में सबको अद्भुत ज्ञात हुआ अपना प्याला
फ़िर भी वृद्धों से जब पूछा एक यही उत्तर पाया –
अब न रहे वे पीनेवाले, अब न रही वह मधुशाला!॥४१॥

कितने ममर् जता जानी है बार- बार आकर हाला
कितने भेद बता जाता है बार- बार आकर प्याला
कितने अथोर् को संकेतों से बतला जाता साकी
फ़िर भी पीनेवालों को है एक पहेली मधुशाला॥४२॥

जितनी दिल की गहराई हो उतना गहरा है प्याला
जितनी मन की मादकता हो उतनी मादक है हाला
जितनी उर की भावुकता हो उतना सुन्दर साकी है
जितना ही जो रसिक, उसे है उतनी रसमय मधुशाला॥४३॥

मेरी हाला में सबने पाई अपनी- अपनी हाला
मेरे प्याले में सबने पाया अपना- अपना प्याला
मेरे साकी में सबने अपना प्यारा साकी देखा
जिसकी जैसी रूचि थी उसने वैसी देखी मधुशाला॥४४॥

यह मदिरालय के आँसू हैं, नहीं- नहीं मादक हाला
यह मदिरालय की आँखें हैं, नहीं- नहीं मधु का प्याला
किसी समय की सुखदस्मृति है साकी बनकर नाच रही
नहीं- नहीं कवि का हृदयांगण, यह विरहाकुल मधुशाला॥४५॥

कुचल हसरतें कितनी अपनी, हाय, बना पाया हाला
कितने अरमानों को करके ख़ाक बना पाया प्याला!
पी पीनेवाले चल देंगे, हाय, न कोई जानेगा
कितने मन के महल ढहे तब खड़ी हुई यह मधुशाला!॥४६॥

विश्व तुम्हारे विषमय जीवन में ला पाएगी हाला
यदि थोड़ी- सी भी यह मेरी मदमाती साकीबाला
शून्य तुम्हारी घड़ियाँ कुछ भी यदि यह गुंजित कर पाई
जन्म सफ़ल समझेगी जग में अपना मेरी मधुशाला॥४७॥

बड़े- बड़े नाज़ों से मैंने पाली है साकीबाला
कलित कल्पना का ही इसने सदा उठाया है प्याला
मान- दुलारों से ही रखना इस मेरी सुकुमारी को
विश्व, तुम्हारे हाथों में अब सौंप रहा हूँ मधुशाला॥४८॥

हरिवंश राय बच्चन

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गणपति विसर्जन की सवारी

September 11th, 2011 · उलझन

आज मेनें प्रतिवर्ष की ही भाति कांकरोली में आयोजित होने वाली गणपति विसर्जन की सवारी को देखा | सवारी में शहर के हर तरफ के एरिया के गणपति एक बडी रेलीनुमा सवारी में इकट्ठे ले जाये जाते हैं और अतं में जल में विसर्जन किये जाते हैं | मुंबई में लोकमान्य तिलक नें अपने प्रयास शुरु किये और इसे फिर गणपति उत्सव हर साल जोशोखरोश से मनाया जाने लगा | और मुंबई की तर्ज पर छोटे शहरों में भी अब ये सारे खेल चालू हो चुकें हैं, क्या कोई मुझे बता सकता हैं कि बीस साल पहले यहां कहां गणपति और गरबा नृत्य के आयोजन होते थे |

सवारी में आम आदमीयों व महिलाओं कें चेहरे पर बडे ही आश्चर्य और डर के मिश्रित भाव आते मुझे महसूस हुए | सवारी में सेंकडों गणपति भक्त गुलाल से सराबोर थे और नाच गा रहे थे | गणपति की जय जयकार के नारे लगाये जा रहे थे पर कई लडकों के हाथों में नंगी तलवारे भी थी और वे ना जाने क्या दिखाना चाहते हैं ये समझ में नहीं आता | आगे पुलिस व ट्रेफिक वाले जवान भी चल रहे हैं पर शायद वे ये सभी चीजों से बेखबर हैं | नंगी तलवारों का यहां भक्ति के माहौल में क्या प्रयोग पर नहीं, आखाडा प्रदर्शन के नाम पर लगता है हमारे भारत में सब कुछ जायज हैं |

अजीब हालत है हमारे शहर की मोटरसाईकिल ले कर चलो तो ट्रेफिक के जवान हेलमेट और लाइसेंस मांगते हैं पर किसी प्रदर्शन के दौरान खुलेआम हथियारों के प्रदर्शन की छूट, क्या इन हथियारों के मालिक अपने साथ जेब में लाइसेंस लिये घुमते भी हैं या नहीं, कानून कहता है कि छः इंच से बडे फल वाले कोई भी नुकीले या धारदार हथियार का सरेराह प्रदर्शन गलत हैं | भगवान गणपति गणेश के प्रति श्रद्धा का भाव होना एक अलग बात है और इस सवारी के दौरान अपनी शक्ति प्रदर्शन करना  |

एक अलग बात हैं…………….पता नहीं कुछ संघठन क्या दिखाना चाहते हैं जनता को | फिर पीछे मेनें देखा की टेम्पों में कानफोडू आवाज में फिल्मी गानों के डी.जै. का बजना और उस पर ताकत, जवानी के उन्माद में नाचते युवक पता नहीं ये क्या हो रहा हैं, गणेश भगवान की सवारी में लावारिस के अपनी तो जैसे तेसे कट जायेगी और डी.जै. पे नाच मारी बीदंणी | क्या ये गानों का बजना वो भी ए॓से अवसर पर, वाकई में शोभा देते हैं ? मेरी समझ से तो ये सब बाहर हैं |

ये गणपति की सवारी भी क्या साधारण ढ़ंग से नहीं निकाली जा सकती है जिसमें ये सब हो, जेसे कीः

  • कुछ सुमधुर आवाज में भजन गाते हुए भजनमंडली के लोग
  • अच्छी साफ सुथरी धुनें बजाते हुए बेन्ड
  • कोई बुजुर्ग पंडित सभी को प्रसाद देते हुए चले
  • समाज के कुछ सभ्य लोग साथ चले और जयघोष करें जो शहर के समाज में अपनी एक अच्छी छवि रखते हैं
  • पुष्पवर्षा करते शहरी घरेलू लोग
  • मंगलगीत गाती हुई महिलाएं

अगर कुछ सालों में ए॓सा करने में अगर लोग कामयाब होते हें तो आम जनता के बीच एक अच्छा भक्तिपुर्णता का संदेश जरुर जायेगा |

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कलक्टर नवीन जैन को भगवान सुरक्षित घर भेजे

September 2nd, 2011 · नई खबरें

कुछ दिन पुर्व ही राजसंमद के कलक्टर रह चके युवा नवीन जैन जो अपने बच्चे पत्नी सहित शाहजहांपुर के एक रेस्तरां में गये थे, वे रहस्यमय ढ़ंग से गायब हो गये, उन्होने जाते जाते कार में अपने परिवार वालों के लिये नोट लिख छोडा की अपना ध्यान रखना | नवीन जैन बडी ही नेक ओर इमानदार छवि वाले इंसान हैं, साथ ही दफ्तरों में बाबूओं के आतंक, रिश्वतखोरी और भष्टाचार के सख्त विरोधी भी | नवीन जैन नें कलक्टर रहते हुए कुछ अच्छे काम किये, जो आम जनता के लिये तो अच्छे रहे पर भष्ट अफसरों व बाबूओं की नजरों में वे शायद आ गये | उन्हे अपने घर परिवार वालों को इतने लंबे समय तक के कार्यकाल में एक अदना सा घर भी ना दे पाने का शायद मलाल था | भगवान उन्हें सुरक्षित घर भेजे ‌|

आजादी के इतने सालों बाद भी आज हमारा सिस्टम सही काम नहीं कर पा रहा हैं | इसके पीछे आखिर वजह है क्या ? भले लोगों के साथ हमेशा ए॓सा ही होता हैं | या तो दूर कहीं रेगिस्तानों में उनके ट्रांस्फर कर दिये जाते हैं या उनकी पावर कम करके कोई दूसरा ए॓सा पद दे दिया जाता हैं जहां वह ताकतवर आदमी भी अपने आप को पंगू समझने लगे ‌| ये बात कोई छोटी मोटी बात नहीं है भष्टाचार और बाबूराज की ताकत इतनी है कि कलक्टर का पावर भी कम पडने लगा हैं | ब्यूरोक्रेट, उपर के बडे लेवल के नेता आदि किसी आई ए एस को भी अपने इशारों पर नचाने से बाज नहीं आते | यही साबित होता है कि चाहे लाख रामदेव, अन्ना आादोलन कर ले पर हम भारतवासी सुधरने वाले नहीं है | राजस्थान भी अब बिहार बन चुका है इस बात में कोई संशय नहीं |

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पन्ना धायः सत्य नारायण गौयंका

August 30th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

पन्ना धाय की अदम्य वीरता, त्याग और बलिदान की कहानीः

पन्ना धाय का त्याग

पन्ना धाय का त्याग

जब मेवाड के महाराजा राणा सांगा का देहान्त हुआ तब उनके पु्त्र उदयसिंह बहुत छोटे थे, बनवीर को सोंपा गया था काम नन्हें उदयसिंह की रक्षा व लालन पालन करके बडा करने का और समुचित शिक्षा दिलवाने का पर बनवीर के मन में कुछ ‌और ही चल रहा था | उसनें नन्हें बालक उदयसिंह का वध करके खुद राजगद्दी हथियाने की सोची |

पन्ना धाय उस समय नन्हें राजकुमार उदयसिंह की धाय मां थी और उनके लालन पालन में व्यस्त थी | साथ ही पन्ना धाय एक बहुत ही स्वाभिमानी, देशभक्त और राणा का एहसान मानने वाली महिला थी | पन्ना धाय का भी एल पुत्र था जो लगभग उम्र में उदयसिंह के जितना ही था |

जब पन्ना को बनवीर के गंदे नापाक इरादों का पता चला तो उसने नन्हें बालक उदयसिंह की जगह अपने पुत्र को सुला दिया तभी बनवीर नें नंगी तलवार लिये कक्ष में प्रवेश किया और पन्नाधाय से पूछा की कहां है उदयसिंह तो पन्ना धाय नें सिर्फ इशारा किया और तत्काल बनवीर नें पन्ना के पुत्र को मौत के घाट उतार दिया, वह समझ रहा था की मेनें मेवाड के होने वाले राजा उदयसिंह को मार डाला है पर हकीहत में पन्ना धाय नें अपने पुत्र की कुर्बानी दे दी थी और मेवाड राजवंश के चिराग को बचा लिया था |

एक गुप्त रास्ते से पन्नाधाय नें बालक उदयसिंह को झूठे पत्तल से भरे टोकरे में रखवाकर किसी विश्वासपात्र के हाथों महल से बाहर सुरक्षित जगह पहुंचा दिया | कोई महिला या नारी अपने राजा के पु्त्र की रक्षा करने के लिये इतना बडा बलिदान करे ये बहुत बडी बात है और पन्नाधाय एक बहुत बडा उदाहरण है नारी शक्ति के त्याग और बलिदान का | पन्ना नें अपने पुत्र का बलिदान करते हुए राणा के पु्त्र के जीवन को बचा लिया था और आज भी वह अपने इस अनोखे बलिदान के लिये जानी जाती है | पन्ना धाय अमर है | हिन्दी के लेखक कवि सत्य नारायण गौयंका नें इस पूरी घटना पर एक बहुत अच्छी रचना की है वह पेश हैः

पन्ना धायः सत्य नारायण गौयंका

चल पडा दुष्ट बनवीर क्रूर, जैसे कलयुग का कंस चला
राणा सांगा के, कुंभा के, कुल को करने निर्वंश चला ||

उस ओर महल में पन्ना के कानों में ए॓सी भनक पडी
वह भीत मृगी सी सिहर उठी, क्या करे नहीं कुछ समझ पडी ||

त्तक्षण मन में संकल्प उठा, बिजली चमकी काले घन पर
स्वामी के हित में बलि दूंगी, अपने प्राणो से भी बढ़ कर ||

धन्ना नाई की कुन्डी में, झटपट राणा को सुला दिया
उपर झूठे पत्तल रखकर, यों छिपा महल से पार किया ||

फिर अपने नन्हे मुन्ने को झट गुदडी में से उठा लिया
राजसी वसन भूषण पहना, फौरन पलंग पर लिटा दिया ||

इतने में ही सुन पडी गरज, है उदय कहां, युवराज कहां
शोणित प्यासी तलवार लिये, देका कातिल था वहां खडा ||

पन्ना सहमी, दिल झिझक उठा, फिर मन को कर पत्थर कठोर
सोया प्राणों का प्रण जहां, दिखला दी उंगली उसी ओर ||

छिन में बिजली सी कडक उठी, जालिम की उंची खडग उठी
मां मां मां मां की चीख उठी, नन्ही सी काया तडप उठी ||

शोणित से सनी सिसक निकली, लोहू पी नागन शांत हुई
इक नन्हा जीवन दीप बुझा, इका गाथा करूण दुखांत हुई ||

जबसे धरती पर मां जनमी, जब से मां नें बेटे जनमें
ए॓सी मिसाल कुर्बानी की, देखी ना गई जन जीवन में ||

तू पूण्यमयी, तू धर्ममयी, तू त्याग तपस्या की देवी
धरती के सब हीरे पन्ने, तुझ पर वारें पन्ना देवीं ||

तू भारत की सच्ची नारी, बलिदान चढ़ाना सिखा गई
तू स्वामिधर्म पर, देशधर्म पर ह्दय लुटाना सिखा गई ||

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कबीर के दौहे

August 30th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

कबीर दास जी का जीवन चरित्र:

कबीर कबीर हैं, उनके जैसा कोई ‌और नहीं, वे सिर्फ दुनिया में आये, गये नहीं, आज भी उन दोहों को पढ़ते या सुनते वक्त वो ही रुहानी ताकत का एहसास होता हैं | कबीर नें जितने सरल शब्दों में व्यक्ति, समाज धर्म आदि का चित्रण किया वह कोई शायद ही कर पाये ‌| स्कूल में पढ़े कबीर के दोहे आज भी प्रासंगिक हैं, इतना मर्म है, इतनी समझ है इन दोहों में मानों कबीरदास जी नें पूरी जिंदगी का फलसफा डाल दिया है |

पेशे से कबीर एक जुलाहे थे | कबीर नें बडे ही सादे शब्दों में उस जमाने के रीती रिवाजों के बारे में लिखा, वे एक ईश्वर है इस बात में यकीन करते थे | उनके लिखे दोहे इतने आसान शब्दों में है कि उन्हे कोई निपट गवांर आदमी भी आसानी से समझ सकता हैं | कबीर के दौहों में से कुछ यहां प्रेषित हैं | और जब ओशो को आप पढ़ेंगे तो जानेंगे की कबीर कितने महान थे, रजनीश नें कबीर के बारे में जो कुछ लिखा तब ही असल मैं जान पाया कबीर को |

कबीरदास जी के कुछ दोहेः

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
पल में परलय होएगी, बहूरी करोगो कब ||

चलती चक्की देख कर, दिया कबीरा रोए
दुई पाटन के बीच में, साबूत बचा ना कोए ||

बुरा जो देखन में चला, बुरा ना मिलया कोए
जो मन खोजा आपणा, तो मुझसे बुरा ना कोए ||

धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होए
माली सींचे सौ घडा, ऋतु आए फल होए ||

सांई इतना दिजीये, जामें कुटंब समाए
मैं भी भूखा ना रहूं, साधू न भूखा जाए ||

कबीरा खडा बाजार में, मांगे सबकी खैर
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर ||

पोथी पड पड जग मुआ, पंडित भया ना कोए
ढ़ाई आखर प्रेम के, जो पढ़े सो पंडित होए ||

कबीरा गर्व ना किजीये, उंचा देख आवास
काल परौ भुइं लेटना, उपर जमसी घास ||

पाहन पूजै हरि मिले, तो मैं पूजूं पहार
ताते यह चाकी भली, पीस खाए संसार ||

कंकर पत्थर जोरी के, मस्जिद लयी बनाय
ता चढ़ी मुल्ला बांग दे, क्या बहिरा हुआ खुदाय ||

जब तूं आया जगत में, लोग हसें तू रोए
एसी करनी ना करी, पाछे हसें सब कोए ||

ज्यों नैनों में पुतली, त्यों मालिक घट माहिं
मूरख लोग ना जानहीं, बाहिर ढ़ूंढ़न जाहिं ||

माला फेरत जुग भया, मिटा ना मन का फेर
कर का मनका छोड दे, मन का मनका फेर ||

जब में था हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं
सब अंधियारा मिटी गया, जब दीपक देख्या माहिं ||

गुरु गोविंद दोऊ खडे, काके लागुं पाय
बलिहारी गुरु आपकी, जिन गोविंद दियो बताए ||

जाति ना पूछो साधू की, पूछ लिजिये ज्ञान
मोल करो तलवार का, पडी रहन दो म्यान ||

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोय
इक दिन एसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय ||

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