Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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पन्ना धायः सत्य नारायण गौयंका

August 30th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

पन्ना धाय की अदम्य वीरता, त्याग और बलिदान की कहानीः

पन्ना धाय का त्याग

पन्ना धाय का त्याग

जब मेवाड के महाराजा राणा सांगा का देहान्त हुआ तब उनके पु्त्र उदयसिंह बहुत छोटे थे, बनवीर को सोंपा गया था काम नन्हें उदयसिंह की रक्षा व लालन पालन करके बडा करने का और समुचित शिक्षा दिलवाने का पर बनवीर के मन में कुछ ‌और ही चल रहा था | उसनें नन्हें बालक उदयसिंह का वध करके खुद राजगद्दी हथियाने की सोची |

पन्ना धाय उस समय नन्हें राजकुमार उदयसिंह की धाय मां थी और उनके लालन पालन में व्यस्त थी | साथ ही पन्ना धाय एक बहुत ही स्वाभिमानी, देशभक्त और राणा का एहसान मानने वाली महिला थी | पन्ना धाय का भी एल पुत्र था जो लगभग उम्र में उदयसिंह के जितना ही था |

जब पन्ना को बनवीर के गंदे नापाक इरादों का पता चला तो उसने नन्हें बालक उदयसिंह की जगह अपने पुत्र को सुला दिया तभी बनवीर नें नंगी तलवार लिये कक्ष में प्रवेश किया और पन्नाधाय से पूछा की कहां है उदयसिंह तो पन्ना धाय नें सिर्फ इशारा किया और तत्काल बनवीर नें पन्ना के पुत्र को मौत के घाट उतार दिया, वह समझ रहा था की मेनें मेवाड के होने वाले राजा उदयसिंह को मार डाला है पर हकीहत में पन्ना धाय नें अपने पुत्र की कुर्बानी दे दी थी और मेवाड राजवंश के चिराग को बचा लिया था |

एक गुप्त रास्ते से पन्नाधाय नें बालक उदयसिंह को झूठे पत्तल से भरे टोकरे में रखवाकर किसी विश्वासपात्र के हाथों महल से बाहर सुरक्षित जगह पहुंचा दिया | कोई महिला या नारी अपने राजा के पु्त्र की रक्षा करने के लिये इतना बडा बलिदान करे ये बहुत बडी बात है और पन्नाधाय एक बहुत बडा उदाहरण है नारी शक्ति के त्याग और बलिदान का | पन्ना नें अपने पुत्र का बलिदान करते हुए राणा के पु्त्र के जीवन को बचा लिया था और आज भी वह अपने इस अनोखे बलिदान के लिये जानी जाती है | पन्ना धाय अमर है | हिन्दी के लेखक कवि सत्य नारायण गौयंका नें इस पूरी घटना पर एक बहुत अच्छी रचना की है वह पेश हैः

पन्ना धायः सत्य नारायण गौयंका

चल पडा दुष्ट बनवीर क्रूर, जैसे कलयुग का कंस चला
राणा सांगा के, कुंभा के, कुल को करने निर्वंश चला ||

उस ओर महल में पन्ना के कानों में ए॓सी भनक पडी
वह भीत मृगी सी सिहर उठी, क्या करे नहीं कुछ समझ पडी ||

त्तक्षण मन में संकल्प उठा, बिजली चमकी काले घन पर
स्वामी के हित में बलि दूंगी, अपने प्राणो से भी बढ़ कर ||

धन्ना नाई की कुन्डी में, झटपट राणा को सुला दिया
उपर झूठे पत्तल रखकर, यों छिपा महल से पार किया ||

फिर अपने नन्हे मुन्ने को झट गुदडी में से उठा लिया
राजसी वसन भूषण पहना, फौरन पलंग पर लिटा दिया ||

इतने में ही सुन पडी गरज, है उदय कहां, युवराज कहां
शोणित प्यासी तलवार लिये, देका कातिल था वहां खडा ||

पन्ना सहमी, दिल झिझक उठा, फिर मन को कर पत्थर कठोर
सोया प्राणों का प्रण जहां, दिखला दी उंगली उसी ओर ||

छिन में बिजली सी कडक उठी, जालिम की उंची खडग उठी
मां मां मां मां की चीख उठी, नन्ही सी काया तडप उठी ||

शोणित से सनी सिसक निकली, लोहू पी नागन शांत हुई
इक नन्हा जीवन दीप बुझा, इका गाथा करूण दुखांत हुई ||

जबसे धरती पर मां जनमी, जब से मां नें बेटे जनमें
ए॓सी मिसाल कुर्बानी की, देखी ना गई जन जीवन में ||

तू पूण्यमयी, तू धर्ममयी, तू त्याग तपस्या की देवी
धरती के सब हीरे पन्ने, तुझ पर वारें पन्ना देवीं ||

तू भारत की सच्ची नारी, बलिदान चढ़ाना सिखा गई
तू स्वामिधर्म पर, देशधर्म पर ह्दय लुटाना सिखा गई ||

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कबीर के दौहे

August 30th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

कबीर दास जी का जीवन चरित्र:

कबीर कबीर हैं, उनके जैसा कोई ‌और नहीं, वे सिर्फ दुनिया में आये, गये नहीं, आज भी उन दोहों को पढ़ते या सुनते वक्त वो ही रुहानी ताकत का एहसास होता हैं | कबीर नें जितने सरल शब्दों में व्यक्ति, समाज धर्म आदि का चित्रण किया वह कोई शायद ही कर पाये ‌| स्कूल में पढ़े कबीर के दोहे आज भी प्रासंगिक हैं, इतना मर्म है, इतनी समझ है इन दोहों में मानों कबीरदास जी नें पूरी जिंदगी का फलसफा डाल दिया है |

पेशे से कबीर एक जुलाहे थे | कबीर नें बडे ही सादे शब्दों में उस जमाने के रीती रिवाजों के बारे में लिखा, वे एक ईश्वर है इस बात में यकीन करते थे | उनके लिखे दोहे इतने आसान शब्दों में है कि उन्हे कोई निपट गवांर आदमी भी आसानी से समझ सकता हैं | कबीर के दौहों में से कुछ यहां प्रेषित हैं | और जब ओशो को आप पढ़ेंगे तो जानेंगे की कबीर कितने महान थे, रजनीश नें कबीर के बारे में जो कुछ लिखा तब ही असल मैं जान पाया कबीर को |

कबीरदास जी के कुछ दोहेः

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
पल में परलय होएगी, बहूरी करोगो कब ||

चलती चक्की देख कर, दिया कबीरा रोए
दुई पाटन के बीच में, साबूत बचा ना कोए ||

बुरा जो देखन में चला, बुरा ना मिलया कोए
जो मन खोजा आपणा, तो मुझसे बुरा ना कोए ||

धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होए
माली सींचे सौ घडा, ऋतु आए फल होए ||

सांई इतना दिजीये, जामें कुटंब समाए
मैं भी भूखा ना रहूं, साधू न भूखा जाए ||

कबीरा खडा बाजार में, मांगे सबकी खैर
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर ||

पोथी पड पड जग मुआ, पंडित भया ना कोए
ढ़ाई आखर प्रेम के, जो पढ़े सो पंडित होए ||

कबीरा गर्व ना किजीये, उंचा देख आवास
काल परौ भुइं लेटना, उपर जमसी घास ||

पाहन पूजै हरि मिले, तो मैं पूजूं पहार
ताते यह चाकी भली, पीस खाए संसार ||

कंकर पत्थर जोरी के, मस्जिद लयी बनाय
ता चढ़ी मुल्ला बांग दे, क्या बहिरा हुआ खुदाय ||

जब तूं आया जगत में, लोग हसें तू रोए
एसी करनी ना करी, पाछे हसें सब कोए ||

ज्यों नैनों में पुतली, त्यों मालिक घट माहिं
मूरख लोग ना जानहीं, बाहिर ढ़ूंढ़न जाहिं ||

माला फेरत जुग भया, मिटा ना मन का फेर
कर का मनका छोड दे, मन का मनका फेर ||

जब में था हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं
सब अंधियारा मिटी गया, जब दीपक देख्या माहिं ||

गुरु गोविंद दोऊ खडे, काके लागुं पाय
बलिहारी गुरु आपकी, जिन गोविंद दियो बताए ||

जाति ना पूछो साधू की, पूछ लिजिये ज्ञान
मोल करो तलवार का, पडी रहन दो म्यान ||

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोय
इक दिन एसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय ||

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सलीम भाई अंडे वाला

August 27th, 2011 · शख्सियत

सलीम अंडे वाला ये आदमी का टाईप एकदम अलग ही है, एकदम जुदा | कांकरोली शहर के जलचक्की तिराहे पर पेट्रोलपंप के पास लगाते है ये बायल अंडे, आमलेट, भुर्जी आदि की लारी जो कि इनका मुख्य व्यवसाय है | इनकी ये फर्म बहुत ही पुरानी है और शहर में कोई सिंगल आदमी ए॓सा नहीं होगा जो सलीम भाई अंडे वाले को ना जानता हो | लारी लगाने का भी टाईम फिक्स है, ना पहले ना लेट, और फिक्स मजदूरी हुई, समय हुआ कि ये चले | कहते हैं कि छोटा काम और धीरे चलने वाला समय आदमी को और भी ज्यादा सहनशील ‌और मजबूत बना देती है वेसा ही अनोखा इनका जीवन चरित्र भी है, कठिनाइयों से ना हारने का इनका जज्बा देखाने लायक है |

बारिश का मौसम, जलती हुई धुंआ देती सिगडी, और फिर भन्नाटेदार आमलेट व अंडे की खुशबू (जिन्हे अंडे नहीं पसंद वो बदबू भी कह सकते हैं) हर किसी शौकिन को जैसे जलचक्की पर आमन्त्रित करती है | कुल मिला कर ए॓सा प्राकर्तिक मसालेदार काम्बीनेशन तैयार होता है कि बस समां बंध जाता है | फिर इनका एक महावाक्य है कि संडे हो या मंडे रोज खाओ अंडे | कुछ भी हो इनके हाथ से बना आमलेट, बायल अंडा और भुर्जी जो एकबार खाये वह फिर जलचक्की से यूं ही निकल ना पाये | टेस्ट बडा ही जोरदार बिठाते हैं सब का ये, सबसे बडी बात बंदा हमेशा जो है उसमें खुश रहता हैं, और दूसरों का भी भरपूर मनोरंजन करता है | तकलीफों और कठिनाइयों से ना हारने का जोरदार जज्बा है इनका | मैं खुद व्यक्तिगत तौर पर उनके अनूठे व्यक्तित्व का और विशेष प्रकार की बोलचाल की स्टाइल का बडा प्रशंसक हूं | हां तो कभी समय मिले और अंडे से एलर्जी नहीं हो तो जरुर जाइयेगा इनकी लारी पर |

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अन्ना तुम संधर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं

August 22nd, 2011 · नई खबरें, राजसमन्द जिला

आज बाईस अगस्त है | कुछ दिन पुर्व ही अन्ना हजारे हमारे राजसमन्द में आये थे, आचार्य महाश्रमण का अमृत महोत्सव भी हमारे नजदीकी गांव केलवा में चल रहा है | यहां अन्ना हजारे नें कुछ सभायें ली और अपने विचार व्यक्त किये | लोग इस उम्र में उनके देश के प्रति प्रेम और जोश को देखकर दंग है |

खास तौर से युवा वर्ग का अन्ना हजारे को भरपूर समर्थन मिल रहा है जो कि बडी अच्छी बात है | भ्रष्टाचार के विरोध में हर कोई उनके साथ कंधे से कंधा मिलाने को तैयार हैं | हर तरफ से यही आवाज आ रही है “अन्ना तुम

anna hazare maharelly rajsamand

anna hazare maharelly rajsamand

संधर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं” | देश में हर जगह से अन्ना हजारे को जोरदार समर्थन मिल रहा है | मिलना भी चाहिये, देश के गद्दार ‌और विरोधी कहे जाने वाले लोग जेलों में फाईव स्टार सुविधायें पा रहे हैं और सच्ची बात कहने वाले को जान के लाले पडे हुये हैं | ये प्रजातन्त्र का कबाडा नहीं है तो क्या हैं |

आज अन्ना हजारे के समर्थन में राजसमन्द में एक महा रेली का आयोजन किया गया जिसमें छोटे बडे सभी संघठनों नें बढ़ चढ़ कर भाग लिया | छोटे बडे बूढ़े सब थे वहां | यहां हर कोई अपना काम काज छोड कर इस देशव्यापी आंदोलन का हिस्सा बनना चाह रहा था |

काम धंधा तो सबको रोज ही करना है, भ्रष्टाचार के विरोध में हम आज नहीं खडे होंगे तो कब होंगे | सभी व्यापारिक व सामाजिक संघठनों नें अपने अपने प्रतिष्ठान स्वेच्छा से बंद रखे और अपना सक्रिय सहयोग दिया |

पहली बार इतने बडे पैमाने पर जनता की जागरुकता देखने को मिली | बाकी कहा जाता है कि कांकरोली राजसमन्द की जनता जागरुक नहीं है पर आज जो दम खम देखने को मिला वैसा पहले कभी नहीं देखा गया | इस आंदोलन में भाग लेने वाले सभी व्यापारिक व सामाजिक संघठन, सब लोग बहुत धन्यवाद के पात्र है |

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राजसमन्द के स्वतन्त्रता सैनानीयों की सूची

August 15th, 2011 · राजसमन्द जिला, शख्सियत, स्वतन्त्रता सेनानी

independence  day india1857 की क्रांति के दौरान व उसके बाद सन 1947 तक स्वतन्त्रता मिलने तक भारत में स्वाधीनता हेतु कई लडाईयां हुयी | उस दौरान हमारे जिले राजसमन्द के लोगों मे भी स्वाधीनता प्राप्त करने की ललक पैदा हुई और यहां भी स्वतन्त्रता सैनानीयों ने अंग्रेज सरकार के खिलाफ एलान ए जंग किया था |

विरोध प्रदर्शन, लडाईयां और ना जाने क्या क्या किया था यहां के बाशिंदो नें |

आज 15 अगस्त के दिन मन किया कि उन सभी को स्वाधीनता के प्रेमी लडाकों को याद किया जाये जिन्होने हमारे संपुर्ण राजसमन्द जिले में जगह जगह से अंग्रेजी सरकार के खिलाफ अपना झंडा उंचा किया | क्षेत्र विशेष के स्वतन्त्रता सैनानीयों की इस लिस्ट में केवल मुख्य लोगों के नाम है और इन सबके अलावा भी सेंकडों हजारों लोगों ने इस आजादी के आंदोलन में अपना बहुत सहयोग दिया था, आज उनके ही कारण हम आम आदमी लोग आजादी से खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं |

राजसमन्द के प्रमुख स्वतन्त्रता सैनानी जिन्होने स्वाधीनता के संघर्ष में अपना अमूल्य योगदान दियाः

कांकरोली व राजनगर के प्रमुख स्वतन्त्रता सैनानीः
अम्बालाल जोशी, राम सिंह भाटी, मनरुप मानूराम रेगर, पन्नालाल पीयूष, मोहनलाल निष्कलंक, लक्ष्मीनारायण शर्मा, भेरुलाल टेलर, श्यामलाल गौरवा, रामलाल शर्मा, किशनलाल खत्री, आनंदीलाल शर्मा, भंवरलाल आचार्य, रामबाबू शर्मा, शंकरदेव भारतीय, देवेन्द्र जी कर्णावट और रमादेवी भारतीय |

आमेट के प्रमुख स्वतन्त्रता सैनानीः
मोहनलाल कोठारी, अम्बालाल वैध और उदयलाल जी |

कुंभलगढ़ के प्रमुख स्वतन्त्रता सैनानीः
इन्दरलाल वैध और हीरालाल देवपुरा

भीम के प्रमुख स्वतन्त्रता सैनानीः
रोड सिंह जी, त्रिलोक सिंह, पन्नासिंह बजादा, हीरासिंह एवं रुप सिहं |

देवगढ़ के प्रमुख स्वतन्त्रता सैनानीः
पीरु जी, चुन्नीलाल जी जैन, पुरणसिंह, खेमसिंह, डा. बूलचन्द और उग्रसिंह मेहता |

नाथद्दारा के प्रमुख स्वतन्त्रता सैनानीः
नरेन्द्रपाल सिंह चौधरी, किशनलाल शर्मा, पुरुषोत्तम चौधरी, भेरूलाल पालीवाल, द्धारकादास पुरोहित, घासीराम पालीवाल, श्रीकृष्ण शर्मा, रुकमाबाई, नंदकिशोर पालीवाल, राधाकृष्ण कटारा, नारायणदास बागोरा, किशनलाल गुर्जर, गोपालदास पोपट, कमलाबाई, पुरुषोत्तम पालीवाल, परसराम पालीवाल, भंवरलाल पालीवाल, गुलाबबाई, कजोडबाई, शिवदत्त सनाढ़्य, धूलचंद सेवक, इश्वरलाल खत्री, श्यामसुंदर जोशी, शिवनारायण पालीवाल, रघुनाथ पालीवाल, टमूबाई, घासीराम पालीवाल, रामचन्द्र बागोरा, पृथ्वीराज पालीवाल, हरिदास सनाढ़्य, शिवनाथ दर्जी, डा. मन्नालाल, दानमल भाटिया, जेठमल पारीख, कमला बागोरा, सूरजदेवी, वैध भवानीशंकर पालीवाल, अंबालाल पालीबाल, गिरधारीलाल भाटिया, रतनलाल कर्णावट, कज्जूलाल पोरवाल, बापू फतेहलाल जी, भुपेन्द्रसिंह चौधरी, नंदलाल जोशी, राजेन्द्रसिंह चौधरी, मनोहर कोठारी, छन्नुसिंह चौधरी, नवनीत जाट, भंवर लाल कोठारी, गणेशसिंह राजपूत, नानालाल मोदी, जीवनलाल बिडला, हरिदास चौधरी, भगवानदास गुर्जर, बंशीलाल सोनी, मोतीलाल टेलर, फूलचंद पोरवाल, मोहनलाल, मन्नालाल बोहरा, नाथूलाल, कन्हैयालाल, शंकरलाल, नारायणी देवी, भगवतीदेवी और जगनलाल खंडेलवाल |

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