Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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सारे जहां से अच्छा – इकबाल

August 7th, 2011 · स्वतन्त्रता सेनानी

independence day indiaइस गीत को लिखे हुए एक सदी से ज्यादा बीत चुकी है | आज लगभग एक सो चार साल हो चुके है इसे लिखे पर फिर भी जब भी हम इसे सुनते है, तो मानों एक अलग सा ही जोश, अलग ही तरह का स्वाभिमान हमारे अंदर जाग उठता है, देश के प्रति प्रेम की अनूभुति होती हैं | आखिर जो बात भारत में हैं वह कहीं और नहीं |

आज भी सारे जहां से अच्छा इस तराना ए हिन्द के बगैर स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस या कोई भी राष्ट्रीय पर्व पूरा नहीं मनता | इसे लिखा था इकबाल नें |

पेश है इस अमर गीत के बोल |

सारे जहां से अच्छाः इकबाल

सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा
हम बुलबलें हैं उसकी ये गुलसिता हमारा |

गुरबत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में
समझो वहीं हमें भी दिल है जहां हमारा |

पर्वत वो सबसे ऊंचा हम्साया आसमां का
वो संतरी हमारा वो पासबां हमारा |

गोदी में खेलती हैं जिसकी हजारों नदियां
गुलशन है जिसके दम से रशके जिनां हमारा |

ऐ आबे रौदे गंगा ! वो दिन है याद तुझको
उतरा तेरे किनारे जब कारवां हमारा |

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दुस्तां हमारा |

यूनान ओ मिस्र ओ रोमा सब मिट गये जहां से
अब तक मगर है बाक़ी नाम ओ निशां हमारा |

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमां हमारा |

इकबाल ! कोई मरहम अपना नहीं जहां में
मालूम क्या किसी को दर्दे जहां हमारा |


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अग्निपथ – हरिवंशराय बच्चन

August 7th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

हरिवंशराय बच्चन की एक बहुत ही उम्दा कविता है अग्निपथ | अग्निपथ एक फिल्म भी है जिसमे मुख्य किरदार निभाया है उन्हीं के महानायक सुपुत्र अमिताभ बच्चन नें | अग्निपथ को हम कह सकते हैं ये उन लोगों को समर्पित है जो कि आजीवन संघर्ष में लिप्त रहते हैं ए॓से की मानों संघर्ष के सिवा उनके जीवन में कुछ और नहीं |

संघर्षशील व्यक्ती हमेशा छोटे लोगों का भी पूरा सम्मान करते हैं और बडी से बडी कठिनाई आने पर भी ना डरने की बात करते हैं | मैं अपने आस पास के संघर्षशील लोगों को देखता हूं तो यही कविता मुझे बरबस याद आती हैं |

अग्निपथः हरिवंशराय बच्चन

अग्निपथ

अग्निपथ

वृक्ष हो भले खडे,

हों घने, हों बडे,
एक पत्र छाहं भी,
मांग मत, मांग मत, मांग मत,
अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ |

तू न थकेगा कभी,
तू न थमेगा कभी,
तू न मुडेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ |

यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रु, स्वेद, रक्त से,
लथपथ, लथपथ, लथपथ,
अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ |

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पुरानी जींस और गिटार

August 7th, 2011 · फिल्म रिव्यु

पुरानी जींस और गि‍टार

पुरानी जींस और गि‍टार

सन इठतानवे के दौरान पुरानी जींस और गिटार का ये गाना कालेज के लडके लडकियों नें तो इतना सुना इतना सुना की सारे रिकार्ड टूट गये | अली हैदर का यह गीत उस समय सबकी जुबान पर था | ए॓सा हो भी क्यों नहीं, क्योंकि गाना है भी सबके दिल के करीब |

सुनते है कालेज के बीते हुये दिनों को, आज फिर मुझे पता नहीं क्यों स्कूल कालेज के वह सुनहरे दिन याद आ रहे हैं।

सारी घटनायें जो स्कूल कालेज के दिनों मे हर लडके के जीवन में घटती है वे सारी इस गाने में हम क्रमबद्ध तरीके से देख सकते हैं |

लिखा भी इतना खूबसूरत है कि बस मन करता है कि सुनते ही जायें, सुनते ही जायें |

पुरानी जींस और गिटार ० इस गीत के बोल हैः

पुरानी जींस और गि‍टार
मोहल्‍ले की वो छत और मेरे यार
वो रातों को जागना
सुबह घर जाना कूद के दीवार

वो सि‍गरेट पीना गली में जाके ।
वो दॉतों को घड़ी-घड़ी साफ
पहुँचना कॉलेज हमेशा लेट
वो कहना सर का – ‘गेट आउट फ्रॉम दी क्‍लास |

वो बाहर जाके हमेशा कहना –
यहॉं का सि‍स्‍टम ही है खराब ।
वो जाके कैंटि‍न में टेबल बजाके
वो गाने गाना यारों के साथ
बस यादें, यादें रह जाती हैं
कुछ छोटी, छोटी बातें रह जाती हैं ।
बस यादें…………

वो पापा का डॉटना
वो कहना मम्‍मी का – छोड़ि‍ए जी आप |
तुम्‍हें तो नजर आता है
जहॉं में बेटा मेरा ही खराब !

वो दि‍ल में सोचना करके कुछ दि‍खा दें
वो करना प्‍लैनिंग रोज़ नयी यार ।
लड़कपन का वो पहला प्‍यार
वो लि‍खना हाथों पे ए प्‍लस आर.

वो खि‍ड़की से झॉंकना
वो लि‍खना लेटर तुम्‍हें बार-बार
वो देना तोहफे में सोने की बालि‍यॉं
वो लेना दोस्‍तों से पैसे उधार
बस यादें, यादें रह जाती हैं
कुछ छोटी, छोटी बातें रह जाती हैं ।
बस यादें…………

ऐसी यादों का मौसम चला
भूलता ही नहीं दि‍ल मेरा
पुरानी जींस और गि‍टार…..

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हल्दीघाटीः युद्ध ‍| श्याम नारायण पान्डेय

July 30th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

श्याम नारायण पान्डेय एक बहुत ही विशेष कवि हैं जिन्होनें हल्दीघाटी युद्ध जैसे विषय पर बहुत महान रचना की है, आप ये जरुर पढ़ें और अन्य लोगों को भी सुनायें, केवल पठन मात्र से ही रग रग में जोश का सा संचार आप महसूस कर सकते हैं |

हल्दीघाटीः युद्ध ‍| श्याम नारायण पान्डेयः

निर्बल बकरों से बाघ लडे

haldighati war man singh pratap

haldighati war man singh pratap

भिड गये सिंह मृग छौनो से
घोडे गिर पडे, गिरे हाथी
पैदल बिछ गये बिछौनो से

हाथी से हाथी जूझ पडे
भिड गये सवार सवारों से
घोडे पर घोडे टूट पडे
तलवार लडी तलवारों से

हय रुण्ड गिरे, गज मुण्ड गिरे
कट कट अवनि पर शुण्ड गिरे
लडते लडते अरि झुण्ड गिरे
भू पर हय विकल वितुण्ड गिरे

मेवाड केसरी देख रहा
केवल रण का न तमाशा था
वह दौड दौड करता था रण
वह मान रक्त का प्यासा था

चढ़ कर चेतक पर घूम घूम
करता सेना रखवाली था
ले महा मृत्यु को साथ साथ
मानो साक्षात कपाली था

रण बीच चौकडी भर भर कर
चेतक बन गया निराला था
राणा प्रताप के घोडे से
पड गया हवा को पाला था

गिरता ना कभी चेतक तन पर |  सेना नायक राणा के भी
राणा प्रताप का कोडा था |           रण देख देख कर चाह भरे
वह दौड रहा अरि मस्तक पर |   मेवाड सिपाही लडते थे
या आसमान पर घोडा था |         दूने तिगुने उत्साह भरे

जो तनिक हवा से बाग हिली |    क्षण भर में गिरते रूण्डों से
लेकर सवार उड जाता था |         मदमस्त गजों के झुण्डों से
राणा की पुतली फिरी नहीं |       घोडों के विकल वितुण्डों से
तब तक चेतक मुड जाता था  | पट गई भुमि नर मुण्डों से

कौशल दिखलाया चालों में |   ए॓सा रण राणा करता था
उड गया भयानक भालों में |  पर उसको था संतोष नहीं
निर्भिक गया वह ढ़ालों में |     क्षण क्षण आगे बढ़ता था वह
सरपट दौडा करवालों में |        पर कम होता था रोष नहीं

है यहीं रहा, अब यहां नहीं |            कहता था लडता मान कहां
वह वहीं रहा, अब वहां नहीं |          मैं कर लुं रक्तस्नान कहां
थी जगह ना कोई जहां नहीं |          जिस पर तय विजय हमारी है
किस अरि मस्तक पर कहां नहीं |    वह मुगलों का अभिमान कहां

बढ़ते नद सा वह लहर गया |      भाला कहता था मान कहां
वह गया गया, फिर ठहर गया |   घोडा कहता था मान कहां
विकराल वज्र मय बादल सा |     राणा की लोहित आंखों से
अरि की सेना पर घहर गया |     रव निकल रहा था मान कहां

चढ़ चेतक पर तलवार उठा |   लडता अकबर सुल्तान कहां
रखता था भूतल पानी को |     वह कुल कलंक है मान कहा
राणा प्रताप सिर काट काट |    राणा कहता था बार बार
करता था सफल जवानी को |  मैं करूं शत्रु बलिदान कहां

कल कल बहती थी रण गंगा |  तब तक प्रताप ने देख लिया
अरिदल को डूब नहाने को |      लड रहा मान था हाथी पर
तलवार वीर की नाव बनी |      अकबर का चंचल साभिमान
चटपट उस पार लगाने को |     उडता निशान था हाथी पर

वैरी दल को ललकार गिरी |    फिर रक्त देह का उबल उठा
वह नागन सी फुफकार गिरी | जल उठा क्रोध की ज्वाला से
था शौर मौत से बचो बचो |      घोडा ले कहा बढ़ो आगे
तलवार गिरी, तलवार गिरी | बढ़ चलो कहा निज भाला से

पैदल से हय दल, गज दल में |     हय नस नस में बिजली दौडी
छिप छप करती वह विकल गई | राणा का घोडा लहर उठा
क्षण कहां गई कुछ पता न फिर |  शत शत बिजली की आग लिये
देखो चम चम वह निकल गई |     वह प्रलय मेघ सा घहर उठा

क्षण इधर गई, क्षण उधर गई |    रंचक राणा ने देर न की
क्षण चढ़ी बाढ़ सी उतर गई |       घोडा बढ़ आया हाथी पर
था प्रलय चमकती जिधर गई |    वैरी दल का सिर काट काट
क्षण शोर हो गया किधर गई |       राणा बढ़ आया हाथी पर

क्या अजब विषैली नागिन थी |  वह महा प्रतापी घोडा उड
जिसके डसने में लहर नहीं |       जंगी हाथी को हबक उठा
उतरी तन से मिट गये वीर |      भीषण विप्लव का दृश्य देख
फैला शरीर में जहर नहीं |          भय से अकबर दल दबक उठा

थी छुरी कहीं, तलवार कहीं |       क्षण भर छल बल कर खडा अडा
वह बरछी असि करधार कहीं |     दो पैरों पर हो गया खडा
वह आग कहीं, अंगार कहीं |       फिर अपने दोनो पैरों को
बिजली थी कहीं, कटार कहीं |    हाथी मस्तक पर दिया अडा

लहराती थी सिर काट काट |
बल खाती थी भू पाट पाट |
बिखराती अवयव बाट बाट |
तनती थी लोहू चाट चाट |

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पीथल और पाथलः कन्हैयालाल सेठिया

July 30th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

राजस्थान के एक बहुत ही होनहार कवि थे कन्हैयालाल सेठिया | वे राजस्थानी में कवितायें, गीत आदि लिखा करते थे, बडा ही उम्दा लेखन था उनका |वे अपनी रचनाओं में शब्दों की ए॓सी जादूगरी जोडते थे कि बस….. आज के जमाने में भी राजस्थान की महिमा का बखान करते उनके गीत व कवितायें बहुत ही शौक से पढ़ी व सुनी जाती हैं | उनकी एक बहुत ही जोरदार रचना है वह है पीथल और पाथल |

chetak and rana pratap

chetak and rana pratap

ये कविता इंगित करती है हमें तब जब महाराणा प्रताप का जीवन काल बहत ही कठिनाई के दौर से गुजर रहा था, वे मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं करना चाहाते थे और परिणामस्वरूप उन्हें जंगल जंगल में छुप छुप कर गुजर बसर करनी पड रही थी | राणा प्रताप मेवाड को मुगलों से वापस छीनना चाहते थे और उसी कारण छापामार युद्ध कर रहे थे और मुगलों को करारा नुकसान दे रहे थे | उन्हीं कठीनाई के दिनों में एक दिन जब राणा प्रताप नें अपने पुत्र अमरसिंह को घास से बनी रोटी खाने के लिये दी और वह भी एक जंगली बिल्ला ले कर भाग गया, अपने पु्त्र को भूख से रोता देख राणा का मन द्रवित हो उठा और उन्होने आत्मसमर्पण हेतू अकबर को एक पत्र भेजा |

अकबर को खुद यकीन नहीं हुआ की प्रताप इस तरह अधीनता स्वीकार करेगें पर यही जांचने के लिये अकबर नें अपने कवि पीथल को एक पत्र भेजने को कहा | पीथल राणा प्रताप को मन ही मन बहुत सम्मान करता था | पीथल ने कुछ जोश से भरपूर पक्तियां लिखी और महाराणा प्रताप को फिर कभी न झुकने के प्रण को याद दिलाया | और महाराणा प्रताप फिर से मुगलों से लोहा लेने के लिये तत्पर तैयार खडे हुये | और पीथल राणा से जागे स्वाभिमान को देख बहुत हर्षाया | यही सब कुछ है इस ए॓तिहासिक कविता पीथल और पाथल में |

पीथल और पाथलः कन्हैयालाल सेठिया

अरे घास री रोटी ही, जद बन बिलावडो ले भाग्यो |
नान्हों सो अमरयो चीख पड्यो, राणा रो सोयो दुःख जाग्यो ||

हूं लड्यो घणो, हूं सह्यो घणो, मेवाडी मान बचावण नै |
में पाछ नहीं राखी रण में, बैरया रो खून बहावण नै ||

जब याद करूं हल्दीघाटी, नैणा में रगत उतर आवै |
सुख दुख रो साथी चेतकडो, सूती सी हूक जगा जावै ||

पण आज बिलखतो देखूं हूं, जद राजकंवर नै रोटी नै |
तो क्षात्र धर्म नें भूलूं हूं, भूलूं हिन्वाणी चोटौ नै ||

आ सोच हुई दो टूक तडक, राणा री भीम बजर छाती |
आंख्यां में आंसू भर बोल्यो, हूं लिख्स्यूं अकबर नै पाती ||

राणा रो कागद बांच हुयो, अकबर रो सपणो सो सांचो |
पण नैण करया बिसवास नहीं,जद बांच बांच नै फिर बांच्यो ||

बस दूत इसारो पा भाज्यो, पीथल ने तुरत बुलावण नै |
किरणा रो पीथल आ पूग्यो, अकबर रो भरम मिटावण नै ||

म्हे बांध लिये है पीथल ! सुण पिजंरा में जंगली सेर पकड |
यो देख हाथ रो कागद है, तू देका फिरसी कियां अकड ||

हूं आज पातस्या धरती रो, मेवाडी पाग पगां में है |
अब बता मनै किण रजवट नै, रजुॡती खूण रगां में है ||

जद पीथल कागद ले देखी, राणा री सागी सैनांणी |
नीचै सूं धरती खिसक गयी, आंख्यों में भर आयो पाणी ||

पण फेर कही तत्काल संभल, आ बात सफा ही झूठी हैं |
राणा री पाग सदा उंची, राणा री आन अटूटी है ||

ज्यो हुकुम होय तो लिख पूछूं, राणा नै कागद रै खातर |
लै पूछ भला ही पीथल तू ! आ बात सही बोल्यो अकबर ||

म्हें आज सूणी है नाहरियो, स्याला रै सागै सोवैलो |
म्हें आज सूणी है सूरजडो, बादल री आंटा खोवैलो ||

पीथल रा आखर पढ़ता ही, राणा री आंख्या लाल हुई |
धिक्कार मनैं में कायर हूं, नाहर री एक दकाल हुई ||

हूं भूखं मरुं हूं प्यास मरूं, मेवाड धरा आजाद रहैं |
हूं घोर उजाडा में भटकूं, पण मन में मां री याद रह्वै ||

पीथल के खिमता बादल री, जो रोकै सूर उगाली नै |
सिहां री हाथल सह लैवे, वा कूंख मिली कद स्याली नै ||

जद राणा रो संदेस गयो, पीथल री छाती दूणी ही |
हिंदवाणो सूरज चमके हो, अकबर री दुनिया सुनी ही ||

Photo Source: http://www.flickr.com/photos/vighanesh/5856243526/

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