Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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खुब लडी मर्दानी – सुभद्रा कुमारी चौहान

August 7th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

Rani Laxmi Bai

Rani Laxmi Bai

सुभद्रा कुमारी चौहान एक बहुत ही महान कवियत्री थी और उन्होनें स्वयं आजादी की लडाइयों में बढ़ चढ़ कर भाग लिया और देशवासियों को अपने कलम के लेखन से जागृत भी किया | उन्होने खुब लडी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी नाम से एक कविता लिखी जो कि एक अमर कविता है झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के जीवन चरित्र पर |

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने आजादी के लिये अंग्रेजी सरकार से लोहा लिया और अतं में अपने प्राणों को न्योछावर किया | केवल पढ़ने मात्र से ही आप वीर रस की कविताएं सुनकर पैदा होने वाले जोश का अनुभव कर सकते है |

खुब लडी मर्दानीः सुभद्रा कुमारी चौहान

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी ।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ।।

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी ।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार ।
महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई ।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया ।
अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ।।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात ।
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ।।

रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
‘नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार’ ।
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ।।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान ।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम ।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में ।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार ।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी ।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय ! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार ।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी ।
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ।।

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पुष्प की अभिलाषा – माखन लाल चतुर्वेदी

August 7th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

पुष्प की अभिलाषा

पुष्प की अभिलाषा

बचपन में स्कूल के दौरान पढ़ी माखन लाल चतुर्वेदी की एक कविता पुष्प की अभिलाषा आज मुझे याद आ रही है | आजादी हमें भले ही बहुत आसानी से मिल गई थी, जब हमनें जन्म लिया और पाया कि हम गुलाम नहीं है, और आज हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं | पन्द्रह अगस्त आने वाला है | हमारी आजादी के पीछे बहुत से लोगों की कुरबानियां हैं और ये वीर शहीद लोगों को याद करने का मौका हैं |

पुष्प की अभिलाषाः माखन लाल चतुर्वेदी

चाह नहीं में सुरबाला के
गहनों में गूंथा जाऊं

चाह नहीं प्रेमी माला में
बिध प्यारी को ललचाऊं

चाह नहीं सम्राटों के शव
पर हे हरि डाला जाऊं

चाह नहीं देवों के सिर पर
चढ़ूं भाग्य पर इठलाऊं

मुझे तोड लेना बनमाली
उस पथ पर देना तुम फेंक

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जायें वीर अनेक |

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सारे जहां से अच्छा – इकबाल

August 7th, 2011 · स्वतन्त्रता सेनानी

independence day indiaइस गीत को लिखे हुए एक सदी से ज्यादा बीत चुकी है | आज लगभग एक सो चार साल हो चुके है इसे लिखे पर फिर भी जब भी हम इसे सुनते है, तो मानों एक अलग सा ही जोश, अलग ही तरह का स्वाभिमान हमारे अंदर जाग उठता है, देश के प्रति प्रेम की अनूभुति होती हैं | आखिर जो बात भारत में हैं वह कहीं और नहीं |

आज भी सारे जहां से अच्छा इस तराना ए हिन्द के बगैर स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस या कोई भी राष्ट्रीय पर्व पूरा नहीं मनता | इसे लिखा था इकबाल नें |

पेश है इस अमर गीत के बोल |

सारे जहां से अच्छाः इकबाल

सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा
हम बुलबलें हैं उसकी ये गुलसिता हमारा |

गुरबत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में
समझो वहीं हमें भी दिल है जहां हमारा |

पर्वत वो सबसे ऊंचा हम्साया आसमां का
वो संतरी हमारा वो पासबां हमारा |

गोदी में खेलती हैं जिसकी हजारों नदियां
गुलशन है जिसके दम से रशके जिनां हमारा |

ऐ आबे रौदे गंगा ! वो दिन है याद तुझको
उतरा तेरे किनारे जब कारवां हमारा |

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दुस्तां हमारा |

यूनान ओ मिस्र ओ रोमा सब मिट गये जहां से
अब तक मगर है बाक़ी नाम ओ निशां हमारा |

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमां हमारा |

इकबाल ! कोई मरहम अपना नहीं जहां में
मालूम क्या किसी को दर्दे जहां हमारा |


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अग्निपथ – हरिवंशराय बच्चन

August 7th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

हरिवंशराय बच्चन की एक बहुत ही उम्दा कविता है अग्निपथ | अग्निपथ एक फिल्म भी है जिसमे मुख्य किरदार निभाया है उन्हीं के महानायक सुपुत्र अमिताभ बच्चन नें | अग्निपथ को हम कह सकते हैं ये उन लोगों को समर्पित है जो कि आजीवन संघर्ष में लिप्त रहते हैं ए॓से की मानों संघर्ष के सिवा उनके जीवन में कुछ और नहीं |

संघर्षशील व्यक्ती हमेशा छोटे लोगों का भी पूरा सम्मान करते हैं और बडी से बडी कठिनाई आने पर भी ना डरने की बात करते हैं | मैं अपने आस पास के संघर्षशील लोगों को देखता हूं तो यही कविता मुझे बरबस याद आती हैं |

अग्निपथः हरिवंशराय बच्चन

अग्निपथ

अग्निपथ

वृक्ष हो भले खडे,

हों घने, हों बडे,
एक पत्र छाहं भी,
मांग मत, मांग मत, मांग मत,
अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ |

तू न थकेगा कभी,
तू न थमेगा कभी,
तू न मुडेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ |

यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रु, स्वेद, रक्त से,
लथपथ, लथपथ, लथपथ,
अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ |

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पुरानी जींस और गिटार

August 7th, 2011 · फिल्म रिव्यु

पुरानी जींस और गि‍टार

पुरानी जींस और गि‍टार

सन इठतानवे के दौरान पुरानी जींस और गिटार का ये गाना कालेज के लडके लडकियों नें तो इतना सुना इतना सुना की सारे रिकार्ड टूट गये | अली हैदर का यह गीत उस समय सबकी जुबान पर था | ए॓सा हो भी क्यों नहीं, क्योंकि गाना है भी सबके दिल के करीब |

सुनते है कालेज के बीते हुये दिनों को, आज फिर मुझे पता नहीं क्यों स्कूल कालेज के वह सुनहरे दिन याद आ रहे हैं।

सारी घटनायें जो स्कूल कालेज के दिनों मे हर लडके के जीवन में घटती है वे सारी इस गाने में हम क्रमबद्ध तरीके से देख सकते हैं |

लिखा भी इतना खूबसूरत है कि बस मन करता है कि सुनते ही जायें, सुनते ही जायें |

पुरानी जींस और गिटार ० इस गीत के बोल हैः

पुरानी जींस और गि‍टार
मोहल्‍ले की वो छत और मेरे यार
वो रातों को जागना
सुबह घर जाना कूद के दीवार

वो सि‍गरेट पीना गली में जाके ।
वो दॉतों को घड़ी-घड़ी साफ
पहुँचना कॉलेज हमेशा लेट
वो कहना सर का – ‘गेट आउट फ्रॉम दी क्‍लास |

वो बाहर जाके हमेशा कहना –
यहॉं का सि‍स्‍टम ही है खराब ।
वो जाके कैंटि‍न में टेबल बजाके
वो गाने गाना यारों के साथ
बस यादें, यादें रह जाती हैं
कुछ छोटी, छोटी बातें रह जाती हैं ।
बस यादें…………

वो पापा का डॉटना
वो कहना मम्‍मी का – छोड़ि‍ए जी आप |
तुम्‍हें तो नजर आता है
जहॉं में बेटा मेरा ही खराब !

वो दि‍ल में सोचना करके कुछ दि‍खा दें
वो करना प्‍लैनिंग रोज़ नयी यार ।
लड़कपन का वो पहला प्‍यार
वो लि‍खना हाथों पे ए प्‍लस आर.

वो खि‍ड़की से झॉंकना
वो लि‍खना लेटर तुम्‍हें बार-बार
वो देना तोहफे में सोने की बालि‍यॉं
वो लेना दोस्‍तों से पैसे उधार
बस यादें, यादें रह जाती हैं
कुछ छोटी, छोटी बातें रह जाती हैं ।
बस यादें…………

ऐसी यादों का मौसम चला
भूलता ही नहीं दि‍ल मेरा
पुरानी जींस और गि‍टार…..

→ अब तक कोई टिप्पणीं नहींटैग्सः ····