Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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हल्दीघाटीः युद्ध ‍| श्याम नारायण पान्डेय

July 30th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

श्याम नारायण पान्डेय एक बहुत ही विशेष कवि हैं जिन्होनें हल्दीघाटी युद्ध जैसे विषय पर बहुत महान रचना की है, आप ये जरुर पढ़ें और अन्य लोगों को भी सुनायें, केवल पठन मात्र से ही रग रग में जोश का सा संचार आप महसूस कर सकते हैं |

हल्दीघाटीः युद्ध ‍| श्याम नारायण पान्डेयः

निर्बल बकरों से बाघ लडे

haldighati war man singh pratap

haldighati war man singh pratap

भिड गये सिंह मृग छौनो से
घोडे गिर पडे, गिरे हाथी
पैदल बिछ गये बिछौनो से

हाथी से हाथी जूझ पडे
भिड गये सवार सवारों से
घोडे पर घोडे टूट पडे
तलवार लडी तलवारों से

हय रुण्ड गिरे, गज मुण्ड गिरे
कट कट अवनि पर शुण्ड गिरे
लडते लडते अरि झुण्ड गिरे
भू पर हय विकल वितुण्ड गिरे

मेवाड केसरी देख रहा
केवल रण का न तमाशा था
वह दौड दौड करता था रण
वह मान रक्त का प्यासा था

चढ़ कर चेतक पर घूम घूम
करता सेना रखवाली था
ले महा मृत्यु को साथ साथ
मानो साक्षात कपाली था

रण बीच चौकडी भर भर कर
चेतक बन गया निराला था
राणा प्रताप के घोडे से
पड गया हवा को पाला था

गिरता ना कभी चेतक तन पर |  सेना नायक राणा के भी
राणा प्रताप का कोडा था |           रण देख देख कर चाह भरे
वह दौड रहा अरि मस्तक पर |   मेवाड सिपाही लडते थे
या आसमान पर घोडा था |         दूने तिगुने उत्साह भरे

जो तनिक हवा से बाग हिली |    क्षण भर में गिरते रूण्डों से
लेकर सवार उड जाता था |         मदमस्त गजों के झुण्डों से
राणा की पुतली फिरी नहीं |       घोडों के विकल वितुण्डों से
तब तक चेतक मुड जाता था  | पट गई भुमि नर मुण्डों से

कौशल दिखलाया चालों में |   ए॓सा रण राणा करता था
उड गया भयानक भालों में |  पर उसको था संतोष नहीं
निर्भिक गया वह ढ़ालों में |     क्षण क्षण आगे बढ़ता था वह
सरपट दौडा करवालों में |        पर कम होता था रोष नहीं

है यहीं रहा, अब यहां नहीं |            कहता था लडता मान कहां
वह वहीं रहा, अब वहां नहीं |          मैं कर लुं रक्तस्नान कहां
थी जगह ना कोई जहां नहीं |          जिस पर तय विजय हमारी है
किस अरि मस्तक पर कहां नहीं |    वह मुगलों का अभिमान कहां

बढ़ते नद सा वह लहर गया |      भाला कहता था मान कहां
वह गया गया, फिर ठहर गया |   घोडा कहता था मान कहां
विकराल वज्र मय बादल सा |     राणा की लोहित आंखों से
अरि की सेना पर घहर गया |     रव निकल रहा था मान कहां

चढ़ चेतक पर तलवार उठा |   लडता अकबर सुल्तान कहां
रखता था भूतल पानी को |     वह कुल कलंक है मान कहा
राणा प्रताप सिर काट काट |    राणा कहता था बार बार
करता था सफल जवानी को |  मैं करूं शत्रु बलिदान कहां

कल कल बहती थी रण गंगा |  तब तक प्रताप ने देख लिया
अरिदल को डूब नहाने को |      लड रहा मान था हाथी पर
तलवार वीर की नाव बनी |      अकबर का चंचल साभिमान
चटपट उस पार लगाने को |     उडता निशान था हाथी पर

वैरी दल को ललकार गिरी |    फिर रक्त देह का उबल उठा
वह नागन सी फुफकार गिरी | जल उठा क्रोध की ज्वाला से
था शौर मौत से बचो बचो |      घोडा ले कहा बढ़ो आगे
तलवार गिरी, तलवार गिरी | बढ़ चलो कहा निज भाला से

पैदल से हय दल, गज दल में |     हय नस नस में बिजली दौडी
छिप छप करती वह विकल गई | राणा का घोडा लहर उठा
क्षण कहां गई कुछ पता न फिर |  शत शत बिजली की आग लिये
देखो चम चम वह निकल गई |     वह प्रलय मेघ सा घहर उठा

क्षण इधर गई, क्षण उधर गई |    रंचक राणा ने देर न की
क्षण चढ़ी बाढ़ सी उतर गई |       घोडा बढ़ आया हाथी पर
था प्रलय चमकती जिधर गई |    वैरी दल का सिर काट काट
क्षण शोर हो गया किधर गई |       राणा बढ़ आया हाथी पर

क्या अजब विषैली नागिन थी |  वह महा प्रतापी घोडा उड
जिसके डसने में लहर नहीं |       जंगी हाथी को हबक उठा
उतरी तन से मिट गये वीर |      भीषण विप्लव का दृश्य देख
फैला शरीर में जहर नहीं |          भय से अकबर दल दबक उठा

थी छुरी कहीं, तलवार कहीं |       क्षण भर छल बल कर खडा अडा
वह बरछी असि करधार कहीं |     दो पैरों पर हो गया खडा
वह आग कहीं, अंगार कहीं |       फिर अपने दोनो पैरों को
बिजली थी कहीं, कटार कहीं |    हाथी मस्तक पर दिया अडा

लहराती थी सिर काट काट |
बल खाती थी भू पाट पाट |
बिखराती अवयव बाट बाट |
तनती थी लोहू चाट चाट |

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पीथल और पाथलः कन्हैयालाल सेठिया

July 30th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

राजस्थान के एक बहुत ही होनहार कवि थे कन्हैयालाल सेठिया | वे राजस्थानी में कवितायें, गीत आदि लिखा करते थे, बडा ही उम्दा लेखन था उनका |वे अपनी रचनाओं में शब्दों की ए॓सी जादूगरी जोडते थे कि बस….. आज के जमाने में भी राजस्थान की महिमा का बखान करते उनके गीत व कवितायें बहुत ही शौक से पढ़ी व सुनी जाती हैं | उनकी एक बहुत ही जोरदार रचना है वह है पीथल और पाथल |

chetak and rana pratap

chetak and rana pratap

ये कविता इंगित करती है हमें तब जब महाराणा प्रताप का जीवन काल बहत ही कठिनाई के दौर से गुजर रहा था, वे मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं करना चाहाते थे और परिणामस्वरूप उन्हें जंगल जंगल में छुप छुप कर गुजर बसर करनी पड रही थी | राणा प्रताप मेवाड को मुगलों से वापस छीनना चाहते थे और उसी कारण छापामार युद्ध कर रहे थे और मुगलों को करारा नुकसान दे रहे थे | उन्हीं कठीनाई के दिनों में एक दिन जब राणा प्रताप नें अपने पुत्र अमरसिंह को घास से बनी रोटी खाने के लिये दी और वह भी एक जंगली बिल्ला ले कर भाग गया, अपने पु्त्र को भूख से रोता देख राणा का मन द्रवित हो उठा और उन्होने आत्मसमर्पण हेतू अकबर को एक पत्र भेजा |

अकबर को खुद यकीन नहीं हुआ की प्रताप इस तरह अधीनता स्वीकार करेगें पर यही जांचने के लिये अकबर नें अपने कवि पीथल को एक पत्र भेजने को कहा | पीथल राणा प्रताप को मन ही मन बहुत सम्मान करता था | पीथल ने कुछ जोश से भरपूर पक्तियां लिखी और महाराणा प्रताप को फिर कभी न झुकने के प्रण को याद दिलाया | और महाराणा प्रताप फिर से मुगलों से लोहा लेने के लिये तत्पर तैयार खडे हुये | और पीथल राणा से जागे स्वाभिमान को देख बहुत हर्षाया | यही सब कुछ है इस ए॓तिहासिक कविता पीथल और पाथल में |

पीथल और पाथलः कन्हैयालाल सेठिया

अरे घास री रोटी ही, जद बन बिलावडो ले भाग्यो |
नान्हों सो अमरयो चीख पड्यो, राणा रो सोयो दुःख जाग्यो ||

हूं लड्यो घणो, हूं सह्यो घणो, मेवाडी मान बचावण नै |
में पाछ नहीं राखी रण में, बैरया रो खून बहावण नै ||

जब याद करूं हल्दीघाटी, नैणा में रगत उतर आवै |
सुख दुख रो साथी चेतकडो, सूती सी हूक जगा जावै ||

पण आज बिलखतो देखूं हूं, जद राजकंवर नै रोटी नै |
तो क्षात्र धर्म नें भूलूं हूं, भूलूं हिन्वाणी चोटौ नै ||

आ सोच हुई दो टूक तडक, राणा री भीम बजर छाती |
आंख्यां में आंसू भर बोल्यो, हूं लिख्स्यूं अकबर नै पाती ||

राणा रो कागद बांच हुयो, अकबर रो सपणो सो सांचो |
पण नैण करया बिसवास नहीं,जद बांच बांच नै फिर बांच्यो ||

बस दूत इसारो पा भाज्यो, पीथल ने तुरत बुलावण नै |
किरणा रो पीथल आ पूग्यो, अकबर रो भरम मिटावण नै ||

म्हे बांध लिये है पीथल ! सुण पिजंरा में जंगली सेर पकड |
यो देख हाथ रो कागद है, तू देका फिरसी कियां अकड ||

हूं आज पातस्या धरती रो, मेवाडी पाग पगां में है |
अब बता मनै किण रजवट नै, रजुॡती खूण रगां में है ||

जद पीथल कागद ले देखी, राणा री सागी सैनांणी |
नीचै सूं धरती खिसक गयी, आंख्यों में भर आयो पाणी ||

पण फेर कही तत्काल संभल, आ बात सफा ही झूठी हैं |
राणा री पाग सदा उंची, राणा री आन अटूटी है ||

ज्यो हुकुम होय तो लिख पूछूं, राणा नै कागद रै खातर |
लै पूछ भला ही पीथल तू ! आ बात सही बोल्यो अकबर ||

म्हें आज सूणी है नाहरियो, स्याला रै सागै सोवैलो |
म्हें आज सूणी है सूरजडो, बादल री आंटा खोवैलो ||

पीथल रा आखर पढ़ता ही, राणा री आंख्या लाल हुई |
धिक्कार मनैं में कायर हूं, नाहर री एक दकाल हुई ||

हूं भूखं मरुं हूं प्यास मरूं, मेवाड धरा आजाद रहैं |
हूं घोर उजाडा में भटकूं, पण मन में मां री याद रह्वै ||

पीथल के खिमता बादल री, जो रोकै सूर उगाली नै |
सिहां री हाथल सह लैवे, वा कूंख मिली कद स्याली नै ||

जद राणा रो संदेस गयो, पीथल री छाती दूणी ही |
हिंदवाणो सूरज चमके हो, अकबर री दुनिया सुनी ही ||

Photo Source: http://www.flickr.com/photos/vighanesh/5856243526/

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हल्दीघाटीः झाला का बलिदान ‍| श्याम नारायण पान्डेय

July 30th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

झाला का बलिदान ये कविता रचि है वीर रस के अमर कवि श्याम नारायण पान्डेय ने | झाला जो कि राणा प्रताप की ही सेना का एक बहुत बहादुर सिपाही था | उसके अमर बलिदान की कहानी है यह |

झाला का बलिदान

झाला का बलिदान

झाला राणा प्रताप के साथ ही युद्ध मे शामिल था और वह भी बडा ही वीर योद्धा था, दिखने में भी थोडा वह राणा प्रताप के जैसा ही लगता था | झाला ने हल्दीघाटी में देखा की राजपूत सेना मुगल फोजों से कमजोर पड रही है और मुगल सेनिक राणा प्रताप पर आक्रमण‌ करने के लिये आतुर है |

तब झाला ने तुरंत निर्णय लिया कि राणा को अपनी जान बचाने के लिये किसी सुरक्षित स्थान पर जाना ही होगा | झाला ने तुरंत शाही निशान आदि लेने के लिये महाराणा से अनुमति मांगी और उनसे अर्ज किया की वे अपनी जान बचायें | राणा प्रताप चेतक पर सवार दूर निकल गये, और मुगल सेना झाला को राणा प्रताप समझ कर उस पर टूट पडी, इस तरह से झाला ने अपना बलिदान देते हुए भी अपने राजा महाराणा प्रताप की जान बचाई और अमर शहीद कहलाया |

हल्दीघाटीः झाला का बलिदान ‍| श्याम नारायण पान्डेय

रानव समाज में अरुण पडा |  अपनी तलवार दुधारी ले
जल जंतु बीच हो वरूण पडा |  भूखे नाहर सा टूट पडा
इस तरह भभकता था राणा |  कल कल मच गया अचानक दल
मानों सर्पों में गरूड पडा |        अश्विन के घन सा फूट पडा

हय रुण्ड कतर, गज मुण्ड पाछ |  राणा की जय, राणा की जय
अरि व्यूह गले पर फिरती थी |      वह आगे बढ़ता चला गया
तलवार वीर की तडप तडप |         राणा प्रताप की जय करता
क्षण क्षण बिजली सी गिरती थी |  राणा तक चढ़ता चला गया

राणा कर ने सर काट काट |         रख लिया छत्र अपने सर पर
दे दिये कपाल कपाली को |         राणा प्रताप मस्तक से ले
शोणित की मदिरा पिला पिला | के सवर्ण पताका जूझ पडा
कर दिया तुष्ट रण काली को |    रण भीम कला अतंक से ले

पर दिन भर लडने से तन में |    झाला को राणा जान मुगल
चल रहा पसीना था तर तर |      फिर टूट पडे थे झाला पर
अविरल शोणित सी धारा थी |    मिट गया वीर जैसे मिटता
राणा क्षत से बहती झर झर |     परवाना दीपक ज्वाला पर

घोडा भी उसका शिथिल बना |       झाला ने राणा रक्षा की
था उसको चैन ना घावों से |           रख दिया देश के पानी को
वह अधिक अधिक लडता यदृपि | छोडा राणा के साथ साथ
दुर्लभ था चलना पावों से |             अपनी भी अमर कहानी को

तब तक झाला ने देख लिया |      अरि विजय गर्व से फूल उठे
राणा प्रताप हैं संकट में |              इस तरह हो गया समर अंत
बोला ना बाल बांका होगा |           पर किसकी विजय रही बतला
जब तक है प्राण बचे घट में |       ए॓ सत्य सत्य अंबर अनंत ?

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भक्त शिरोमणि मीराबाई के प्रसिद्ध भजन

July 30th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

मीराबाई का जन्म सोलहवीं शताब्दी में हुआ और वे भगवान कृष्ण की बहुत बडी भक्त थीं | बचपन से ही मीरा का रुझान सिर्फ और सिर्फ प्रभु भक्ती में ही था | उनका विवाह मेवाड के महाराज राणा सांगा के दूसरे पुत्र भोजराज से हुआ था |

भक्त शिरोमणि मीराबाई

भक्त शिरोमणि मीराबाई

भोजराज कम उम्र में ही एक युद्ध के दौरान शहीद हुए, इस घटना से मीरा का जीवन एकदम अंधकार से भर गया औ‌र उन्होने भगवान कृष्ण की भक्ती में ही अपना सम्पूर्ण जीवन लगा दिया | मीराबाई की कृष्ण भक्ति बहुत प्रगाढ़ थी और उन्होनें अपने जीवन काल में लगभग एक हजार से भी ज्यादा कृष्ण भजनों की रचना की | वे सारे भजन व भक्ति गीत आज भी प्रासंगिक है | उनमें से ही एक बहुत प्रसिद्ध भजन है पायो जी मेनें, राम रतन धन पायो |

पायो जी मेनें, राम रतन धन पायोः

पायो जी मेनें, राम रतन धन पायो
वस्तु अमोलक की मेरे सद्गुरु
किरपा कर अपणायों
पायो जी मेनें, राम रतन धन पायो

जनम जनम की पु्ंजी पाई
जग में सबै खोबायो
खरचे नहीं, कोई चोर न लेवै
दिन दिन बढ़त सवायौ
पायो जी मेनें, राम रतन धन पायो

सत की नाव, खेवटिया सद्गुरु
भव सागर तरि आयौ
मीरा के प्रभु गिरधर नागर
हरिख हरिख जस गायौ
पायो जी मेनें, राम रतन धन पायो

हरी तुम हरो जन की भीरः

द्रोपदी की लाज राखी,
तुरत बढ़ायो चीर |
भक्त कारण रुप नरहरि,
धरयो आप सरीर |
हिरनकुश मारी लीन्हों,
धरयो नाहिन धीर |

हरी तुम हरो जन की भीर |

बूडतो जगरात राख्यों,
कियौ बाहर नीर |
दासी मीरा लाल गिरधर,
चरण कंवल पर सीर |

हरी तुम हरो जन की भीर |

Photo Source : http://www.flickr.com/photos/vnod/3511103536/

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हल्दीघाटीः युद्ध के लिये प्रयाण ‍- लेखक श्याम नारायण पान्डेय

July 28th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

haldighati darra

Haldighati Darra

लेखक व कवि श्याम नारायण पान्डेय ने एक और रचना लिखी थी जो भी राणा प्रताप के जीवन चरित्र पर आधारित थी, इस रचना का नाम है हल्दीघाटीः युद्ध के लिये प्रयाण |

शब्दों की जादूगरी यहां बहुत ही देखने लायक है, कोई कवि इस तरह की रचना आज शायद ही लिख पाये |

पान्डेय ने महाराणा प्रताप की कर्मभुमि हल्दीघाटी का इतना सजीव चित्रण किया की कोई भी पढ़ कर या सुन कर वाह वाह कर उठे | आज भी महाराणा प्रताप जयंति या चेतक के बलिदान दिवस पर ये अमर कविताएं बडे ही जोश के साथ सुनी व सुनाई जाती है |

हल्दीघाटीः युद्ध के लिये प्रयाण ‍| श्याम नारायण पान्डेयः

डग डग डग रण के डंके |                    भेरी प्रताप की बजी तुरत
मारू के साथ भयद बाजे |                  बज चले दमामे धमर धमर
टप टप टप घोडे कूद पडे |                   धम धम रण के बाजे बाजे
कट कट मतंग के रद बाजे |               बज चले नगारे धमर धमर

कल कल कर उठी मुगल सेना |         अपने पैने हथियार लिये
किलकार उठी, ललकार उठी |            पैनी पैनी तलवार लिये
असि म्यान विवर से निकल तुरत |  आये खर, कुन्त, कटार लिये
अहि नागिन सी फुफकार उठी |          जननि सेवा का भार लिये

फर फर फर फर फर फहर उठा |         कुछ घोडे पर कुछ हाथी पर
अकबर का अभिमानी निशान |         कुछ योद्धा पैदल ही आये
बढ़ चला कटक ले कर अपार |           कुछ ले बरछे, कुछ ले भाले
मद मस्त द्विद पर मस्त मान |       कुछ शर से तरकस भर लाये

कोलाहल पर कोलाहल सुन |             रण यात्रा करते ही बोले
शस्त्रों की सुन झंकार प्रबल |             राणा की जय, राणा की जय
मेवाड केसरी गरज उठा |                  मेवाड सिपाही बोल उठे
सुन कर अरि की ललकार प्रबल |     शत बार महाराणा की जय

हर एकलिंग को माथ नवा |               हल्दीघाटी के रण की जय
लोहा लेने चल पडा वीर |                   राणा प्रताप के प्रण की जय
चेतक का चंचल वेग देख |                जय जय भारत माता की जय
था महा महा लज्जित समीर |          मेवाड देश कण कण की जय

लड लड कर अखिल महितल को |     हाथी सवार हाथी पर थे
शोणित से भर देने वाली  |                 बाजी सवर बाजी पर थे
तलवार वीर की तडप उठी |                पर उनके शोणित मय मस्तक
अहि कंठ कतर देने वाली |                 अवनि पर मृत राजी पर थे

राणा का ओज भरा आनन |
सूरज समान चमचमा उठा |
बन महाकाल का महाकाल |
भीषण भाला दम दमा उठा |

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