Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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हल्दीघाटीः झाला का बलिदान ‍| श्याम नारायण पान्डेय

July 30th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

झाला का बलिदान ये कविता रचि है वीर रस के अमर कवि श्याम नारायण पान्डेय ने | झाला जो कि राणा प्रताप की ही सेना का एक बहुत बहादुर सिपाही था | उसके अमर बलिदान की कहानी है यह |

झाला का बलिदान

झाला का बलिदान

झाला राणा प्रताप के साथ ही युद्ध मे शामिल था और वह भी बडा ही वीर योद्धा था, दिखने में भी थोडा वह राणा प्रताप के जैसा ही लगता था | झाला ने हल्दीघाटी में देखा की राजपूत सेना मुगल फोजों से कमजोर पड रही है और मुगल सेनिक राणा प्रताप पर आक्रमण‌ करने के लिये आतुर है |

तब झाला ने तुरंत निर्णय लिया कि राणा को अपनी जान बचाने के लिये किसी सुरक्षित स्थान पर जाना ही होगा | झाला ने तुरंत शाही निशान आदि लेने के लिये महाराणा से अनुमति मांगी और उनसे अर्ज किया की वे अपनी जान बचायें | राणा प्रताप चेतक पर सवार दूर निकल गये, और मुगल सेना झाला को राणा प्रताप समझ कर उस पर टूट पडी, इस तरह से झाला ने अपना बलिदान देते हुए भी अपने राजा महाराणा प्रताप की जान बचाई और अमर शहीद कहलाया |

हल्दीघाटीः झाला का बलिदान ‍| श्याम नारायण पान्डेय

रानव समाज में अरुण पडा |  अपनी तलवार दुधारी ले
जल जंतु बीच हो वरूण पडा |  भूखे नाहर सा टूट पडा
इस तरह भभकता था राणा |  कल कल मच गया अचानक दल
मानों सर्पों में गरूड पडा |        अश्विन के घन सा फूट पडा

हय रुण्ड कतर, गज मुण्ड पाछ |  राणा की जय, राणा की जय
अरि व्यूह गले पर फिरती थी |      वह आगे बढ़ता चला गया
तलवार वीर की तडप तडप |         राणा प्रताप की जय करता
क्षण क्षण बिजली सी गिरती थी |  राणा तक चढ़ता चला गया

राणा कर ने सर काट काट |         रख लिया छत्र अपने सर पर
दे दिये कपाल कपाली को |         राणा प्रताप मस्तक से ले
शोणित की मदिरा पिला पिला | के सवर्ण पताका जूझ पडा
कर दिया तुष्ट रण काली को |    रण भीम कला अतंक से ले

पर दिन भर लडने से तन में |    झाला को राणा जान मुगल
चल रहा पसीना था तर तर |      फिर टूट पडे थे झाला पर
अविरल शोणित सी धारा थी |    मिट गया वीर जैसे मिटता
राणा क्षत से बहती झर झर |     परवाना दीपक ज्वाला पर

घोडा भी उसका शिथिल बना |       झाला ने राणा रक्षा की
था उसको चैन ना घावों से |           रख दिया देश के पानी को
वह अधिक अधिक लडता यदृपि | छोडा राणा के साथ साथ
दुर्लभ था चलना पावों से |             अपनी भी अमर कहानी को

तब तक झाला ने देख लिया |      अरि विजय गर्व से फूल उठे
राणा प्रताप हैं संकट में |              इस तरह हो गया समर अंत
बोला ना बाल बांका होगा |           पर किसकी विजय रही बतला
जब तक है प्राण बचे घट में |       ए॓ सत्य सत्य अंबर अनंत ?

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भक्त शिरोमणि मीराबाई के प्रसिद्ध भजन

July 30th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

मीराबाई का जन्म सोलहवीं शताब्दी में हुआ और वे भगवान कृष्ण की बहुत बडी भक्त थीं | बचपन से ही मीरा का रुझान सिर्फ और सिर्फ प्रभु भक्ती में ही था | उनका विवाह मेवाड के महाराज राणा सांगा के दूसरे पुत्र भोजराज से हुआ था |

भक्त शिरोमणि मीराबाई

भक्त शिरोमणि मीराबाई

भोजराज कम उम्र में ही एक युद्ध के दौरान शहीद हुए, इस घटना से मीरा का जीवन एकदम अंधकार से भर गया औ‌र उन्होने भगवान कृष्ण की भक्ती में ही अपना सम्पूर्ण जीवन लगा दिया | मीराबाई की कृष्ण भक्ति बहुत प्रगाढ़ थी और उन्होनें अपने जीवन काल में लगभग एक हजार से भी ज्यादा कृष्ण भजनों की रचना की | वे सारे भजन व भक्ति गीत आज भी प्रासंगिक है | उनमें से ही एक बहुत प्रसिद्ध भजन है पायो जी मेनें, राम रतन धन पायो |

पायो जी मेनें, राम रतन धन पायोः

पायो जी मेनें, राम रतन धन पायो
वस्तु अमोलक की मेरे सद्गुरु
किरपा कर अपणायों
पायो जी मेनें, राम रतन धन पायो

जनम जनम की पु्ंजी पाई
जग में सबै खोबायो
खरचे नहीं, कोई चोर न लेवै
दिन दिन बढ़त सवायौ
पायो जी मेनें, राम रतन धन पायो

सत की नाव, खेवटिया सद्गुरु
भव सागर तरि आयौ
मीरा के प्रभु गिरधर नागर
हरिख हरिख जस गायौ
पायो जी मेनें, राम रतन धन पायो

हरी तुम हरो जन की भीरः

द्रोपदी की लाज राखी,
तुरत बढ़ायो चीर |
भक्त कारण रुप नरहरि,
धरयो आप सरीर |
हिरनकुश मारी लीन्हों,
धरयो नाहिन धीर |

हरी तुम हरो जन की भीर |

बूडतो जगरात राख्यों,
कियौ बाहर नीर |
दासी मीरा लाल गिरधर,
चरण कंवल पर सीर |

हरी तुम हरो जन की भीर |

Photo Source : http://www.flickr.com/photos/vnod/3511103536/

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हल्दीघाटीः युद्ध के लिये प्रयाण ‍- लेखक श्याम नारायण पान्डेय

July 28th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

haldighati darra

Haldighati Darra

लेखक व कवि श्याम नारायण पान्डेय ने एक और रचना लिखी थी जो भी राणा प्रताप के जीवन चरित्र पर आधारित थी, इस रचना का नाम है हल्दीघाटीः युद्ध के लिये प्रयाण |

शब्दों की जादूगरी यहां बहुत ही देखने लायक है, कोई कवि इस तरह की रचना आज शायद ही लिख पाये |

पान्डेय ने महाराणा प्रताप की कर्मभुमि हल्दीघाटी का इतना सजीव चित्रण किया की कोई भी पढ़ कर या सुन कर वाह वाह कर उठे | आज भी महाराणा प्रताप जयंति या चेतक के बलिदान दिवस पर ये अमर कविताएं बडे ही जोश के साथ सुनी व सुनाई जाती है |

हल्दीघाटीः युद्ध के लिये प्रयाण ‍| श्याम नारायण पान्डेयः

डग डग डग रण के डंके |                    भेरी प्रताप की बजी तुरत
मारू के साथ भयद बाजे |                  बज चले दमामे धमर धमर
टप टप टप घोडे कूद पडे |                   धम धम रण के बाजे बाजे
कट कट मतंग के रद बाजे |               बज चले नगारे धमर धमर

कल कल कर उठी मुगल सेना |         अपने पैने हथियार लिये
किलकार उठी, ललकार उठी |            पैनी पैनी तलवार लिये
असि म्यान विवर से निकल तुरत |  आये खर, कुन्त, कटार लिये
अहि नागिन सी फुफकार उठी |          जननि सेवा का भार लिये

फर फर फर फर फर फहर उठा |         कुछ घोडे पर कुछ हाथी पर
अकबर का अभिमानी निशान |         कुछ योद्धा पैदल ही आये
बढ़ चला कटक ले कर अपार |           कुछ ले बरछे, कुछ ले भाले
मद मस्त द्विद पर मस्त मान |       कुछ शर से तरकस भर लाये

कोलाहल पर कोलाहल सुन |             रण यात्रा करते ही बोले
शस्त्रों की सुन झंकार प्रबल |             राणा की जय, राणा की जय
मेवाड केसरी गरज उठा |                  मेवाड सिपाही बोल उठे
सुन कर अरि की ललकार प्रबल |     शत बार महाराणा की जय

हर एकलिंग को माथ नवा |               हल्दीघाटी के रण की जय
लोहा लेने चल पडा वीर |                   राणा प्रताप के प्रण की जय
चेतक का चंचल वेग देख |                जय जय भारत माता की जय
था महा महा लज्जित समीर |          मेवाड देश कण कण की जय

लड लड कर अखिल महितल को |     हाथी सवार हाथी पर थे
शोणित से भर देने वाली  |                 बाजी सवर बाजी पर थे
तलवार वीर की तडप उठी |                पर उनके शोणित मय मस्तक
अहि कंठ कतर देने वाली |                 अवनि पर मृत राजी पर थे

राणा का ओज भरा आनन |
सूरज समान चमचमा उठा |
बन महाकाल का महाकाल |
भीषण भाला दम दमा उठा |

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राणा प्रताप की तलवार – श्याम नारायण पाण्डेय

July 28th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

maharana pratap of mewar

Maharana Pratap of Mewar Rajasthan

हल्दीघाटी का युद्ध अब एक इतिहास बन चुका है पर इसे हमेशा ही याद किया जाता रहा है और भविष्य में भी लोग इस आजादी की प्रथम लडाई के रुप में याद करते रहेंगे |

अकबर की पुरे भारत पर विजय की सोच वाली महत्वाकांक्षा और महाराणा प्रताप का कभी ना झुकने वाला स्वाभिमान, दोनों में टकराव होना अवश्यम्भावी था ही |

परिणाम स्वरूप मुगल फोजों और राणा प्रताप की भील, राजपूत सेना के बीच हल्दीघाटी का युद्ध लडा गया |

यूं तो महाराणा प्रताप के शौर्य की गाथायें तो अनेक है,

पर जो कुछ हिन्दी के वीर रस के कवि श्याम नारायण पाण्डेय ने लिखा है वह एकदम अलग और सटीक का प्रतीत होता है |

आप पढ़ेंगे और वाकई में जानेंगे की वे कितना जोरदार लिखते थे, कुछ ए॓सा की सुनने या पढ़ने मात्र से ही रोंगटे खडे हो जाये, भुजायें फडकने लगें | युद्ध का ए॓सा विवरण की बस पूछो मत | तो पढ़ते हैं महान कवि श्याम नारायण पाण्डेय की अनमोल रचना “ राणा प्रताप की तलवार ” कोः

राणा प्रताप की तलवार – श्याम नारायण पाण्डेय

चढ़ चेतक पर तलवार उठा,
रखता था भूतल पानी को।
राणा प्रताप सिर काट काट,
करता था सफल जवानी को॥

कलकल बहती थी रणगंगा,
अरिदल को डूब नहाने को।
तलवार वीर की नाव बनी,
चटपट उस पार लगाने को॥

वैरी दल को ललकार गिरी,
वह नागिन सी फुफकार गिरी।
था शोर मौत से बचो बचो,
तलवार गिरी तलवार गिरी॥

पैदल, हयदल, गजदल में,
छप छप करती वह निकल गई।
क्षण कहाँ गई कुछ पता न फिर,
देखो चम-चम वह निकल गई॥

क्षण इधर गई क्षण उधर गई,
क्षण चढ़ी बाढ़ सी उतर गई।
था प्रलय चमकती जिधर गई,
क्षण शोर हो गया किधर गई॥

लहराती थी सिर काट काट,
बलखाती थी भू पाट पाट।
बिखराती अवयव बाट बाट,
तनती थी लोहू चाट चाट॥

क्षण भीषण हलचल मचा मचा,
राणा कर की तलवार बढ़ी।
था शोर रक्त पीने को यह,
रण-चंडी जीभ पसार बढ़ी॥

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रकमगढ़ का छापर (राजसमन्द)

June 22nd, 2011 · प्रमुख दर्शनीय स्थल, राजसमन्द जिला, स्वतन्त्रता सेनानी

रकमगढ़ का किला अपने ए॓तिहासिक महत्व के लिये जाना जाता है पर आज यह अपनी पहचान लगभग खों चुका है | खंडहर मे तब्दील होता ये किला कांकरोली और नाथद्दारा से ज्यादा दूर नहीं हैं, पर प्रशासन की अनदेखी की वजह से अपने वजूद को कायम रखने के लिेये संघर्ष कर रहा है |

भारत में 1857 की क्रांति के दौरान यह रकमगढ़ का किला तांत्या तोपे व उनके सहयोगियों की शरण स्थली रहा था | उस समय कोठारिया के तत्कालीन राव श्री जोधसिहंजी नें तांत्या तोपे व उनके साथियों का पूरा साथ दिया और उन्हें पूरा रकमगढ़ का छापर सौंप दिया, साथ ही रसद, हथियार, गोला बारूद और सैन्य मदद आदि भी प्रदान की | तांत्या तोपे बहुत वीर योद्धा थे और उन्हे किसी के आगे झुकना स्वीकार ना था खास तौर से अंग्रेजो से तो उन्हे नफरत सी थी |

वे अंग्रेजो की कूटनितियों को जानते थे और जोश से भरे हुए थे | कहते हैं कि जब अंग्रेज बटालियन्स ने रकमगढ़ के छापर को घेर लिया और चारों तरफ से उन पर आक्रमण कर दिया तब तांत्या तोपे व उनके सहयोगियों नें अंग्रेजो से कडा मुकाबला लिया |

उन्होनें अंग्रेजो कें दांत खट्टे कर दिये | यह युद्ध राजसमन्द में स्वाधीनता के संघर्ष का साक्षी बना और आज तक भी लोग इसे याद करते हैं यह एक तरह का गोरों और कालों का युद्ध था | साथ ही यह भी कहा जाता है कि उस समय स्वाधीनता के संघर्ष में मोही, कोठारिया, केलवा आदि राजपूत ठिकानों नें भी क्रांतिकारीयों को यथासंभव मदद की थी, और बाद में यही हर जगह से छोटा मोटा संघर्ष भारत को अंततः आजादी दिलाने में कामयाब भी रहा |

इस हिसाब से राजसमन्द का रकमगढ़ का छापर भी अपना एक विशेष महत्व रखता है और वाजिब संरक्षण इस जगह को मिलना चाहिये साथ ही, हमारे गौरवशाली इतिहास बताने वाले स्थलों को चिन्हित करके उनके विकास पर ध्यान देना बहुत ही जरुरी है |

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