Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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हल्दीघाटीः युद्ध के लिये प्रयाण ‍- लेखक श्याम नारायण पान्डेय

July 28th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

haldighati darra

Haldighati Darra

लेखक व कवि श्याम नारायण पान्डेय ने एक और रचना लिखी थी जो भी राणा प्रताप के जीवन चरित्र पर आधारित थी, इस रचना का नाम है हल्दीघाटीः युद्ध के लिये प्रयाण |

शब्दों की जादूगरी यहां बहुत ही देखने लायक है, कोई कवि इस तरह की रचना आज शायद ही लिख पाये |

पान्डेय ने महाराणा प्रताप की कर्मभुमि हल्दीघाटी का इतना सजीव चित्रण किया की कोई भी पढ़ कर या सुन कर वाह वाह कर उठे | आज भी महाराणा प्रताप जयंति या चेतक के बलिदान दिवस पर ये अमर कविताएं बडे ही जोश के साथ सुनी व सुनाई जाती है |

हल्दीघाटीः युद्ध के लिये प्रयाण ‍| श्याम नारायण पान्डेयः

डग डग डग रण के डंके |                    भेरी प्रताप की बजी तुरत
मारू के साथ भयद बाजे |                  बज चले दमामे धमर धमर
टप टप टप घोडे कूद पडे |                   धम धम रण के बाजे बाजे
कट कट मतंग के रद बाजे |               बज चले नगारे धमर धमर

कल कल कर उठी मुगल सेना |         अपने पैने हथियार लिये
किलकार उठी, ललकार उठी |            पैनी पैनी तलवार लिये
असि म्यान विवर से निकल तुरत |  आये खर, कुन्त, कटार लिये
अहि नागिन सी फुफकार उठी |          जननि सेवा का भार लिये

फर फर फर फर फर फहर उठा |         कुछ घोडे पर कुछ हाथी पर
अकबर का अभिमानी निशान |         कुछ योद्धा पैदल ही आये
बढ़ चला कटक ले कर अपार |           कुछ ले बरछे, कुछ ले भाले
मद मस्त द्विद पर मस्त मान |       कुछ शर से तरकस भर लाये

कोलाहल पर कोलाहल सुन |             रण यात्रा करते ही बोले
शस्त्रों की सुन झंकार प्रबल |             राणा की जय, राणा की जय
मेवाड केसरी गरज उठा |                  मेवाड सिपाही बोल उठे
सुन कर अरि की ललकार प्रबल |     शत बार महाराणा की जय

हर एकलिंग को माथ नवा |               हल्दीघाटी के रण की जय
लोहा लेने चल पडा वीर |                   राणा प्रताप के प्रण की जय
चेतक का चंचल वेग देख |                जय जय भारत माता की जय
था महा महा लज्जित समीर |          मेवाड देश कण कण की जय

लड लड कर अखिल महितल को |     हाथी सवार हाथी पर थे
शोणित से भर देने वाली  |                 बाजी सवर बाजी पर थे
तलवार वीर की तडप उठी |                पर उनके शोणित मय मस्तक
अहि कंठ कतर देने वाली |                 अवनि पर मृत राजी पर थे

राणा का ओज भरा आनन |
सूरज समान चमचमा उठा |
बन महाकाल का महाकाल |
भीषण भाला दम दमा उठा |

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राणा प्रताप की तलवार – श्याम नारायण पाण्डेय

July 28th, 2011 · इतिहास के पन्नो से

maharana pratap of mewar

Maharana Pratap of Mewar Rajasthan

हल्दीघाटी का युद्ध अब एक इतिहास बन चुका है पर इसे हमेशा ही याद किया जाता रहा है और भविष्य में भी लोग इस आजादी की प्रथम लडाई के रुप में याद करते रहेंगे |

अकबर की पुरे भारत पर विजय की सोच वाली महत्वाकांक्षा और महाराणा प्रताप का कभी ना झुकने वाला स्वाभिमान, दोनों में टकराव होना अवश्यम्भावी था ही |

परिणाम स्वरूप मुगल फोजों और राणा प्रताप की भील, राजपूत सेना के बीच हल्दीघाटी का युद्ध लडा गया |

यूं तो महाराणा प्रताप के शौर्य की गाथायें तो अनेक है,

पर जो कुछ हिन्दी के वीर रस के कवि श्याम नारायण पाण्डेय ने लिखा है वह एकदम अलग और सटीक का प्रतीत होता है |

आप पढ़ेंगे और वाकई में जानेंगे की वे कितना जोरदार लिखते थे, कुछ ए॓सा की सुनने या पढ़ने मात्र से ही रोंगटे खडे हो जाये, भुजायें फडकने लगें | युद्ध का ए॓सा विवरण की बस पूछो मत | तो पढ़ते हैं महान कवि श्याम नारायण पाण्डेय की अनमोल रचना “ राणा प्रताप की तलवार ” कोः

राणा प्रताप की तलवार – श्याम नारायण पाण्डेय

चढ़ चेतक पर तलवार उठा,
रखता था भूतल पानी को।
राणा प्रताप सिर काट काट,
करता था सफल जवानी को॥

कलकल बहती थी रणगंगा,
अरिदल को डूब नहाने को।
तलवार वीर की नाव बनी,
चटपट उस पार लगाने को॥

वैरी दल को ललकार गिरी,
वह नागिन सी फुफकार गिरी।
था शोर मौत से बचो बचो,
तलवार गिरी तलवार गिरी॥

पैदल, हयदल, गजदल में,
छप छप करती वह निकल गई।
क्षण कहाँ गई कुछ पता न फिर,
देखो चम-चम वह निकल गई॥

क्षण इधर गई क्षण उधर गई,
क्षण चढ़ी बाढ़ सी उतर गई।
था प्रलय चमकती जिधर गई,
क्षण शोर हो गया किधर गई॥

लहराती थी सिर काट काट,
बलखाती थी भू पाट पाट।
बिखराती अवयव बाट बाट,
तनती थी लोहू चाट चाट॥

क्षण भीषण हलचल मचा मचा,
राणा कर की तलवार बढ़ी।
था शोर रक्त पीने को यह,
रण-चंडी जीभ पसार बढ़ी॥

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रकमगढ़ का छापर (राजसमन्द)

June 22nd, 2011 · प्रमुख दर्शनीय स्थल, राजसमन्द जिला, स्वतन्त्रता सेनानी

रकमगढ़ का किला अपने ए॓तिहासिक महत्व के लिये जाना जाता है पर आज यह अपनी पहचान लगभग खों चुका है | खंडहर मे तब्दील होता ये किला कांकरोली और नाथद्दारा से ज्यादा दूर नहीं हैं, पर प्रशासन की अनदेखी की वजह से अपने वजूद को कायम रखने के लिेये संघर्ष कर रहा है |

भारत में 1857 की क्रांति के दौरान यह रकमगढ़ का किला तांत्या तोपे व उनके सहयोगियों की शरण स्थली रहा था | उस समय कोठारिया के तत्कालीन राव श्री जोधसिहंजी नें तांत्या तोपे व उनके साथियों का पूरा साथ दिया और उन्हें पूरा रकमगढ़ का छापर सौंप दिया, साथ ही रसद, हथियार, गोला बारूद और सैन्य मदद आदि भी प्रदान की | तांत्या तोपे बहुत वीर योद्धा थे और उन्हे किसी के आगे झुकना स्वीकार ना था खास तौर से अंग्रेजो से तो उन्हे नफरत सी थी |

वे अंग्रेजो की कूटनितियों को जानते थे और जोश से भरे हुए थे | कहते हैं कि जब अंग्रेज बटालियन्स ने रकमगढ़ के छापर को घेर लिया और चारों तरफ से उन पर आक्रमण कर दिया तब तांत्या तोपे व उनके सहयोगियों नें अंग्रेजो से कडा मुकाबला लिया |

उन्होनें अंग्रेजो कें दांत खट्टे कर दिये | यह युद्ध राजसमन्द में स्वाधीनता के संघर्ष का साक्षी बना और आज तक भी लोग इसे याद करते हैं यह एक तरह का गोरों और कालों का युद्ध था | साथ ही यह भी कहा जाता है कि उस समय स्वाधीनता के संघर्ष में मोही, कोठारिया, केलवा आदि राजपूत ठिकानों नें भी क्रांतिकारीयों को यथासंभव मदद की थी, और बाद में यही हर जगह से छोटा मोटा संघर्ष भारत को अंततः आजादी दिलाने में कामयाब भी रहा |

इस हिसाब से राजसमन्द का रकमगढ़ का छापर भी अपना एक विशेष महत्व रखता है और वाजिब संरक्षण इस जगह को मिलना चाहिये साथ ही, हमारे गौरवशाली इतिहास बताने वाले स्थलों को चिन्हित करके उनके विकास पर ध्यान देना बहुत ही जरुरी है |

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दुखः का कारण क्या है ?

June 15th, 2011 · उलझन

दुखः का कारण जहां तक मेरी नजर में है वो है चाह, अभिलाषा, तृष्णा या फिर सरल शब्दों में कहें तो हमारी इच्छा | संसार सागर के समान बडा है और अनवरत जीवन हमारा चलता ही जाता है, रुकने का नाम नहीं, कभी सोचता हूं बहुत से जानवर और अन्य प्राणी सुखी हैं, क्योंकि उन्हे लम्बी उम्र नहीं मिलती ! छोटी या कम उम्र में ही उन्हें जीवन के सारे रंगों को देखने का मौका मिल जाता हैं |

कोई विरले लोग ही इन बातों से दूर रह पाते हैं, और हम तो आम इंसान हैं कोई साधू महात्मा नहीं | हम अपने आस पास देखें तो ये भी संभव नहीं है कि अपनी इच्छाऔं का दमन कर पायें ! इच्छाएं और ज्यादा बलवान हुई जाती हैं, क्योंकि पडौसी के पास वो है जो मेरे पास नहीं और यही हमारे दुख का कारण भी बनता है |

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दूसरा यह कि हम कभी कभी अपने हिसाब से जमाने को चलाना चाहते हैं, और वैसा किसी भी हालत में संभव नहीं हैं, चंद पैसे देकर हम किसी को नौकर रख सकते हैं पर उसको मानसिक तौर पर गुलाम नहीं बनाया जा सकता है | दुनिया में हर किसी के विचार अलग हैं ‌और अपने आस पास के लोगों पर हम अपनी कोई बात या विचार थोपना चाहते हैं क्योकि हम उनसे उम्र या अनुभव में बडे हैं पर यह काफी नहीं, हर नया बच्चा नई सोच लेकर पैदा होता हैं | अपने विचार या इच्छाऔं को हम दूसरों पर थोपना चाहते हैं बडा बनना चाहते हैं, चाहते है कि लोग हमें मानें और यह भी बहुत बडा कारण बनता है दुख का |

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आम लोगो का अंधविश्वास और उस कारण निरिह जानवरो से क्रूर बर्ताव

June 8th, 2011 · उलझन

पता नहीं क्यों लोगबाग अपनेआप को विभीन्न प्रकार के अंधविश्वासों मे झकड लेते हैं | में अपने आस पास के लोगों को देखता हूं और सोचता हुं कि वे इतना अंधविश्वास क्यों कर रहे हैं | खैर………तो कुछ विचार आजकल जानवरों पर हो रहे ना ना प्रकार के जुल्मों के बारे में प्रेषित है !

बडे शहर और अंधविश्वासः
जयपुर सीटी पैलेस से कुछ दूर सामने हमने फुटपाथ के किनारे बैठा एक आदमी नजर आया, उसके पास एक काले रंग का मरियल सा घोडा बंधा हुआ था | वह अपने पास एक काली रंग की सी तख्ती लिये बैठा था और तख्ती पर लिखा थाः काले घोडे की नाल यहां मिलती है | बहुत से लोग होगें जो ये सुन चुके होंगे कि घर के दरवाजे की चौखट पर यदि काले घोडे की नाल लगवा दो तो बुरी नजरों से बचा जा सकता है | वह आदमी हाथोंहाथ अपने घोडे के पैर में से ठुकी हुई नाल निकाल कर अपने सम्माननिय कस्टमर्स को दे रहा था |

कस्टमर को भी शुभ फल मिलने का विश्वास और गारंटी थी, क्योकि घोडे के पैर से हाथों हाथ निकलवा कर जो लाया था | मुझे यह बडा अजीब लगा पर वहां से लोग वह खरीद रहे थे और कुछ देर बाद वह आदमी फिर से अपने घोडे को परेशान करने में लग जाता है दिन भर में वह ना जाने कितने बार अपने घोडे को कष्ट देता होगा | अब इतने बडे शहर में भी अंधविश्वाश के कारण कई लोग मुर्ख बनाये जा रहे थे | फुटपाथों से लोग जाने कैसी कैसी सस्ती दवाईयां, चुर्ण, भस्म ना जाने क्या क्या लेते हैं वह भी सिर्फ सुनी सुनाई बातों या अपने अति अंधविश्वास के कारण |

कस्बों व गांवो की हालतः
यही हाल भालूओं और बंदर वाले मदारियों का है, वे अपने हित के लिये निरीह जानवरों को ना जाने कैसे कैसे नाच नचाते हैं | बहेलिये व सपेरे तो अभी भी छोटे गांव कस्बों मे यदा कदा दिखा जाते हैं | अब सपेरे भी तो सांप नेवले का खेल दिखाते ही थे, अब उस लडाई में कब कौंनसा जानवर घायल हो जाये | पर परेशानी रोजगार की समस्या से भी है, ये लोग यह काम धंधा छोड देंगे तो कुछ और करना भी तो नहीं जानते ना ! सरकार को चाहिये कि हर शहर गावों में इस तरह के लोगों को चिन्हित करके उनके पुनर्वास और रोजगार, शिक्षण आदि की उचित व्यवस्था करे |

सर्कस आदिः
पुराने सिनेमाघरों की तरह ही आजकल सर्कस की हालते भी खराब है, और बडी ही दयनीय है | उन्हे अब जानवर मिलते नहीं, क्योंकि नियम कडे है और दर्शक सर्कस में ये सब ही तो देखने के लिये आते हैं, आदमी के स्टंट और लडकियों के नृत्य तो टी वी में रोजाना देखे जा सकते हैं | तो इसलिये ही सर्कस की स्थितियां नाजुक ही कही जा सकती है | पहले की बात अलग थी, पर अब सर्कस में जानवरों पर जुल्म ना के बराबर होते हैं |

गांवों कस्बों में फिजुल की सवारियां आदिः
सवारियां बडी होनी चाहिये व ठाठ बाट से निकलनी चाहिये आदि भी एक तरह का अंधविश्वास ही है ! गांवों कस्बों में अभी भी छोटी मोटी बात पर फिजुल में सवारियां निकालने और भोज आदि का बडा रिवाज रहता हैं इससे भी जानवरों को खासकर की बग्गी में जुते घोडे, उंट, हाथी आदि को बडे ही कष्ट उठाने ही पडते हैं | सिर्फ किसी ग्रुप विशेष की प्रतिष्ठा या दिखावे के कारण ये आयोजनों में जानवरों का ज्यादा इस्तेमाल करना उचित नही | एक एक रुपये को हाथी जैसा बडा जानवर अपनी सू्ंड से ले कर उपर बैठे पेसे के भूखे खलबुद्धि महावत को बारम्बार दे, ये कहां की इंसानियत है |

पहले की एक्शन फिल्मों के दृश्यः
पहले कि फिल्मों के दृश्य देखें तो पता चलेगा कि दौडते हुये डाकुओं के घोडे गिर रहे हैं और कहीं कही तो पशुबली आदि के दृश्य भी दिख जाते थे | फिल्मों और एडवर्टाइजमेंट्स के लिये तो यह बहुत अच्छा कदम उठाया गया है कि किसी भी फिल्म आदि की शूटिंग के दौरान जानवरों पर क्रूर बर्ताव ना हो, अगर ये होगा तो कठोर नियमों के कारण फिल्म रोक दी जायेगी | यह सुनकर बहुत अच्छा लगा | चलो कुछ तो अच्छी सोच आयी है,मिडिया में |

उल्लूओं का शिकारः
अंधविश्वास और टोने टोटके के आदि के कारण सांप, उल्लूओं आदि को भी बहुतायत में पकडा जाता है ना जाने लोग कैसी सिद्धियां प्राप्त करना चाहते हैं आज के जमाने में ये सिद्धियां प्राप्त करने की बाते बेतुकी सी लगती है | छोटी जगहों पर अभी भी होली के दौरान एहडा खेलने की प्रथा होती है जिसमें सामुहिक शिकार आदि किये जाते हैं ! इसे रोकना भी बडी चुनौती है |

हरियाली और प्रकृति का हा्सः
कंक्रीट के जंगल बडे होते ही जा रहे हैं और इस कारण भी जानवर मारे जा रहे हैं ! अभी कुछ समय पहले ही पढ़ा कि किसी बडे सरकारी सचिवालय कार्यालय के सामने लगे कई सारे पुराने दरख्त सिर्फ सुरक्षा कारणो से काट दिये गये, उन पेडों पर रहने वाले पक्षीयों आदि का क्या हुआ होगा, कल्पना कर जरा | सोचो किसी कारण से ही सही पर मु्सीपालिटी की जेसीबी का पंजा आपके घरों पर चल जाये तो मिनटों में बडी मुश्किल से बनाये गये आशियाने का क्या से क्या हो सकता है |

कुल मिला कर आजकल वैसे भी तो जानवरों की कई प्रजातियां खत्म होने के कगार पर है पर फिर भी हम लोग इन प्राणियों का महत्व नहीं समझ रहे हैं ये गलत है… क्यों हम ये भुल जाते हैं कि इंसान भी पहले एक जानवर ही था |

जानवरों की मदद कर रही संस्थाये जैसे की पेटा, आईडीए इंडिया आदि को बडी मदद मिलनी चाहिये ताकि सही पैसा सही हाथों में जाये और काम आये | साथ ही भारत की एक ए॓सी हेल्पलाईन या आल इंडिया टोल फ्री नंबर भी हो जहां कोई भी जानवरों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ शिकायत लिखवा सके या बीमार जानवरों की मदद हेतु दरखास्त दे सके |

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