Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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उम्मीद

April 9th, 2010 · आपबीती

एक बार मेरे एक हमउम्र मित्र मेरे कार्यस्थल पर आये ! हम अक्सर मिलते थे, बातें करते थे, और पुराने दोस्त थे । मुझसे उन्होने एक सामान का रेट पूछा, वो चीज उनको चाहिये थी । मित्र होने के नाते, मेनें उनको एक दम वाजिब से वाजिब भाव बताया उस वस्तु का ! मित्र ने कहाः में यह ले तो जाता हुं, पर पैसे अभी नहीं है बाद में दुंगा । मेनें कहा भाई नहीं चल सकता है एसा, कम मार्जिन और उधारी ! अव्वल तो हम उधारी में सामान ना तो खरीदते हैं ना ही बेचते हैं ! फिर भी व्यवसाय है तो छोटा मोटा देखना ही पडता है । और उधारी का काम ए॓सा है ना कि दे ओर फिर देख ।

अपन आदमी हैं साफ कहने और सुखी रहने वाले टाईप के ! मुझे पता था कि ये अगर ले गया तो पैसे वापस आने में महीनों लग सकते हैं, मेनें मित्र को साफ मना कर दिया कि नहीं पैसे बाकी रखो तो में नहीं दे सकता हूं । दोस्त नाराज … उनके चेहरे से ही पता चल गया था मुझे ! अगले ही पल मित्र नें चेहरे की झेंप को मिटाते हुए कहाः अरे क्या यार में तो परीक्षा ले रहा था कि दोस्त कुछ पेसे बाकी रख सकता है भी कि नहीं ।

वाह ……………वाह ……….. ! क्या बात है, उस टाईप के शख्स से और आशा भी क्या कि जा सकती थी । में जानता था कि खिसियानी बिल्ली खंभे को नोच रही है । में चुप रह गया फिर भी ! आखिर क्यों लोग मुझसे उम्मीदें लगा बैठते हैं .. जो कि में पुरी नहीं कर सकता ।

आज तक जीवन में मेनें भी काफी उतार चढ़ाव देखे हैं और जब में आज तक किसी से उधार मांगने नहीं गया तो में किसी को क्यूं एसा करुं । कभी परिस्थिती वश ए॓सा कुछ गिनती की बार हुआ भी है, तो भी पन्द्रह मिनट या आधे घंटे में पैसे वापस लौटाने जाने पर मुझे लोगों ने यही कहा क्या पैसे कहीं भाग कर जा रहे थे क्या ! पर नहीं लोग कैसे भी हों कुछ भी करे पर में अपने हिस्से की ईमानदारी रखता हूं। पता नही लोग रुपये पैसे के मामले में इतने कमीनेपन पर कैसे उतर जाते है ।

अनजान

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पागल की कहानी

April 2nd, 2010 · लघु कहानियां

आज मेनें एक पागल को देखा ! जो फटे पुराने से गंदे चीथडे से होते जा रहे कपडों में लिपटा था ! लिबास से ही उसको पहचाना जा सकता था कि या तो वह पागल है या भिखारी ! बहुत गंदा सा शायद काफी दिनों से नहाया नहीं था । दाढ़ी बढ़ी हुई और बाल अजीब से बिखरे हुए से थे ! बेचारा अपने रस्ते पे जा रहा था ।

पर दुनिया बडी जालिम है, चैन से किसी को को जीने नहीं देती । अचानक एक बच्चे को वह पागल नजर आ गया और उसने उसको ना जाने कौनसे उटपटांग इशारे या संकेत दिये कि भिखारी चिढ़ने लगा ! अब बच्चे को पागल भिखारी की कमजोर नस पकड में आ गई, ए॓से ही छोडता थोडी । उसने पागल को और भी ज्यादा से ज्यादा परेशान किया ! और थोडी ही देर में उसी बच्चे के हम उम्र आवारा से दोस्त भी आ गए ! पागल व्यक्ती की तो शामत आ गई थी जैसे ।

देखते ही देखते सभ्य लोगो से भरे बाजार में आवारा टाईप के बच्चो की भीड आ गई, बच्चो मे से कोई पागल के कपडे खींचने लगा तो कोई उसे चिढ़ाने लगा । पागल कमजोर भी था और पागल तो था ही । उसने उलजुलुल बकवास करनी शुरु कर दी, हाथ पांव चलाए पर अब तो बच्चों को इस काम में और ज्यादा रस आने लगा । जान पे बन आने पर तो कोई कमजोर सा पागल भी सर्वशक्तीमान जेसा हो उठता है ।

अब बच्चे आगे आगे और पागल हाथ में पथ्थर लिए उनके पीछे पीछे ! दुनिया बडी अजीब है, पुरे घटनाक्रम में कोई बच्चों को शैतानी करने से रोक नहीं पाया और अब जब पागल के हाथ में पथ्थर आ जाता है और अगर वह बच्चों कों डराने के लिए थोडा शक्ती प्रदर्शन करता है तो लोग पागल को मारने पर उतारु हो जाते हैं । बडी अजीब सी स्थिती है आजकल ।

मुझे खुद अपने आप पर भी बडा तरस आया की क्या में उस पागल को बच्चों से बचाने में सक्षम नहीं था । अगर था तो क्यो नही बच्चो पर चिल्लाया ! हर आदमी फोकट के झंझट से बचना चाहता है आजकल, शायद में भी उन लोगों जैसा ही हो गया हूं !

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कैलास खेर नकली या असली

February 18th, 2010 · तकनिकी, शख्सियत

भारत में म्युजिक इन्डस्ट्री बहुत ही बडी है और हाल ही में एक नया नया सा गायक आया है नाम है “कैलास खेर” । तो यहां मुंबई में अपने टेलेंट से अपने पेशे से लाइफ में सर्वाइव करना भी बहुत ही मुश्किल कार्य होता है । मिडीया से बातचीत के दौरान बडा ही शुद्ध लहजा और आवाज में गजब का “देसीपन” कह सकते हैं हम कह सकते है कि केलास की आवाज “रियल” यानी असली है । दूसरे कलाकार “फेक” या नकली, या फिर वेसे जो कि म्युजिक इन्डस्ट्री में क्या बिकता है, वो करने को तैयार जेसे मुझे मसाला ला के दो में गाता हूं ना ।

इन्डस्ट्री में हर कोई अच्छी प्रेजेन्टेशन मांगता और चाहता है, इंडियन आईडल या इस तरह के शो में आप देख सकते हैं कैसे कोई छोटे शहर के देसी गरीब कलाकार लडके या लडकी को इंटरनेशनल आईटम या स्टार टाईप का बना कर प्रेजेन्टेशन किया जाता है । कुछ ही हफ्तो में जी टी. वी. को जैसे एफ. टी. वी. बना दिया हो एसा हो जाता है । क्यो कि टी . वी. पर दिखता है वो बिकता है । सस्ती टी. आर. पी. पाने के लिये कोई कुछ भी कर गुजरने के लिये तैयार बैठा है ।

लोग कहते हैं घोर कलयुग है, सच्चाई का गला बुराई काट रही है । पर फिर भी कहीं को कुछ है, जो केलास जेसे मेहनती कलाकार को भी कुछ मुकाम हासिल हो ही जाता है । इतना बडा भारत है, हर किसी को कुछ फेन्स तो मिल ही जाते है ।

पर कैलास खेर कि आवाज में सत्यता है, देसीपन है ठेठ गांव का, निश्छल सा प्रेम है, ए॓से ही कलाकार को जब कोई सम्मान मिलते हैं या जब वह उन्नति के शिखर को छूता है तो ना जाने मुझे अंदर से बडी खुशी सी महसुस होती है ।

So, Kailash Keep it up your good work…

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अच्छा देखें, अच्छा साहित्य पढ़ें, अच्छे विचार प्रकट करें

February 17th, 2010 · उलझन

जी हां सभी लोग अच्छा देखें, अच्छा साहित्य पढ़ें और अच्छे व सटीक विचार प्रकट करें तो शायद बहुत सी समस्याओं का अन्त हो सकता है । शायद आपसभी ने कीप या कुप्पी को देखा ही होगा ।

इसका काम होता है, बोतल में पानी या कुछ भी भरने के लिये । अक्सर बोतलों के मुंह छोटे होते हैं और अगर लोटे से सीधे धार बना कर भी पानी डाले तो कुछ बहर गिर ही जाता है । पर अगर कीप के सिरे को बोतल में सही तरह से पकडो और पानी डालो तो कैसा सीधा एक ही धार से पानी अंदर जाता है । बाहर बिलकुल भी नहीं गिरता । तो इंसान अपने आप को व्यावहारिक जीवन में एक कुप्पी के जैसा बना ले तो कैसा लगेगा ।

यानी कि दुनिया के लोग कुछ भी कहे, चाहे वह बात किसी भी परिप्रक्ष्य में हो, कुछ भी डाले उस इंसान के मन में, पर जब कोई भी बात या विचार मुंह से निकले तो ए॓से सटीक की, बस ! बडे लोगो ने कहा है ही कि पहले तोलो फिर बोलों, क्यों कि शब्दों के बाण ए॓से होते हैं जो लौट कर फिर नहीं आते, एक बार किसी को कुछ कह दिया तो कह दिया ।

कई लोग सालों सालों तक बैर पाले रखते है कि फलां ने मुझे उस मौंके पर यह कह दिया वो कह दिया । बातों की चंचलता से कोई ज्यादा सम्मान नहीं पाते पर , धीर गंभीर या सोच समझ कर बात को प्रकट करने वाले की हर कोई सुनता है । साथ ही एक अच्छा इंसान वही है जो अपने गुस्से को काबू कर सके । तो आज से, अब से में भी एक अच्छा इंसान बनने की कोशिश करुंगा ।

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वो टाईल्स लगाने वाला कारीगर

January 9th, 2010 · आपबीती, लघु कहानियां

एक बार की बात हैं, बहुत सालों पहले एक साधारण सा नौकरी पेशा आदमी ने अपनी हैसियत से थोडा उपर की सोच रखते हुए अपने मकान को थोडा व्यवस्थित करने के लिये मकान का काम चालू करवाया ! पता नहीं किस बुरे मुहु्र्त में ये सब शुरु हुआ था कि काम छः महिने से उपर होने पर भी खतम होने का नाम नहीं ले रहा था । कुछ ना कुछ काम बढ़ ही जाता था । वेसे राजस्थानी मेवाडी भाषा में एक कहावत है कि “ब्याह कहे कि मुझे मांड के देख, और मकान कहे कि काम छेड कर देख” सो बस मकान मालिक यह सोचता था कि अब औखली में सर तो दे ही दिया है, हो जाने दो जैसे भी हो, थोडा बहुत उधार भी हो गया तो मेहनत करके चुका देंगे ।

कुछ वक्त बाद बस सीमेंट पिल्लर, पलास्तर, घूटाई आदि के कामों से निबटे तो बारी आई, बाथरुम में टाईल्स लगाने की, तो मकान मालिक नें पहले से ही अच्छी क्वालिटी की टाईल्सों के डब्बे व व्हाईट सीमेंट का एक कट्टा कारीगर से पुछ कर उचित मात्रा में मगंवा दिये थे ! अब ढ़ु्ढ़ां गया टाईल्स लगाने वाला कारीगर को ! बडी मुश्किल से वो मिला । मकान मालिक नें कारीगर को देखाः पतला दुबला सा साधारण कपडे पहने एक सीधा सा दिखने वाला व्यक्ती था वो, शहर के पास के किसी गांव का ही रहने वाला था । सो रेट तय की गई और कारीगर ने कहा कि इतने रुपये में यह कार्य में नियत अवधि में यानी पन्द्रह रोज में कर दुंगा । रुपये आधे अभी व आधे रुपये काम पुरा हो जाने के बाद आप दे देना बाबूजी ।

बात पक्की हो गई, काली सीमेंट, व्हाईट सीमेंट का एक कट्टा और टाईल्सों के डब्बे उसको दे दिये गये । उसने दुसरे दिन से ही काम चालू कर दिया । हाथ में उसके सफाई थी, पर काम चालू करते ही उसने व्हाईट सीमेंट को लगाकर टाईल्से चिपकाई जिससे पुरा कट्टा खत्म हो गया, जो कि लगभग पुरे बाथ में लग सकती थी, आम तौर पर व्हाईट सीमेंट को टाईल्सों के बीच की दरजों में भरने के लिये ही काम में लेते हैं, और टाईल्सों के पीछे काली सीमेंट को लगाया जाता है । अब व्हाईट सीमेंट आती बहुत महंगी है और काली सीमेंट सस्ती ।

कारीगर नें कहाः बापू व्हाईट सीमेंट खत्म हो गई, तो मकान मालिक नें जाकर बाथरुम में देखा तो हतप्रत रह गया, मुर्ख कारीगर नें महंगी व्हाईट सीमेंट को लगाकर टाईल्से चिपकाई जिससे पुरा कट्टा खत्म हो गया । खैर नुकसान तो होना था सो हो गया । बाद में फिर से कारीगर को कारीगरी सिखाई गयी कि व्हाईट सीमेंट को टाईल्सों के बीच की दरजों में भरने के लिये ही काम में लेते हैं, और टाईल्सों के पीछे काली सीमेंट को लगाया जाता है ! कारीगर नें शर्मिंदा होते हुए माफी मांगी और फिर से काम शुरु किया ! तीन दिन बराबर काम करने के बाद अचानक वह गायब हो गया व वापस नहीं आया ।

मकान मालिक को लगा कि हाथ खुला रखने का नहीं है इस दुनिया में हर आदमी की चाबी अपने पास रखो तो वह दोडा चला आता है, अब उसको कहां ढ़ुढ़ें ? एक तो काम लेट हो रहा है मेरा, उपर से आधे पैसे उसको एडवांस दे रखे हैं वो तो अब गये समझों ! खेर मकान मालिक को पता ही था कि ए॓से तो हमेशा ही होता रहा है की काम में देरी, व कारीगरो के कारण नुकसान सब से ज्यादा टेंशन ।

दस दिन बाद अचानक वह टाईल्स लगाने वाला कारीगर मकान पर आया, वह चेहरे से बडा ही मायूस सा दिख रहा था और उसके कपडे, बाल आदि अस्त व्यस्त थे । वह पहले ही मकान मालिक का नुकसान कर चुका था और अब काम लेट और करने के कारण गमजदा व शर्मिंदा भी था । नजरे निचें किये वह काम पर आया और उसनें फिर से अधुरा पडा कार्य प्रारंभ किया ? थोडी देर में मकान मालिक बाबूजी आये । उसने नमस्ते किया, मकान मालिक नें कहा कि देखो भाई मेनें तुमसे पहले हौ बात कि थी कि काम मझे इस समय के अन्दर अन्दर चाहिये और तुमने भी हामी भरी थी, अब पहले ही मेरा इतना नुकसान कर चुके हो अब तुम और क्या चाहते हो ? क्या मुझसे कुछ गलती हो गई है क्या मिस्त्री साहब ?

वह नजरे नींचे किये खडा रहा व सुनता रहा, अचानक उसका गला रुंध गया व उसने बताया कि चंद रोज पहले एक दुर्घटना में मेरे बेटे की मौत हो गई थी, बस इसलिये में नहीं आ पाया, बाबुजी नें कारीगर के चेहरे में अजीब सी सच्चाई को देखा और उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ कि में गुस्से में इस भले आदमी को जाने क्या क्या कह गया ।

अब मकान मालिक निरत्तर थे उन्होनें कारीगर के कंधे पर हाथ रखा, प्यार भरा स्पर्श पाकर वह गदगद हो गया । कारीगर को पराये आदमी से कभी इतना स्नेह नहीं मिला था। मकान मालिक ने कहा भगवान के आगे कोई नहीं चल सकता है, जो होना था वो हो गया, अभी मुझे बताओ क्या में कुछ और तुम्हारी मदद कर सकता हु् ?

कारीगर निर्विकार भाव से खडा बाबुजी को देखता रहा । कुछ देर निःशब्द खडा रहा ।
दो चार दिन में ही उसने काम सफाई के साथ पुरा किया बाकी का पैसा लिया व चला गया ! जाते समय बाबुजी ने उसके चेहरे को देखा, उसमें एक अलग ही तरह का प्रेम था, निर्विकार, निस्वार्थ प्रेम ।

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