Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

Rajsamand District, Rajasthan header image 1

ओ बसंती पवन पागल

October 24th, 2009 · तकनिकी, फिल्म रिव्यु

“ओ बसंती पवन पागल ना जा रे ना जा” यह गीत है फिल्म जिस देश में गंगा बहती है से और फिल्माया गया है राज कपूर साहब और पद्मिनी पर । लता मंगेशकर और शंकर जयकिशन की जोडी नें जादू सा कर डाला है, प्राण फूंक दिये हैं ।

शुरु होते समय ही इस गाने में दो डायलोग हैं जो इस प्रकार हैं !

सुनों, आगे बडी गहरी और भयानक खाईयां है, तुम भटक जाओगे राजु, मत जाओ ।

पहाड वाले रास्तों पर वो लोग भटकते हैं जिनके मन की हर रात सूनी और अंधेरी होती हैं, कम्मो जी  |

राज कपूर का “जी” यहां भी प्रासंगिक है । पहले के जमाने में फिल्मों में विडियो एडिटिंग वगेरह में भी काफी खामियां रह जाती थी । नायिका के होठ अलग हिलते हैं और गाना अपनी रफ्तार में चलता है । पर सबसे खास बात इस गाने की यह है कि इसका संगीत, यह तो एसा है कि पत्थरदिल इंसान को भी रुला दे ।

गाने के अतं में नायिका पद्मिनी का विरह में गहने श्रंगार आदि फेंकना और फिर हीरो राजु का लौट कर आना, दुखी दुखी से गाने का सुखद मिलन ये यहां बडा विचित्र है । उधर अपने जमाने के मशहुर विलेन प्राण साहब बंदुक लिय पीछे पडे हैं । कुल मिला कर गाना में एसा जादू है कि कोई सुन कर भूल नहीं सकता ।

लिजीये विडियो देखिये आप भी यहां:

→ 1 टिप्पणींटैग्सः ··

मन की भडास

September 12th, 2009 · उलझन

मन की भडास

सुबह सुबह का समय ना जाने क्यूं,
बचपन से ही मुझे अच्छा लगता है,
पर इस कोरे साफ सुथरे समय में भी कोई है,
जो शायद यह समय ही चुनता है
और निकालता है अपने मन की भडास ।

जाने कहां गन्दी गलियों में वह रहता होगा
ना जाने कहां से हर रोज सुबह के वक्त ही,
अवतरित हो उठता है ।

वह पागल सा व्यक्ती मेरे घर से कुछ दूर,
चौपाटी पर भांग की दुकान के पास खडे हुए
रोजाना अल सुबह ना जाने किसको
भद्दी भद्दी सी गालीयां देता है,
चिल्लाता है इतना दम लगाता है
कि, कि लगे कलेजा मुंह से बाहर आ जाएगा
गले की नसें खिंच सी जाती हैं, उसकी

एक दो पांच दिन हो तो हो पर,
ये तो दिन पर दिन यही काम करता रहता है,

पता किया तो जाना कि वह काम कुछ करता नहीं हैं,
दिन में किसी नें रुपये दो रुपये दे दिये
तो पानी के मटके भर ले आता है
उस ही खटारे हेंड पंप से जो कभी चलता है और कभी नहीं.

सिर्फ भांग के नशे का आदि हो चुका है
रुपये पेसे उसके पास होते हैं नहीं

पर कहा भी गया है ना कि
आवश्यक्ता ही आविष्कार की जननी है

उसको आवश्यक्ता है जरुरत है सिर्फ और सिर्फ भांग के नशे की
इतना लती हो चुका है वह कि जैसे उसकी नसों में भांग जम चुकी हो,

शायद यही सोच कर वह चिल्लाता है, गालियां बकता है,
लोग चाहे उसे पागल समझे पर
उसे अपना काम निकालना आता है ।

और फिर कोई न कोई दया करूणा वश
उसे दो पांच रुपये दे देता है और फिर वह उन चंद सिक्को से
भांग पी कर मस्त होकर अपने रास्ते चल पडता है

फिर अगली सुबह होगी और फिर से उसका यही क्रम चलेगा,
सोचता हूं वह ठीक होगा या नहीं,

कोई तो उसका भी अपना होगा, जो उसकी चिन्ता करे,
या फिर उसकी भी जिन्दगी यूं ही चलती रहेगी, चलती रहेगी ।

अनजान

→ अब तक कोई टिप्पणीं नहींटैग्सः ··

बेबू पान वाला

August 29th, 2009 · राजसमन्द जिला, शख्सियत

जी हां ! हमारे शहर कांकरोली राजसमंद में एक प्रसिद्ध पान की दूकान है “ग्रेजुएट बिटल्स” उसके मालिक हैं बेबू भाई सिन्धी ! व्यक्तिगत तौर से में इनको पिछले करीब बीस साल से जानता हूं । यानी कि इतनी ही पुरानी इनकी यह दुकान भी है । अपने जमाने में उन्होने काफी पढ़ाई की और बडी सी डिग्रीयां अच्छे अंको से पास की, और नोकरी के लिये कई प्रयासों कें बाद भी जब बेबू भाई को कहीं सफलता नहीं मिली तो उन्होने अपना स्वयं का पान की दुकान शुरु करने की सोची ।

अब अनपढ़ आदमी पैसे के लिए कुछ भी काम या नौकरी कर सकता है पर पढ़ा लिखा नहीं । पर फिर भी उन्होनें हिम्मत नहीं हारी और जीवन में सफलता के लिए अनवरत प्रयास करते रहे । जैसे वकील के नाम के आगे लिखा रहता हैं रामलाल M.A.,L.L.B.एसा ही कुछ इनकी दुकान के बाहर बोर्ड पर लिखा हुआ था जो मे अक्सर अपने बचपन के समय में पढ़ता था पर मतलब जान नहीं पाया !

आज में इतने सालों के बाद में जब भी उन महाशय की दूकान के पास से गुजरता हूं या कभी कभी वहां से मीठा पान लेता हूं, तो सोचता हूं कि जब आज से बीस साल पहले भी नौकरी पाना आसान नहीं था और आज भी नहीं । एसे में क्या उनका यह स्वरोजगार को अपनाने का कदम कहां तक सही रहा । या फिर सही था भी या गलत ! सामान्य वर्ग के गाल पर तो जैसे सरकार ने तमाचा सा मारा है, अब कोई भी सरकारी पदों पर SC ST या OBC वर्ग के व्यक्तीयों को ही देखा जा सकता है ।

आज भी कांकरोली के मेन चौपाटी पर दुकान लगाये बैठा यह पर्याप्त पढ़ा लिखा बेबू भाई पान वाला सफेदपोश नेताओं के मुंह पर तमाचा सा मारता प्रतीक होता हैं “साथ ही स्वरोजगार शुरु  करने वाले भाईयों के लिए एक शुभ संदेश सा देता हैं” । आज में सोचता हूं, नौकरी के प्रयासों में एक निश्चित समय तक भी अगर सफलता नहीं मिले तो बेबू की तरह ही स्व रोजगार करना ही अति उत्तम है । आखिर देश के प्रधानमंत्री भी तो स्वरोजगार अपनाओ का ही नारा देते हैं !

→ अब तक कोई टिप्पणीं नहींटैग्सः ·········

ये कुत्ते आखिर गाडीयों के पीछे भागते क्यों है ?

August 20th, 2009 · आपबीती, उलझन

बडा अजीब सा सवाल है, है ना ! ये कुत्ते आखिर गाडीयों के पीछे भागते क्यों है ? कुछ कत्ते तो दूर से ही ताक लगाकर खडे रहते हैं, जैसे कोई पुरानी दुश्मनी निकालना चाहता हो, और ना जाने क्यों जैसे ही कोई कार, मोटर साईकिल पास से गुजरी नहीं की भोंकते हुए उसके पीछे सरपट दौडते हैं । और इस ही क्रम में कई बार बेचारे निर्दोष मोटरसाईकिल सवार छोटे मोटे एक्सीडेंट का शिकार हो जाते हैं ।

कभी कभी कार जीप के जब कोई कुत्ता दौडता हैं तो कार में बैठे लोगों की हवा टाईट हो जाती हैं, खास तौर से अगर कार की खिडकी खुली हो तो एसा महसूस होता हैं कि कहीं यह दुर से दौडता हुआ कार की खिडकी के अन्दर जंप ना मार दे । और जंप मार भी दे तो कोई बात नही पर अगर काट लिया तो मुसीबत हो जाएगी । खामखा अस्पताल के चक्कर और पेट में चौदह इंजेक्शन अलग से । इस ही प्रकार जीप में सवार लोगों को तो मुसीबत और भी ज्यादा सी महसूस होती हैं, क्यों कि अधिकतर जीप में तो ढाटक होती ही नहीं हैं ना । एक छोटा रेगजीन का सा किवाडनुमा कुछ बना रहता है जो डंडे पर लिपटा ही रहता हैं ।

काफी रिसर्च करने के बाद पता चला कि अगर कोई गाडी नें अगर कुत्ते को कुचल कर मार डाला हो, मृतक कुत्ते के सारे परिजन उस रंग व मेक की सभी गाडीयों के जानी दुश्मन से बन जाते हैं और फिर उनका एक ही मकसद होता है, आदमी को मारो अभियान । पर स्कुटर व मोटरसाईकिल वाले भले ही गिर पडते हों, कार जीप या बडी गाडी वालों से ये चार टांगो वाले चालाक कुत्ते जीत नहीं पाते हैं और इनमें से कुछ और भी कुत्ते की मौत ही मर जाते हैं ।

कहा जा सकता हैं कि आज के जमाने में इंसान कुत्तो से भी निकृष्ट हो चुका है, पर ये जानवर अभी भी अपनी स्वामीभक्ती, मदद करने की काबिलियत और बहादूरी के लिए ही जाने जाते हैं । साथ ही में यहां एक बहुत ही अनमोल विडीयो पेश करता हूं जो हमें यह बताने के लिये काफी है कि कोई इंसान कुत्ता कमीना बन सकता हैं पर इन्होनें अभी भी इंसानियत नहीं छोडी हैं । यह विडीयो ट्रेफिक केमरे से खिंच चुका था जब एक कुत्ता अपने अन्य साथी की जान बचाने के लिए कैसे अपने जीवन को दांव पर लगाता है और किस प्रकार से मदद कर के बचा लाता हैं ।

→ 1 टिप्पणींटैग्सः ····

नील गगन पर उडते बादल… आ आ आ

August 4th, 2009 · नई खबरें, फिल्म रिव्यु, राजसमन्द जिला

हरियाली का मौसम फिर से आ चुका है । आज सावन के महिने का आखिरी दिन है । राखी का पवित्र त्योहार भी पास है, और ठीक ठाक सी बारिश के बाद भी यहां आस पास के खेत हरे भरे हो चुके है । पेश है एक बहुत ही उम्दा नगमा ” नील गगन पर उडते बादल… आ आ आ” जो है फिल्म खानदान (1965) से । रफी साहब की अभी अभी सभी ने याद किया ही था । यह गीत भी उनके ही बहुत बढ़िया गानों में से एक है, गाने में उनका साथ दिया था आशा भोंसले नें ।

सुनील दत्त साहब और नूतन पर फिल्माया हुआ यह गीत आज के जमाने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर देता है । पहले लोग कितने खुश रहते थे क्योंकि वे प्रकर्ति के इतना नजदीक रहते थे, और आज का समय एकदम से अलग हो चुका है, लोग बस अपनी ही धुन में लगे हुए हैं, क्या कर रहे हैं, कहां जा रहे हैं कुछ पता नहीं । खैर छोडो अपने को क्या ?

इस गाने के बोल इस प्रकार हैं

नील गगन पर उडते बादल… आ आ आ
धूप में जलता खेत हमारा कर दे तु छांया ।

छुपे हुए ओ चन्चल पंछी ….जा जा जा
देख अभी है कच्चा दाना पक जाए तो खा ।

तो आनंद लिजीये इस बेहद ही अनोखे गाने का, सोचिए कैसे थे वे कलाकार लोग, जो सालों पहले हमें हरियाली से नाता जोडे रखने का संदेश दे गए ।

→ 1 टिप्पणींटैग्सः ······