Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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फतेह लाल “अनौखा”

April 10th, 2008 · राजसमन्द जिला, शख्सियत

फतेह लाल जी “अनौखा” एक बहुत ही ख्यातनाम कवि हैं, कांकरोली राजसमन्द के। वेसे तो पेशे से ये अध्यापक हैं पर कविताएं बडी ही सुन्दर कविताएं, कहानियां और साहित्यादि लिखते हैं । स्वभाव से फतेह लाल जी बडे ही गंभीर और शांतचित्त हैं पर उनका लेखन कार्य वाकई में अनौखा है शायद इसलिए ही उन्हे ये उपाधि मिली है ।

प्रकृतिप्रेमी होने के साथ साथ ही ये राजसमन्द के रोचक इतिहास के भी अच्छे जानकार हैं । कई सारे अलंकरणों से अब तक इन्हें बहुत से मंचो पर सम्मानित किया जा चुका है । फतेह लाल “अनौखा” जी का कविताएं सुनाने का ढ़ंग भी बडा अलग सा है, कभी मौका पडे तो सुनियेगा जरुर इनकी “छोटी पर बेहद प्रभावी” कविताएं।

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किशन जी खत्री “कबीरा”

April 5th, 2008 · राजसमन्द जिला, शख्सियत

किशन जी खत्री राजसमन्द के जाने माने कवि हैं । चाहे स्थानिय कवि सम्मेलन हो या फिर कोई भी छोटी मोटी साहित्यिक गोष्ठी, इनके बिना कविता सुनने वाले श्रोताओं को कुछ अधुरा सा लगता है । पेशे से किशन कबीरा चिकित्सकीय कार्यों (आर. के. राजकीय चिकित्सालय) से जुडे हुए हैं । “कबीरा” उपनाम से ही कोई भी कवि प्रेमी जान सकता है, कि इनकी रचनाएं छोटी पर एकदम सटीक होती हैं, और ये मानो गागर में सागर का सा काम करती है। देश और समाज के कई सारे विषयों पर कबीरा जी ने अपनी लेखनी से नित नए प्रयोग किये हैं ।

कबीरा जी साहित्यिक गतिविधियों में सालों से सक्रिय रुप से जुडे हुए हैं । कवि समम्मेलन हो या फिर इस तरह का कोई भी मौका, ये आपको वहां दिखाई पडेंगें फिर आप अगले कवि सम्मेलन में आ रहे हैं ना इनके ध्यानमग्न कर देने वाले काव्यपाठ को सुनने के लिए …….

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भगवान सब देख रहा है !

April 4th, 2008 · नई खबरें, राजसमन्द जिला

पिछले दो तीन दिन से अप्रेल के महिने में बेमौसम की जोरदार बारिश और धूल भरी आंधीयों से यह तो साबित हो ही गया है कि भगवान सब देख रहा है ! कुछ तीन चार महिने पहले कि बात ही थी कि राजसमन्द के आस पास के गांव वाले किसान वगेरह लोगों ने सिंचाई हेतु उचित पानी दिये जाने के बावजुद भी एक और पाणेत (सिंचाई) की मांग की थी । और नगरपालिका प्रशासन के ना मानने ले बावजूद किसान लोगों के द्वारा हाथों में गेंती, फावडे, कूंट, लट्ठ आदि हथियारों सहित शहर को बन्द करवाने का आव्हान किया गया था । शहर बन्द करवाया भी गया, और लडाईयां भी हुई ।

प्रशासन व राजसमन्द के स्थानिय निवासियों के सामने उनका विद्रोह सिर्फ पानी के लिए था, वहीं पर राजसमन्द के स्थानिय निवासी यह चाहते थे कि उचित पानी झील में ही रहे ताकि झील का सौन्दर्य बना रहे साथ ही स्थानिय पानी कि आपुर्ती में भी व्यवधान ना हो पर …..

अब उन लोगों की फसल पक कर एकदम तैयार खडी थी, बस कटाई ही बाकी थी कि उपर वाले ने भी एसा चक्कर चलाया कि उन लोगों को रुपये की अठ्न्नी भी नहीं मिल पा रही है । इसी लिये कहते हैं कि [Read more →]

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जमाना जब दूरदर्शन का राज चलता था !

March 26th, 2008 · तकनिकी, नई खबरें

 आज के टी.वी. चैनलों की जंग के जमाने में हर कोई नया दिखाना चाहता है, कोई चेनल अपने दर्शको को सस्पेंस की कहानिया बता रहा है तो कोई सनसनीखेज न्युज या स्टींग आपरेशन बता रहा है, हर किसी को अपनी टी.आर. पी. बढ़ाने कि फिक्र है । कोई चेनल भुत पिशाच, डायन आदि की डरावनी कहानिया बयां कर रहा है तो कोई तन्त्र मन्त्र व साधना के बारे में बता रहा है । शव साधना, शमशान, भुत बंगला, पुरानी हवेली, डराने मुखौटे ‌और इस तरह की बातों के अलावा जेसे इन चैनल वालों के पास कुछ भी नहीं बचा है ।

हर किसी चीज को भुना रहे हें वे, कहने का मतलब ये है कि जो भी बिकता है वो बेचो, जमाना डिमान्ड और सप्लाई का है । कोमेडी के नाम पर भद्दी और द्विअर्थी संवाद कहे जा रहे हैं फिल्मों और नाटकों मे और नृत्य के नाम पर ना जाने कैसा भोंडापन दिखाया जा रहा है, । साथ ही एक और नई तलाश शुरु हई है वह हे आईडियल टेलेन्ट की खोज कौन है जो सबसे बेस्ट नर्तक, गायक या तेज दिमाग वाला है ।

एक जमाना वह भी था, जब दुरदर्शन का सिक्का चलता था, बोले तो राज चलता था उस जमाने में तब दुरदर्शन का । बहुत सारे सिरियल हमें क्या पूरे जमाने को पसंद थे जेसे महाभारत, हम लोग, कहां गए वो लोग, नुक्कड, मालगुडी डेज, रामायण, जंगल बुक, डिस्कवरी आग इन्डिया और चित्रहार । [Read more →]

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जस्सुबेन जयन्तिलाल जोशी V/s अनजान

March 25th, 2008 · आपबीती, उलझन, फिल्म रिव्यु

पिछले सात दिन में दो तीन बार मेनें NDTV र आने वाला एक धारावाहिक जस्सुबेन जयन्तिलाल जोशी देखा, उसमें एक पात्र है । जसुबेन का चश्मेवाला बडा लडका जो पेशे से टीचर है ‌और कविताएं लिखना उसका शौक है । अपने आप को प्रसिद्धी पाते हर कोई देखना चाहता है और वह भी एसा ही सोचता है । एक दिन अखबार पढ़ते हुए वह अपना नाम देखता है, अखबार में लिखा होता है कि उसने बहुत अच्छा काम किया है और किसी को अस्पताल पहुंचाने में मदद की । वास्तविकता में उस शख्स नें जिन्दगी में सिवाय दुसरों को लेक्चर देने के कोई काम नहीं किया होता है । थोडी ही देर में घर वालों को पता चल जाता है वह डींगे हांक रहा था । फिर आती है जस्सुबेन एक टिपीकल गुजराती परिवार की मुखिया महिला के लीड रोल में और अपने बडे बच्चे को बहुत खरीखोटी सुनाती है उस दिन । बाद में बच्चे व मां को यानी जसुबेन को फील होता है कि एसा नहीं होना चाहिए था । फिर जसुबेन का लडका इस बात से सीख लेता है, कुछ कर के दिखाएगा ।

जाने क्युं एसा लगा की ये सब मेरी ही जिन्दगी का आइना है । अपने राम भी एसे हीं है , कुछ काम धाम कुछ करना है नहीं, सुबह सबसे लेट उठना, एक भी काम खुद नहीं करना, सब काम दुसरों के भरोसे । सिर्फ और सिर्फ हुकुम चलाना आता है, कि ये लाओ वो लाओ । [Read more →]

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