Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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सफर में टाइम पास के लिए नया खेल

October 9th, 2007 · नई खबरें, हास्य

 क्या कहा आप सफर के दौरान कार में बैठे बोर हो रहे हैं ? लिजीये एक नया टाइम पास का फन्डा पेश ए खिदमत है । यह एक नया तरह का खेल है ……… और इस खेल को इजाद किया है हमारी मित्र मंडली नें । कापीराईट का कुछ लोछा नहीं है आप भी स्वयं यह खेल, खेल सकते हैं अपनी कार में बैठ कर, अपने मित्र मंडली या परिवार के साथ

इस खेल को खेलने के लिये क्या करना होगा ? सबसे पहले कार में चार या पांच लोग बैठ जाएं और थोडा लम्बी दूरी के लिये यात्रा करने के लिए निकल पडें । सभी लोगों का मूड फ्रेश हो यह जरुरी है । सभी नहा धो कर आए, इससे खेल में और भी ज्यादा मजा आएगा ।

कार में एम.पी.थ्री. प्लेयर या डी.वी.डी. प्लेयर होना चाहिए । इस खेल को खेलने के लिये आडियो केसेट प्लेयर नहीं चलेगा । यह सिर्फ फिल्मी गीतों के शौकीन लोगों के लिये नहीं है अपनी पसंद के हिसाब से थोडा चेन्ज कर सकते है

अब ड्राइव करने वाले को क्या करना है कि कार कम गति पर चलानी है 20 से 30 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार काफी है । साथ ही यह भी जरुरी है कि ड्राइव करने वाला सिर्फ ड्राइव करने पर ही ध्यान दे । अब पीछे की सीट वाले या ड्राइवर की बगल वाले व्यक्ती के हाथ में एम.पी.थ्री. प्लेयर या डी.वी.डी. प्लेयर का रिमोट दे दें ।
प्लेयर के अंदर हिन्दी फिल्मी गीतों की सी.डी. या डी.वी.डी. डाले व चालू करें ।

इस खेल में दो टीमें है ।ड्राइव करने वाला और उसकी बगल में बैठा व्यक्ती पहली टीम के सदस्य होंगे तथा पीथे की सीट वाले दुसरी टीम के । अब करना क्या है कि गाने पुरे पुरे नहीं सुनने है बस हर [Read more →]

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लो जी फिर से आ गए गरबे

October 1st, 2007 · उत्सव एवं त्योहार, उलझन, नई खबरें

गरबा नृत्य एक विशेष तरह का नृत्य है जो कि आजकल प्रसिद्धि की उंचाईयों को छू रहा है, वेसे तो इसकी शुरुआत गुजरात से चालू हुई पर शने शने इसने पुरे भारत को कवर कर लिया । चंदे के पैसों से ही सही पर हर कोई अपने मोहल्ले के चोराहे पर गरबे होते देखना चाहता है । शुरुआत होती है मोहल्ले से ही

हर बच्चा कुछ अलग दिखना चाहता है गरबे की प्रतियोगिता में
, कोई भिन्न भिन्न तरीके के उछलकूद कर के डांस करता है तो कोई झुक झुक कर के । अब इसमें फेंसी ड्रेस प्रतियोगिता का भी समावेश कर लिया गया है हर दो तीन दिन में फेंसी ड्रेस प्रतियोगिता होती है गरबों के दौरान ईसमें सेंकडो नौकरी पेशा लोगों की मेहनत की कमाई बच्चों को खुश करने के नाम पर व्यर्थ खर्च हो जाती है ।

लडका हो या लडकी उसे तो नो दिन के लिये नो नई ड्रेसें चाहिये, साथ ही उनके लिये मेंचिंग के डांडीया, जूते, ज्वेलरी, दुपट्टे और ना जाने क्या क्या चाहिए, महंगे क्लब के पास या टिकट भी चाहिए जहां डांडिया का लुत्फ लिया जा सके, गाडी में पेट्रोल, मोबाईल में रिचार्ज और पर्स में थोडे एक्स्ट्रा पैसे भी चाहिए । और यदि बच्चे को फेंसी ड्रेस प्रतियोगिता भी अटेंड करनी हो तो कुछ एसा चाहिये जो किसी के पास ना हो । अब ये सारी नायाब चीजें व सुविधाएं ईकठ्ठा करने में तो साधारण घर परिवार वाले का दम निकल जाता है ।

हमारे एक परम मित्र ने अभी अभी एक शाम को आपसी परिचर्चा के दौरान बताया कि अब वो दिन दूर नही जब गणपति बप्पा के साथ ही गरबे चालू हो जाएंगे और दिवाली तक लगातार चलते ही जाएगें । यह सुन कर थोडी हंसी आई पर पता नही क्यों मन आशंकित हो उठा

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मिमिक्री कलाकारों की धूम

September 23rd, 2007 · उलझन, फिल्म रिव्यु

तो जनाब आईये कुछ बातें करते हैं स्टाइल के बारे में । आजकल बुद्धुबक्से में अलग अलग कार्यक्रम में आने वाले नकलची बन्दरो की तरह के मिमिक्री कलाकारों की बडी धूम है । जिसे देखो वही घिसे पिटे चुटकलों पर हंसने हंसाने की बात ही कर रहा है । टी.वी. पर कोई मिमिक्री कलाकार लडकियों या महिलाओं के कपडे पहन कर अपनी अदाओं के जलवे दिखा रहा है तो कोई एसे एसे किरदार की नकल कर रहा है जो कि अपने जमाने के उस्ताद रह चुके हैं ।

फिल्मी अदाकारी के मैदान में अपनी स्वयं की एक अलग पहचान बनाना काफी मुश्किल ही होता होगा, क्यों कि दुनिया में कोई भी आसानी से अपनी मंजिल को नहीं पा लेता है । जिसने अपनी एक स्टाइल या कार्यशैली बना ली वह तो महान ही हो गया, हर किसी आए गए को कोई नहीं देखता या पूछता है, सभी उन्हीं लोगों को याद रखते हैं जो अपने किरदार के अंदर घुस कर अभिनय करता है । गंभीरता के मामले में चाहे अमिताभ हो या संजीव कुमार, या फिर देव आनंद के जेसा हरफन मौला किरदार इन महान कलाकारों नें अपने जमाने में बेहतरीन कार्य किया है ओर कुछ तो अभी भी सबसे आगे ही हैं । क्या किशोर या रफी के गीतों को अब भी कोई मात दे सकता हैं, या फिर क्या शोले के गब्बर के किरदार को कोई भूल सकता है नहीं ना । ये सभी महान कलाकार अपनी एक अलग पहवान बनाने में काफी हद तक सफल रहे थे । तो कहने का मतलब यह है कि चाहे अपनी स्पेशल संवाद अदायगी के कारण या फिर अपने खासे व्यक्तीत्व के कारण ही चर्चित रहे महान कलाकारों कि नकल करना क्या मजाक का भी मजाक नहीं है ।

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हमारे जिले राजसमन्द में मातम भरा दिन

September 9th, 2007 · उलझन, नई खबरें, राजसमन्द जिला

जी हां ! हमारे जिले के ही गांवो के लोगों से भरी हुई रामदेवरा दर्शन के लिये जा रही एक ट्रक देसूरी के घाटे में दु्र्घटनाग्रस्त हो गई थी । जिसमें कई 60 से अधिक घायल हो गए एवं 86 के लगभग मारे गए । ट्रक में 211 बच्चे, बुढ़े, औरतें बेठे थे । इसमें लकडी के पट्टे लगा कर जगह बनाई गई थी ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग बैठ सकें । वेसे यह देसूरी का घाटा पाली की तरफ आता है । यह बडा ही भयावह, विकट मोड, चढ़ाव उतारों व घने जंगल से युक्त कठीन रास्ता है । वेसे इसके घाटे के जेसा ही हमारा उदयपुर के मार्ग में आने वाला चीरवा का घाटा भी है ।

अनुभवी बडे लोग बतातें है, कि आज से 15-20 साल पहले ना तो गाडीयों में पावर स्टीयरिंग होते थे ना ही सडके चौडी हुआ करती थी, ना रोड लाईट्स, ट्रक चलाने वाले के तो हाथ गियर बदल बदल कर और स्टियरिंग को मुडा मुडा कर ही दुखने लग जाते थे । साथ ही यह भी बता दुं की देसूरी की नाल या घाटे के शुरुआत में एक मंदिर भी है, काफी सारे लोगों का मानना है कि अगर रुक कर दर्शन किये बिना चले गए तो दुर्घटना के शिकार हो सकते हैं । बहुत सी गाडीयों से लोग रुक रुक कर पेसे चढ़ाते हैं, व दर्शन करते हैं यहां ।

इस से एक बात तो साफ हो जाती है कि हमारे राजस्थान के लोग काफी धर्मांध है, किसी के थोडे से आग्रह करने मात्र से ही खतरनाक यात्राएं करने के जोखिम तक उठाने से नहीं चुकते । ये तो कुछ भी नही हमारे हाइवे के रास्ते पर हर साल सडक के किनारे पैदल जाने वाले रामदेवरा के यात्री वाहनों की टक्कर के शिकार होते हैं व मारे जाते हैं। भगवान मृत लोगो की आत्मा को शांति दे ।

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कानून अभी भी जिन्दा है ? हां या नहीं

September 8th, 2007 · उलझन, नई खबरें

क्या कानून आज तक भी जिन्दा है यह सवाल अब तक हमारे मन में कई बार उठता है । पर आज जब हम बडे बडे राजनेता और अभिनेताओं को अपने अपराधों के कारण जेल का रुख करते देखते हैं तो मन में एक अजीब सी खुशी महसुस होती है । चलो कुछ तो एसा है जो कि पैसे या वैभव से नहीं खरीदा जाता, सच में कानून जिन्दा है ।

बचपन से आज तक सेंकडो हजारों फिल्मों का यह डायलोग कानून के हाथ बडे लम्बे होते हैं सुन सुन कर हम लोग भारी बोर होते हैं पर जब आज के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कानून के लन्बे हाथों का जलवा देखते हैं तो लगता है कि कानून के हाथ बडे लम्बे होते हैं । बडे बडे रईसों, पेसे वालों, अभिनेताओं और राजनेताओं का जीवन हमेशा विवादों से घिरा ही रहता हैं और जब किसी गलती या अपराध के लिये उन जेसे बडे पहु्च वाले लोगो पर भी जब हम कानून का शिकंजा कसते हुए देखते हैं तो लगता है कि इन लोगों की जिन्दगी भी आपके हमारे जीवन के जैसी ही तो है । शिबू सोरेन, सलमान खान, संजय दत्त या फिर कोई और, कानुन सबके लिये एक सा है, फिर चाहे कोई बडा व्यक्तीत्व हो या साधारण सा आदमी । हर गलती की सजा मिलेगी ………………..बराबर मिलेगी

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