Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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हमारा एप्पल आई पोड शफल खराब हो गया

February 28th, 2007 · तकनिकी, नई खबरें

बडा दुख हुआ हमें जब हमारा अपना एप्पल का आई पोड शफल चलते चलते अचानक खराब हो गया । हमने कुछ समय पहले ही नया 256 MB स्पेस वाला एप्पल का आई पोड शफल खरीदा था, पर अफसोस यह सिर्फ 8-9 महीने ही चला व खराब हो गया। अन्य मर्दों की तरह हमें भी टेक्नीकल फील्ड काफी भाता है व हमें भी तरह तरह के गेजेट्स का काफी शौक है,यह बात अलग है कि बचपन से लेकर अब तक हर चीज हमें काफी रो धो कर मिली है, पर मिली तो हे ही इसमें कोई दुख वाली बात नहीं है।

युं तो हमने काफी पहले से एप्पल के आई पोड शफल के बारे में काफी पढ़ा व सुना था । तो क्या था कि लेना तो था ही, थोडा रुके, फिर रुके, औ‌र भाव कम हो कम हो सोच कर रुके पर, फिर भी अपने आप को ज्यादा रोक नहीं पाए। एक बार हाथ में क्या आया ये तो बस ले ही पडे और जहां तक हमारा अंदाजा है कि कोई भी शख्स ईस गाने सुनाने वाली लेटेस्ट मशीन को हाथ में ले ले व एक बार ईसकी आवाज सुन ले तो इसे लिये बगेर [Read more →]

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जाती हुई सर्दी में बारिश, खराब या अच्छी

February 25th, 2007 · नई खबरें, राजसमन्द जिला

अरे रे ये क्या ! फिर से बारिश चालू । हमारे यहां कांकरोली में आज पता नहीं कहां से ये बादल आ गए सुबह से ही मोसम थोडा बारिश के जैसा बन रहा हि था । पर लोगों को पता था कि बारिशा आएगी नहीं सिर्फ ये बादल एसे ही दर्शन देने आए हैं व ये वापस चले जाएंगे । पर नहीं गए बादल सिर्फ बरसे और वो जोर से बरसे । हमको तो ए॓से में ये ही गाना याद आया ।

” देखो बारिश हो रही है, it’s raining, it’s raining, it’s raining
मेरा दिल रो रहा है, my heart is paining, it’s paining, it’s paining
तेरे लिये, तेरे लिये, तेरे लिये, तेरे लिये ये ये”

अन्नु मलिक साहब भी कभी कभार ठीक गा लेते हैं वेसे, क्या बोलते हैं आप।  कहते हैं कि जाती हुई व आती हुई सर्दी खराब होती है। फसले बारिश व हवा के हवा  के कारण आडी पड गई हि होंगी।  ईस बारिश के कारण आस पास किसान लोगों को भारी तकलिफों का समना करना पड सकता है। डाक्टर लोगों की भी जेबें गरम हो सकती है अगर काफी लोग बिमार हुए तो ।  लोग बाग क्या हैं कि समझतें नहीं हे और शेखी बघारते रहते हैं कि हमें ठण्ड नहीं लग रही, या नहीं लगती व एसे मोसम में या तो बारिश के पानी में भीग जाते हैं या फिर एकदम बाहर निकलते ही ठण्डी हवा लगनें के कारण बीमार हो जाते हैं। खास तौर से ये आती व जाती हुई सर्दी बच्चे व बुढ़े लोगों के ये ज्यादा तकलीफदायक होती हैं । ए॓से में सभी से गुजारिश है कि कृपया सर्दी से बचने के लिये इंतजाम करें व एसे ही खुलें में ना घुमें ।  

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शादी के दौरान के चन्द वाकये

February 21st, 2007 · उत्सव एवं त्योहार, नई खबरें, राजसमन्द जिला, हास्य

शादियों का सीजन चल रहा हे व हमारे शहर में चारों तरफ इसी तरह की गहमा गहमी है। बारात, बेंड बाजे, रोज रोज किसी ना किसी मिलने वाले के यहां प्रतिभोज में जा कर के खाना, व फिर लिफाफे टिकाना, एक अदद फोटो खिंचवाना व वापस घर आकर के सो जाना यही रुटिन हो गया है ।
 
हमारे यहां बडा अजीब सा सिस्टम है, जेसे कि मान लो जेसे “मिस्टर अशोक” व मिस्टर गिरिश के अच्छी जान पहचान है, पडोस में ही रहते है , अब मिस्टर अशोक की शादी है व उसने “मिस्टर गिरिश जी सपरिवार” के नाम का कार्ड दिया तब तो ठीक है और यदि सिर्फ “मिस्टर गिरिश” नाम से ही कार्ड दिया तो गिरीश के के घर कोई ना कोई महिला यह कह पडती हें [Read more →]

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देखादेखी व होड का फिर से एक नया दौर

February 19th, 2007 · नई खबरें, राजसमन्द जिला, हास्य

वेसे तो हर कहीं एक की देखादेखी दुसरे लोग करते ही हे, पर हमारे राजसमन्द में यह देखादेखी करने की रीत काफी पुरानी व बहुतायत में प्रचलित है। यहां एक समय था कि जब यह कांकरोली एक छोटा सा कस्बा था, खेर कस्बा से ज्यादा तो अभी भी नहीं हे, पर उस समय जलचक्की से आगे विरान मैदान थे, इधर मुखर्जी चोराहा व जे.के साईड भी यही हाल था । राजनगर जब कोई तांगे में बेठ कर जाता था तो वह एक अलग शहर सा प्रतीत होता था । तो भई हम बात कर रहे थे हमारे यहां की देखादेखी की । एक दौर आया जब हर कोई जो थोडा सा भी फाईनेन्शियली ठीक ठाक था मार्बल के धन्धे में कुदा, किसी के घुटने फुटे तो किसी का करोबार जम गया । होडाहोड में जाने कितने लोग जो पेसा नहीं चुका पाए , यहां से दिवालिया होकर भाग गए ।

कुछ समय बाद लोगों को मशीनरी व डायमन्ड टुल्स में मार्जीन अच्छा दिखने लगा, ईसके बाद दौर आया कम्प्युटर की दुकानों व साईबरकेफे का, जिनको कम्प्युटर की A B C D भी मालुम नहीं थी। वे लोग भी जाने कहां से इस धन्धे में कुद पडे, ना जाने बाहर से कितने लोग यहां यह धन्धा करने के मकसद से आये थे पर उन्हें वापस उलटे पैर कुछ ही समय में भागना पडा। यहां पर हाल एसा हे कि तीन लोग काम धन्धा छोड कर भाग जाते हैं तो दो नए आ जाते हें हर तरफ कम्पीटीशन। अभी फिलहाल में यहां पर मोबाईल रिपेयरि्ग की दुकाने खुलने का दौर चल रहा है, कुछ समय पहले यकायक दो तीन महीनों में ही हमारे शहर में जुते की चार दुकाने खुली जिनमें से एक तो लिबर्टी का शोरुम है। लगभग सभी शहरी लोगों को पता होगा की दो ‍- तीन साल पहले यहां होडा होड में कितनी आईस्क्रीम व ज्युस की दुकाने खुली थी व अभी कितने उन में से काम धन्धे चला रहें हैं। फिर चला साडी शाँप का दौर, फिर कार्ड व गिफ्ट की दुकानें खुली, हाई टेक हजामत वाले भी आये व गए, कम्प्यूटर कोर्स, ट्युशन चलाने वाले, PMT PET कोचिंग वाले व अंग्रेजी सिखाने वाले आये और गए। एक समय आया जब धडाधड तीन पूल क्लब खुल गए लोगों के मनोंजन के लिये। उसके बाद एसे ही कार डेकोर वाले, रेडीयम के स्टीकर वाले, कचौरी समोसे, चाट आदि की दुकानें वाले आए, धेर्यवान व्यवसाई लोग रह गए हैं, बाकी तो आते जाते रहते हैं।

अभी हाल में ही रेडिमेड के वस्त्रों की दुकाने खुलने का भी दौर जारी है हर कोई यह समझता है कि वो किसी समिती के चन्द उधार के पैसे ला कर, नए जिन्स टी.शर्ट पहन कर के ये धन्धा तो कर ही लेगा । अब करना क्या है,बस अच्छा फ्रेन्ड सर्कल मेन्टेन करना है 250 की जिन्स या टी.शर्ट 300 या फिर 350 में बेचना है ना पढ़ाई का लोचा ना हिसाब का टेन्शन । सक्सेस तो जैसे हो ही जाएंगे। पता नहीं आजकल की युवा पीढ़ी को क्या होता जा रहा हे वे लोग थोडे से अल्प परिश्रम में व कम से कम समय में ढ़ेर सारा पैसा कमाना चाहते हैं ।  

अपना तो भई नए काम धन्धे चालू करने वाले लोगों को यही कहना है कि भाई, पहले तो काम धन्धे का प्रशिक्षण भली भांती प्रप्त करें ईसके बाद चाहे छोटे स्तर से काम शुरु किया जाए तो कोई गम नहीं पर मन में दृढ़ संकल्प करें की सफल हो कर ही दम लेंगे, व इसके लिये पुरे प्रयास करें । किसी की देख देखी नहीं करें । फिर भी काम सही नहीं चल रहा हे तो धेर्य रखें क्योंकि किसी भी काम में सफलता प्रप्त करने में थोडा समय तो लगता ही हे। सब कुछ अल्प समय व कम मेहनत में ही हो जाता तो लोग एसे ही जिन्दल, अंबानी नहीं बनते।

इधर कुछ लोग एसे हें यहां जो अपने अपने वाहनों पर देखादेखी में बडे मजे से PRESS या POLICE लिखवा कर घुम रहे हें। पता नहीं एसा करने से क्या खास वट्ठ पडता है इनका अन्य लोगों पर। एक बार की बात हे हम जब टेक्सी करके कहीं घुमने गए तो जिस गाडी में हम लोग गए थे उस पर बडा सा PRESS लाल रगं में लिख हुआ था, हमें तो कारण जानने कि इच्छा हुई व हम ड्राइवर अंकल से पुछ बेठे, उन्होने बताया की एसा लिखने से हजार झंझट से मुक्ती मिल जाती है। पुलिस वाले भी बिना कारण नहीं रोकते, नो एनट्री में भी जा सकते हैं और सभी सोचते हैं कि प्रेस वाले जा रहें हें कुछ विशेष कारण होगा वगेरह वगेरह । ईस प्रकार से ही काफी लोग अपने वाहनों पर POLICE लिखवा कर व वेसे ही मोनो व कलर का प्रयोग करते हुए जनता को जेसे बताना चाहते हें कि हम पुलिस में हैं या हमारे फलां फलां चन्द जी पुलिस में है तो फोकट में खाली पीली अडने का नहीं । पता नहीं क्यों लोग एसा करते हैं ।

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हमारा वो कार ड्राइविंग सीखना

February 18th, 2007 · तकनिकी, राजसमन्द जिला

आज यूं ही बातों बातों में वो कार चलाना सीखने के दौरान हुए अच्छे अनुभव की बात निकल पडी । अभी कुछ ही समय पुर्व हमने हमारे राजसमन्द के भारत मोटर ड्राईविंग स्कुल वाले पंवार साहब के सानिध्य में अपने छुटके भैया सहित मारुती कार चलाना सीखा। अब हमारे घर तो कार नहीं है जो हम भी अपने शौक पुरे कर सकें पर मन की इच्छा को जैसे हमने तो दबाना कभी सीखा ही नहीं । एक दिन सुबह गार्डन भ्रमण के दौरान ही हमने विचार बनाया की अब तो कार चलाना सीख ही लिया जाए, फिर सोचा अब एक दो दिन में कार ड्राईविंग स्कुल वाले महाशय से बात करेंगे व फिर चालू करते हैं पर उस दिन हुआ क्या कि रास्ते में हमें वो पंवार साहब अपनी कार सहित नजर आ गए। छोटे भाई नें कहा की काल करे सो आज कर, तो हमने उनसे तत्काल, रुकते ही । इस बारे में बात की व कार चलाने सीखने की इच्छा जाहिर की। हमने कहा की दो ग्राहक एक साथ हैं कुछ कन्सेशन तो करो भाई । वे भी जेसे हमारे लिये ही आए थे उस दिन, उन्होने कहा की कल से शुरु करते हें। पर हमरे छूटके भैया ने पुछा की क्या आप आज फ्री नहीं हें क्या ? तो उन्होने सोचते हुए कहा,कि आ जाओ फिक्स एक घन्टे के बाद यहीं जे.के. मोड पर।

हम दोनो भाई तो जैसे एक एक पल गिन रहे थे। थोडी ही देर में नियत स्थान पर पहुंच गए व कार में सबसे पहले ड्राईविंग सीट को हासिल किया  हमने। उन्होने कहा की पहला दिन सिर्फ थ्योरी का है,. सब कुछ बताया उन्होने कि गियर केसे पडते है, हेन्ड ब्रेक का क्या काम होता है, कार पार्क केसे करते है, चालू बन्द करना, ब्रेक फेल होने पर क्या करे आदि काफी कुछ।

फिर दुसरे दिन से असली मजा चालू हुआ, हम दोनो ने एक एक करके सबसे पहले स्टीयरिंग व्हील पर अपना हाथ साफ किया, उस दौरान ब्रेक, गियर, क्लच सब ट्युटर के हाथ में ही थे। बडा मजा आया था। फिर अगले दिन ब्रेक, एक्सीलेटर व क्लच का उपयोग करने के साथ साथ स्टीयरि्ग पर केसे हाथा जमाने हैं यह सीखाया गया। तीसरे दिन से तो हम दोनो ने गियर डालना, स्टीयरि्ग सभांलना ब्रेक, क्लच, एक्सीलेटर का प्रयोग करना आदि की प्रेक्टीस की जो काफी दिन तक चली । फिर कुछ दिन के बार रिवर्स करना व चढ़ाई व ढ़लान पर केसे चलाएँ आदि का अभ्यास किया। लगभग तीसरे या चोथे दिन तो हम एसे कार चला रहे थे, की जेसे सब कुछ सीख चुके हें। ट्युटर महोदय नें भी आश्चर्य व्यक्त किया कि ये दोनो अच्छी लगन से व काफी जल्दी सब कुछ सीख रहें हें।

पहले खाली खाली सडकों पर व फिर बाद में आम रास्तों पर , उसके बाद हाई वे पर हमने कार को चलाने में अपने अपने हाथ को जमाया। बडे ही अच्छे दिन थे वो, पर इतने जल्दी निकल गए कि पता ही नहीं चला। किसी ने कहा हे ना की अच्छे दिन जल्दी से निकल जाते है व बुरे दिन तो बडे लम्बे लगते हैं । सोचा की जल्दी ही हम भी बेकार से (कार वाले) भले बनेंगे। पर कार वाले मित्र लोगों को जब हम देखते हें तो सोचते हें कि जेसे हें वो ही ठीक है, कार से सुख सुविधाएँ तो हे ही पर हजार परेशानियां भी तो होती हे । कभी कभी सोचता हुं की दुनिया में आए है तो हमें हर तरह के गेजेट को ओपरेट करना (चलाना)आना बहुत जरुरी है। एकदम जेम्स बांड के माफिक बनने का है अपुन को भी। सुना हे कि अभ्यास से ही हर चीज संभव है, क्या सही हे ये ।

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