Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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हल्दीघाटी का एतिहासिक महत्व

January 1st, 2007 · प्रमुख दर्शनीय स्थल, राजसमन्द जिला

राजसमंद का अपना एक एतिहासिक महत्व है और यह हमें अदभुत शो्र्य और वीरता की कहानी सुनाता है। राजसमंद के खमनोर गांव के समीप ही है, हल्दीघाटी जो कि हमारे राजस्थान के ईतिहास में एक विशेष स्थान रखता है। हल्दीघाटी का नाम हल्दीघाटी क्यों पडा, इसके पीछे एक बडी लम्बी कहानी है । यह बात है उस समय कि जब लगभग पुरे भारत में मुगल साम्राज्य का आधिपत्य था, पर मेवाड के पराक्रमी और वीर राजाओं ने शुरु से ही किसी की अधीनता स्वीकार नहीं की थी । मुगल बादशाह अकबर नें कुछ राजपुत राजाओं से मित्रता और रिश्तेदारी बढ़ाई ।

मेवाड के महाराणा उदय सिंह के ज्येष्ठ पुत्र महाराणा प्रताप में आत्मसम्मान व स्वाभिमान कूट कूट कर भरा हुआ था अतः उन्होने भी मुगलों की आधीनता स्वीकार ना करते हुए उनसे लोहा लेने की ठानी। उनकी इस जंग में राणा पूंजा, झाला मान सिंह, हकीम खां सुरी एवं हजारों भील उनके साथ थे। भामाशाह जैसे दानवीर ने प्रताप की मदद की, ताकि उनकी सेना में हथियारों व अन्य आवश्यक वस्तुओं की कमी ना पडे। 18 जुन 1576 ई. को महाराणा प्रताप एवं अकबर की शाही मुगल सेना के बीच हल्दीघाटी में एक एतिहासिक युद्ध हुआ। हल्दीघाटी में एक छोटा संकीर्ण दर्रा था, और ये ही आने जाने का रास्ता था । एक बार में सिर्फ एक घुडसवार ही इस रास्ते से निकल सकता था और पहाडी रास्तों व जंगलों से राणा प्रताप की सेना खासी वाकिफ थी ।

महाराणा प्रताप कि सेना ने छापामार युद्ध प्रणाली का उपयोग करते हुए मुगलों के दांत खट्टे कर दिये। मुगलों की तरफ से मानसिंह नें सेना की कमान संभाल रखी थी । दोनों सेनाऔं में घमासान युद्ध हुआ, हजारों सेनिक मारे गये । राणा प्रताप ने वीरता से मुगलों का सामना किया । ईसी दौरान मानसिंह और महाराणा प्रताप का सामना हुआ । महाराणा प्रताप नें भाले से भरपुर वार किया, मानसिंह हाथी के ओहदे में छुप गया, हाथी की सुंड में लगी तलवार से महाराणा प्रताप के स्वामीभक्त घोडे चेतक का एक पेर जख्मी हो गया । एक पांव से घायल होने के बावजुद भी चेतक ने एक बडे से नाले को पार किया और राणा प्रताप को महफुज जगह पहुंचा दिया । वहीं उस स्वामिभक्त घोडे चेतक का प्राणोत्सर्ग हो गया, उस स्थान पर आज एक स्मारक बना हुआ है जो कि चेतक स्मारक के नाम से जाना जाता है ।

विशाल मुगल सेना का सामना महाराणा प्रताप की छोटी सी सेना ने किया चेतक स्मारककहते है कि यहां ईतना खुन बहा की एक स्थान पर तलाई भर गई, यह स्थान रक्त तलाई के नाम से जाना जाता है। दोनो ओर के हजारों सेनिक मारे गये और अंत में यह युद्ध एक अनि्र्णायक युद्ध ही रहा । हजारों सेनिको के खुन से रंगी हल्दीघाटी की मिट्टी अभी भी हल्दी के रंग सी है, और ईसी कारण ईस स्थान को कालान्तर में हल्दीघाटी का नाम दिया गया ।

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गौरम घाट की रेल यात्रा

December 26th, 2006 · प्रमुख दर्शनीय स्थल, राजसमन्द जिला

गौरम घाट राजसमंद जिले का एक अन्य महत्वपुर्ण आकर्षक पर्यटन स्थल है,  यह एक बहुत ही दुर्गम पहाडी ईलाका है और यहां तक जाने के लिये रेल एक मात्र आवागमन का साधन है।  कांकरोली के रेलवे स्टेशन से यहां गौरम घाट जाने हेतू मारवाड जंक्शन की ट्रेन सुबह सवेरे 8.30 या 9.00 AM के लगभग जाती है । ईस ट्रेन का टिकट बहूत ही मामुली रुपयों में मिलता है, पर यह सफर एक अविस्मरणीय याद कि तरह हमारे जेहन में लम्बे समय तक रहता है ।

कांकरोली से यह ट्रेन चलती है फिर भीलवाडा रोड बाइ पास, कुंआथल,  कुंवारिया और ए॓से कई सारे छोटे मोटे गांव शहर रास्ते में आते हैं । अंग्रेजों के जमाने में बने हुए यह चंद रेलवे स्टेशन आज भी जैसे हमें उस जमाने की यादें ताजा कराते प्रतीत होते हैं । कहीं तेज तो कहीं मंथर गति से चलती हूई रेल व रास्ते के बीच आने वाले रेलवे स्टेशन के पुराने भवन, स्टोर रुम काफी आकर्षक लगते है । काफी समय के बाद शुरु होता है घाट सेक्शन, यहां से रेल की गति बहुत धीमी हो जाती है, पहाडी इलाका शुरु होते ही हमें दूर दूर के नजारे दिखने लगते है । बंदर,  नीलगाय, लोमडी व रंगबिरंगी चिडीयांए आदि का दिखना यहां कोई अचरज की बात नहीं है । घने जंगल, पहाडीयों  व सर्पिलाकार रास्तों से जाती हुई ट्रेन दो बडी टनल या गुफाओं से गुजरती है तो बडा अलग सा ही एक नया अनुभव होता है ।

रेल गौरम घाट पर पहुंचती है और चंद मिनटों के लिये रुकती हे,  पर्यटक यहां रुकते है व शाम को यही रेल मारवाड जंक्शन होकर 4 या 4.30 के आसपास वापस गौरम घाट व कामली घाट पहुंचती है । गौरम घाट के रेलवे स्टेशन पर प्रथम चिकित्सा सुविधा व पानी आदि मिल जाता है।  गौरम घाट के रेलवे स्टेशन के आस पास बहुत से बंदर है जो झुंड में रहते है । यह रास्ता ईतना दुर्गम है कि अब तक भी यहां बिजली की सुविधा उपलब्ध नहीं है । रेलवे वाले भी सोलर लाईट्स आदि का उपयोग करते हैं । यहां कुछ चाय, नाश्ता आदि नहीं मिलता है,   अतः बेहतर हे कि यदि पिकनिक के लिये जा रहें हें तो साथ लेकर ही जाएं ।

गौरम घाट पर पर्यटक दूर दूर के प्राकर्तिक नजारे देख सकते हैं । खासकर बारिश के दिनों में यहां कि प्राकर्तिक सुंदरता जेसे और भी खिल उठती हे । गौरम घाट रेलवे स्टेशन के पास से ही एक रास्ता पहाडी पर बने एक मंदिर को जाता हे, उपर जाने के लिये सीढ़ीयां है ततपश्चात पगडंडी है जिससे मंदिर तक पहुंचा जा सकता है । वहां से पहाडों के नजारे बडे ही अच्छे लगते है । एक अन्य साधु महाराज की धुणी भी वहां है, रेलवे ट्रेक से सामने की तरफ बने पगडंडी के रास्ते से वहां तक जाया जा सकता है ।

शाम को यह रेल मारवाड जंक्शन से वापस होकर 4 या 4.30 के आसपास वापस गौरम घाट पहुंचती है, वापस इसी रेल के द्वारा कांकरोली व बाद मे अन्य स्थानों पर पहुंचा जा सकता है । किसी विद्वान नें कहा है ना कि “Journey Is More Important Then The Destination” यह कथन सही प्रतीत होता है। ईस यात्रा के दौरान हूए अच्छे अनुभव शायद ही कोई भुल पाता हो ।

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कांकरोली का द्वारिकाधीश मदिंर

December 25th, 2006 · प्रमुख दर्शनीय स्थल, राजसमन्द जिला

द्वारिकाधीश मदिंर कांकरोली में राजसमंद झील के किनारे पाल पर स्थित है ! यह मदिंर बहुत ही प्राचीन मदिंर है और वेष्णवजनों को  खास तौर पर प्रिय है । दूर दूर से खास कर गुजरात और महाराष्ट्र से दर्शनार्थी यहां द्वारिकाधीश प्रभु के दिव्य दर्शन हेतू यहां आते हैं । द्वारिकाधीश जी भगवान कृष्ण का ही एक अन्य रुप हे ।  प्रतिदिन मंदिर में बाहर से आए दर्शनार्थी लोगों की भीड लगी रहती है, यह संख्या और भी बढ जाती है जब कोई खास उत्सव या विशेष दर्शन होते हैं । द्वारिकाधीश मदिंर के बाहर ही काफी सारी पुरानी धर्मशालाएं हैं, ईनके अलावा  कांकरोली व राजनगर में और भी कई होटलें एवं गेस्ट हाउस भी है, जहां पर्यटक ठहर सकते है।

मेवाड के चार धाम में से एक द्वारिकाधीश मदिंर भी आता हे, प्रभु द्वारिकाधीश काफी समय पुर्व संवत 1726-27 में यहां ब्रज से कांकरोली पधारे थे । कहा जाता है कि उस समय भारत में बाहर से आए आक्रमणकारियों का सर्वत्र भय व्याप्त था, क्योंकि वे आक्रमणकारी न सिर्फ मंदिरों कि अतुल धन संपदा को लूट लेते थे बल्कि उन भव्य मंदिरों व मुर्तियों को भी तोड कर नष्ट कर देते थे । तब मेवाड यहां के पराक्रमी व निर्भीक राजाओं के लिये प्रसिद्ध था । सर्वप्रथम प्रभु द्वारिकाधीश को आसोटिया के समीप देवल मंगरी पर एक छोटे मंदिर में स्थापित किया गया, ततपश्चात उन्हें कांकरोली के ईस भव्य मंदिर में बडे उत्साह पूर्वक लाया गया ।

प्रभु द्वारिकाधीश के रोजाना आठ मुख्य दर्शन होते हैं जिनमें मंगला, शंगार, ग्वाल, राजभोग, उत्थापन, भोग, आरती एवं शयन हैं । कुछ विशेष दर्शन भी होते है, जैसे कृष्ण जन्माष्टमी, दिपावली, होली, अन्नकूट एवं छप्पनभोग आदि । दर्शनों का समय विशेष मनोरथ के दर्शन या अलग अलग मौसम के अनुरुप बदला जाता है, जैसे सर्दियों में भगवान के शयन के  दर्शन जल्दी होते हैं। प्रभु द्वारिकाधीश के मंदिर में ही अन्य दर्शनीय स्थल भी है जेसे मथुराधीश जी, लड्डु गोपाल, परिकृमा, मंदिर का समयसूचक घंटा, मंदिर का बगीचा, पुस्तकालय, तुलसी क्यारा,  मंदिर की ध्वझा व प्रसादघर  आदि । द्वारिकाधीश मदिंर आने वाले दर्शनार्थी राजसमंद झील में नहाने का और नौका की सवारी का भी यहां लुत्फ लेते हैं ।

द्वारिकाधीश प्रभुद्वारिकाधीश मंदिर का एक बडा सा समयसूचक घंटा है जो हर एक घंटे में बजाया जाता है और ईसकी आवाज पुरे नगर में काफी दूर दूर तक सुनाई देती है, प्रभु द्वारिकाधीश मंदिर में ही एक पुस्तकालय भी है जहां बहुत ही पुरानी एवं अमुल्य पुस्तकें हैं । प्रभु द्वारिकाधीश मंदिर का अपना एक बेण्ड भी है जो विशेष दर्शनों, मनोरथों व सवारी आदि के दौरान अपनी मधुर स्वरलहरीयां बिखेरता हैं ।

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विश्व प्रसिद्ध नौ चोकी पाल

December 25th, 2006 · प्रमुख दर्शनीय स्थल, राजसमन्द जिला

राजसमंद के दर्शनीय स्थलों में नौ चोकी का नाम प्रमुख रुप से लिया जाता है । सीधे शब्दों हम यह कह सकते हें कि यहां पर हर कलाकृति नौ के जोड से बनी हुई है । यहां कि विशेशता है कि हर नौ सीढ़ीयों के बाद एक बडी चौकी या चौखटा आता है । यहां पर तीन तोरण बने हुए थे पर रखरखाव के अभाव में अब सिर्फ एक ही साबूत बचा हुआ है, यह तोरण भी नौ पथ्थरों के जोड से ही बना हुआ है । हिन्दु धर्म में नौ अंक का बेहद महत्व है, कहते हें कि नौ ग्रह होते हें, नौ दिन नवरात्री के होते हें, नौ रत्न कि भी अपनी एक अलग पहचान है, अतः यह नौ चोकी भी ईसी परम्परा का निर्वाह करती है। 

यहां तीन छतरीयां हैं जो कि संगमरमर के सफेद पथ्थरों से बनी हुई है और इन पर जो बारीक खुदाई का कार्य किया हुआ है वो वाकई में लाजवाब है । यहां के शिल्प की जितनी तारीफ की जाए वह कम है, छतरीयों के स्तंभ, किनारे और छत आदि पर बेल बुटे, हाथी, घोडे, विभिन्न प्रकार के फूल एवं कृष्ण लीला आदि दर्शाए गए हैं । पथ्थरों पर बहुत ही बारीक खुदाई का कार्य किया हूआ है । बरसात के महिनों में तो यहां का सौन्दर्य और भी निखर उठता है, झुले लगा दिये जाते हैं, सुखिया सोमवार, एवं हरीयाली अमावस्या पर यहां मेला भरता है जहां ग्रामीण व शहरी लोग मेले का आनंद उठाते हैं । गणेश चथुर्ति पर यहीं गणपति कि प्रतिमा का विसर्जन भी किया जाता है ।  यहां पास ही जलदाय विभाग और एजुकेशन डिपार्टमेंट के भी कार्यालय हैं।नौ चोकी पाल पर बना तोरण
अभी अभी नगरपालिका के युवा चेयरमेन के प्रयासों के कारण यहां नौ चोकी की पाल पर लोहे की रेलिंग एवं प्रकाश आदि कि ढ़ंग से व्यवस्था चालू की गई है । ईश्वर कि कृपा से इस बार बरसात की भी अच्छी आवक होने से झील भी पानी से भरी हूई है।

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एशिया की सबसे बडी मार्बल मन्डी राजसमंद

December 20th, 2006 · मार्बल व्यवसाय, राजसमन्द जिला

‌राजसमंद एशिया की सबसे बडी मार्बल मन्डी के नाम से भी विख्यात है । यहां छोटी बडी 3000 मार्बल की खाने हैं जहां खनन होता है और देश विदेशों में निर्यात किया जाता है । मार्बल के अलावा यहां क्वार्टज और फेल्डसफार की भी काफी माईन्स हैं । यहीं पर राजसमंद में ही  R.K.मार्बल्स भी है जो की अपने सर्वाधिक उत्पादन के लिये गिनिज बुक में अपना नाम दर्ज करवा चुका है । यहां के कच्चे माल से ही किशनगढ़, चित्तोडगढ़ व मकराणा में मार्बल व्यवसाय होता है ।

 नेशनल हाईवे 8 जो की ‌राजसमंद से होकर के जाता है,  ईस सडक के दोनो ओर सेंकडो की  संखया में मार्बल गोदाम हैं। यहां राजसमंद में करीब 250 गेंगसा फेक्ट्रियां भी है व अन्य छोटे मोटे कई सारे कटर हैं जहां मार्बल काटा जाता है । यह एक बहूत ही बडी मार्बल मन्डी हे और ईसके कारण आस पास के हजारों लोगों को रोजगार मिला हे । मार्बल के कारण ही यहां पर ट्रार्न्सपोर्ट, हेवी अर्थ मुवर उपकरण, मशीनरी उपकरण, वाहन, फाईनेन्स एवं ए॓से अन्य कई व्यापार संबधी लोगों को भी रोजगार मिला है।

मार्बल के व्यापार हेतू यहां कई सारे लोग दूर दूर से आकर यहां बस गये है ।  ईस प्रकार से यहां कई बडे ग्रुप हैं जो खनन व ईससे संबधित कार्यों में लगे हुए हैं । यहां ‌राजसमंद में कई सारे गांव या कह सकते हें कि माइनिंग एरिया हैं जो अपनी अलग पहचान और विषेशता के कारण विश्वप्रसिद्ध हैं जैसे की उमठी, निजरना, मोरवड, झांझर, उमराया, सापोल धोली खान और तलाई आदि । ‌राजसमंद को काफी लोग ‌राजनगर मन्डी के नाम से भी जानते हें ।

वृहद मार्बल के व्यापार के कारण ‌राजसमंद में वाहन काफी बिकते हैं, और यहां वाहन मेकेनिक लोगों की भी पौ बारह है । उपयुक्त सरकारी नितियों के अभाव में ईस मन्डी का विकास नहीं हो पाया है । ईतनी बडी मार्बल मन्डी होते हुए भी रेलवे परिवहन के अभाव में आज भी यह समूची पहचान नहीं बना पाया है । मार्बल स्लरी, और खनन के लिये खानों पर रोजाना कि ब्लास्टिंग के कारण पर्यावरण का यहां काफी हा्स हो रहा है।

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