Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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धूल के उडते घुबार और हमारा शहर

January 29th, 2012 · नई खबरें

जी हां हमारा प्रिय शहर धूल के ढेर में तब्दील हो चुका है ? शहर वासी इसका खामियाजा भी श्वांस संबंधी परेशानियों की अधिकता के रूप में भुगतने लगे है। वैसे भी मार्बल व अन्य खनिज संबंधित इकाइयो के कारण प्रदूषण तो काफी है ही और अब शहर में धूल से वायु की गुणवत्ता का गिरना वाकई में चिंता का विषय बन चुका है। इसकी मुख्य वजह है ये वाहनों की बढ़ती संख्या, रुडिप के पाइप लाइन के प्रोजेक्ट, बहुत ज्यादा औद्योगिकीकरण और हमारी सुस्त सरकार है। धीरे धीरे शहर की आबोहवा में प्रदूषण के कारण जहर का स्तर बहुत बढ़ रहा है ।

धूल रुपी जहर शहरवासीयों के शरीर मेः

सार की बात यही है कि सडके उजाड दी गई हैं, शहर में पिछले कई समय से सीवरेज पाईप के प्रोजेक्ट चल रहे हैं और पाईपों को सडक के बीच दबा कर यूं ही धूल से ढ़का जा रहा हैं जिससे ये है की यही है कि कांकरोली, राजनगर व आस पास शहर में धूल कणों का घनत्व बहुत बढ़ गया है।

शहर की आबोहवा में घुला जहर (धूल कण) अब शहरवासियों के लिए स्वास्थ्य पर असर डालने लगा है। डॉक्टरों के अनुसार बच्चों से लेकर बड़ों तक में धूल कण की अधिकता के कारण श्वांस और एलर्जी की शिकायतों वाले रोगियों की संख्या बढ़ रही है। टूटी सडक और धूल पर आस पास के व्यापारी च निवासी कुछ कुछ देर से पानी डाल रहे हैं ताकी धूल कम उडे और उन लोगों की दुकानों पर कम जमे | पर सारे प्रयास बेकार हो जा रहे हैं | धूल के कारण लगातार बार बार छींकें आना, नाक में सनसनाहट होने आदि की शिकायतें बढ़ रही हैं। साथ ही इसका सर्वाधिक विपरीत प्रभाव ट्रैफिक पुलिस के जवानों पर देखा गया है | पता नहीं कब फिर से सही सडके होंगी | पर एक उम्मीद ये भी है कि अभी चाहे कितनी ही धूल फांकनी पड जाये पर कुछ रोज बाद आसान सुविधाएं भी जनता को ही मिलने वाली है | 

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आखिर क्यों हम लोग बीमार व विकलांग लोगो की कद्र नहीं करते ?

January 25th, 2012 · उलझन

विकलांग लोगों के साथ सदव्यवहार:

हम अपने आस पास काफी विकलांग लोगो को देखते हैं, बीमार या विकलांग होना कोई गुनाह नहीं है, दुर्घटनाएं किसी के साथ भी हो सकती हैं और बीमार कोई भी हो सकता हैं, फिर चाहे आप हो या हम | पर फिर भी हम रोजाना की जिंदगी में देखते हैं कि विकलांग लोगों को बहुत ही हेय नजर से देखा जाता हैं | मानो किसी बस में यदि कोई विकलांग आदमी या औरत चढ़ उतर रहे होते हैं तो सबको उस समय ही बडी जल्दी मचती हैं | कोई यूं नहीं की एक आध मिनट कम ज्यादा हो गया तो क्या हुआ, आगे जल्दी जा कर भी क्या तीर मार लिया जायेगा |

बीमार विकलांग व इस तरह के लोगों को हमारी हमदर्दी व एहसानों की जरुरत नहीं हैं, जरुरत है तो सिर्फ हमारे स्नेह, प्यार और मित्रवत व्यवहार की | अगर थोडी सी मदद अगर हम कर पायें तो क्या जाता हैं | अभी कुछ समय पहले मेनें ए॓सी ही एक लडकी को देखा जो उसी के स्कूल की हमउम्र आंशिक विकलांग लडकी की खास सहेली हैं | वे दोनो बहुत खास दोस्त हैं और उनमें तालमेल ही कुछ ए॓सा बैठा है कि किसी को कोई कमी नजर नहीं आती | पर सोचो जो भी लोग विकलांग लोगों के साथ सदव्यवहार करते हैं ये बडी तारीफ की बात हैं | काश सभी लोगों के मन में ए॓से भाव आयें |

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प्रसिद्ध रचनाकार कमर मेवाडी जी का परिचय

January 15th, 2012 · शख्सियत

राजसमन्द के प्रसिद्ध रचनाकार  व साहित्यकार कमर मेवाडी :

कमर मेवाडी जी

कमर मेवाडी जी

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मेरी हद

January 11th, 2012 · उलझन

मैं हमेशा से ही अपने हद में रहना पसंद करता हूं, वो हद खर्च करने की हो, चाहे किसी रोजमर्रा के कार्य से जुडी कोई बात हो या कोई और पर अपनी हद में रह कर अपनी हैसियत के मुताबित काम करना ही मेरी नजर में सही है | किसी मशहूर लेखक ने लिखा है कि हर किसी को अपनी हद में रहना चाहिये जैसे की किसी आदमी को सडक पर चलते चलते छडी घुमाने की आदत हैं या उसका ये शौक है पर अगर सडक खाली है तो मजे से घुमाओ पर यदि किसी राह चलते को छडी छूती भी है तो यह उस दूसरे आदमी की आजादी का हनन है | सही मायनों में यह शौक दूसरे के लिये दुविधा है, फफूंद हैं और जी का जंजाल है |

पर जाने क्यों आस पास के ही कुछ लोग, वे ही सब कुछ हैं दुनिया में, कोई दूसरा तो जैसे है कि नहीं | दूसरों की आजादी की कद्र करना भी तो कुछ बात होती है पर नहीं, हम तो लकीर के फकीर हैं, वहीं अपनी धुनी रमायेगें, दुसरों को परेशानी हो तो अपने ठेंगे से |

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कुछ अनमोल विडीयो, जो हमें बीते हुए कल की याद दिलाते हैं

January 7th, 2012 · इतिहास के पन्नो से

हमारा देश भारत हमेशा से ही अनेकता में एकता का संदेश देता रहा हैं, पूरी दुनिया में ए॓सा शायद एक ही देश है हमारा भारत जहां बहुत बहुत सारी विविधताएं है, मसलन भाषा की, खानपान की, संस्कृति की, पहनावे की, सभ्यता की, स्थान की और प्राकर्तिक विविधताएं | यहां हर धर्म को मानने वाले को सम्मान है और को यदि किसी को भी ना माने तो भी कोई बाध्यता नहीं | इस ही एकता, अखन्डता के संदेश को और भी ज्यादा रुप से प्रोत्साहित करने के लिये कुछ विडीयो बनाये गये थे जो डी.डी. यानी दूरदर्शन पर अक्सर आते थे | इन सबके पीछे बडे से संदेश छुपे हुए थे, दुनिया संसार में प्रगतिमान होते भारत के प्रति |

इन अनमोल विडीयो फिल्मों में हम देख सकते हैं कि तब तक के समय में भारत के बेहतरीन महान गायक, नर्तक, संगीतकार, साजिन्दे, खिलाडी, गायक कलाकार आदि नें इनमें अपनी प्रस्तुतियां दी और जाने क्युं ये अनायास ही ये अपने समय के इतने ज्यादा देखे जाने वाले विडीयो बनें | तब 1985 – 2002 तक का वह समय और कौन भूल सकता हैं वो

अनमोल रत्नों को जो दूरदर्शन पर छाये रहते थेः

  • मिले सुर मेरा तुम्हारा
  • सुन सुन सुन मेरे मुन्ने सुन, ‍सारा भारत ये कहे प्यार की गंगा बहे
  • बजे सरगम हर तरफ से, गूंज बनकर देश राग
  • सूरज से चमके हम, स्कूल चलें हम

अतं में जाते जातेः जाने आज की पीढ़ी को क्या हुआ हैं, कोई ए॓सी रचनाएं क्यों नहीं बना पा रहे हैं, जबकि तकनिकी तौर पर हम लोग पहले से काफी उन्नत हो चुके हैं, सारी सुख सुविधाएं अब ज्यादा मिल रही हैं | बीता हुआ समय फिर से नहीं आता हैं पर काश यदि ए॓सा हो सकता, 1985 – 2002 का वह सुनहरा समय फिर से आ जाये | तब तक आप आनंद लिजीये इन यादगार विडीयो का जिन्हे देख कर हमें फख्र होता है की हिन्दुस्तान की माटी में हम जन्में |

मिले सुर मेरा तुम्हारा

देश राग

स्कूल चलें हम

सारा भारत ये कहे प्यार की गंगा बहे

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