राजसमन्द से एक हिंदी वेबसाईट – Rajsamand District of Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

राजसमन्द से एक हिंदी वेबसाईट – Rajsamand District of Rajasthan header image 1

आम लोगो का अंधविश्वास और उस कारण निरिह जानवरो से क्रूर बर्ताव

June 8th, 2011 · उलझन

पता नहीं क्यों लोगबाग अपनेआप को विभीन्न प्रकार के अंधविश्वासों मे झकड लेते हैं | में अपने आस पास के लोगों को देखता हूं और सोचता हुं कि वे इतना अंधविश्वास क्यों कर रहे हैं | खैर………तो कुछ विचार आजकल जानवरों पर हो रहे ना ना प्रकार के जुल्मों के बारे में प्रेषित है !

बडे शहर और अंधविश्वासः
जयपुर सीटी पैलेस से कुछ दूर सामने हमने फुटपाथ के किनारे बैठा एक आदमी नजर आया, उसके पास एक काले रंग का मरियल सा घोडा बंधा हुआ था | वह अपने पास एक काली रंग की सी तख्ती लिये बैठा था और तख्ती पर लिखा थाः काले घोडे की नाल यहां मिलती है | बहुत से लोग होगें जो ये सुन चुके होंगे कि घर के दरवाजे की चौखट पर यदि काले घोडे की नाल लगवा दो तो बुरी नजरों से बचा जा सकता है | वह आदमी हाथोंहाथ अपने घोडे के पैर में से ठुकी हुई नाल निकाल कर अपने सम्माननिय कस्टमर्स को दे रहा था |

कस्टमर को भी शुभ फल मिलने का विश्वास और गारंटी थी, क्योकि घोडे के पैर से हाथों हाथ निकलवा कर जो लाया था | मुझे यह बडा अजीब लगा पर वहां से लोग वह खरीद रहे थे और कुछ देर बाद वह आदमी फिर से अपने घोडे को परेशान करने में लग जाता है दिन भर में वह ना जाने कितने बार अपने घोडे को कष्ट देता होगा | अब इतने बडे शहर में भी अंधविश्वाश के कारण कई लोग मुर्ख बनाये जा रहे थे | फुटपाथों से लोग जाने कैसी कैसी सस्ती दवाईयां, चुर्ण, भस्म ना जाने क्या क्या लेते हैं वह भी सिर्फ सुनी सुनाई बातों या अपने अति अंधविश्वास के कारण |

कस्बों व गांवो की हालतः
यही हाल भालूओं और बंदर वाले मदारियों का है, वे अपने हित के लिये निरीह जानवरों को ना जाने कैसे कैसे नाच नचाते हैं | बहेलिये व सपेरे तो अभी भी छोटे गांव कस्बों मे यदा कदा दिखा जाते हैं | अब सपेरे भी तो सांप नेवले का खेल दिखाते ही थे, अब उस लडाई में कब कौंनसा जानवर घायल हो जाये | पर परेशानी रोजगार की समस्या से भी है, ये लोग यह काम धंधा छोड देंगे तो कुछ और करना भी तो नहीं जानते ना ! सरकार को चाहिये कि हर शहर गावों में इस तरह के लोगों को चिन्हित करके उनके पुनर्वास और रोजगार, शिक्षण आदि की उचित व्यवस्था करे |

सर्कस आदिः
पुराने सिनेमाघरों की तरह ही आजकल सर्कस की हालते भी खराब है, और बडी ही दयनीय है | उन्हे अब जानवर मिलते नहीं, क्योंकि नियम कडे है और दर्शक सर्कस में ये सब ही तो देखने के लिये आते हैं, आदमी के स्टंट और लडकियों के नृत्य तो टी वी में रोजाना देखे जा सकते हैं | तो इसलिये ही सर्कस की स्थितियां नाजुक ही कही जा सकती है | पहले की बात अलग थी, पर अब सर्कस में जानवरों पर जुल्म ना के बराबर होते हैं |

गांवों कस्बों में फिजुल की सवारियां आदिः
सवारियां बडी होनी चाहिये व ठाठ बाट से निकलनी चाहिये आदि भी एक तरह का अंधविश्वास ही है ! गांवों कस्बों में अभी भी छोटी मोटी बात पर फिजुल में सवारियां निकालने और भोज आदि का बडा रिवाज रहता हैं इससे भी जानवरों को खासकर की बग्गी में जुते घोडे, उंट, हाथी आदि को बडे ही कष्ट उठाने ही पडते हैं | सिर्फ किसी ग्रुप विशेष की प्रतिष्ठा या दिखावे के कारण ये आयोजनों में जानवरों का ज्यादा इस्तेमाल करना उचित नही | एक एक रुपये को हाथी जैसा बडा जानवर अपनी सू्ंड से ले कर उपर बैठे पेसे के भूखे खलबुद्धि महावत को बारम्बार दे, ये कहां की इंसानियत है |

पहले की एक्शन फिल्मों के दृश्यः
पहले कि फिल्मों के दृश्य देखें तो पता चलेगा कि दौडते हुये डाकुओं के घोडे गिर रहे हैं और कहीं कही तो पशुबली आदि के दृश्य भी दिख जाते थे | फिल्मों और एडवर्टाइजमेंट्स के लिये तो यह बहुत अच्छा कदम उठाया गया है कि किसी भी फिल्म आदि की शूटिंग के दौरान जानवरों पर क्रूर बर्ताव ना हो, अगर ये होगा तो कठोर नियमों के कारण फिल्म रोक दी जायेगी | यह सुनकर बहुत अच्छा लगा | चलो कुछ तो अच्छी सोच आयी है,मिडिया में |

उल्लूओं का शिकारः
अंधविश्वास और टोने टोटके के आदि के कारण सांप, उल्लूओं आदि को भी बहुतायत में पकडा जाता है ना जाने लोग कैसी सिद्धियां प्राप्त करना चाहते हैं आज के जमाने में ये सिद्धियां प्राप्त करने की बाते बेतुकी सी लगती है | छोटी जगहों पर अभी भी होली के दौरान एहडा खेलने की प्रथा होती है जिसमें सामुहिक शिकार आदि किये जाते हैं ! इसे रोकना भी बडी चुनौती है |

हरियाली और प्रकृति का हा्सः
कंक्रीट के जंगल बडे होते ही जा रहे हैं और इस कारण भी जानवर मारे जा रहे हैं ! अभी कुछ समय पहले ही पढ़ा कि किसी बडे सरकारी सचिवालय कार्यालय के सामने लगे कई सारे पुराने दरख्त सिर्फ सुरक्षा कारणो से काट दिये गये, उन पेडों पर रहने वाले पक्षीयों आदि का क्या हुआ होगा, कल्पना कर जरा | सोचो किसी कारण से ही सही पर मु्सीपालिटी की जेसीबी का पंजा आपके घरों पर चल जाये तो मिनटों में बडी मुश्किल से बनाये गये आशियाने का क्या से क्या हो सकता है |

कुल मिला कर आजकल वैसे भी तो जानवरों की कई प्रजातियां खत्म होने के कगार पर है पर फिर भी हम लोग इन प्राणियों का महत्व नहीं समझ रहे हैं ये गलत है… क्यों हम ये भुल जाते हैं कि इंसान भी पहले एक जानवर ही था |

जानवरों की मदद कर रही संस्थाये जैसे की पेटा, आईडीए इंडिया आदि को बडी मदद मिलनी चाहिये ताकि सही पैसा सही हाथों में जाये और काम आये | साथ ही भारत की एक ए॓सी हेल्पलाईन या आल इंडिया टोल फ्री नंबर भी हो जहां कोई भी जानवरों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ शिकायत लिखवा सके या बीमार जानवरों की मदद हेतु दरखास्त दे सके |

→ अब तक कोई टिप्पणीं नहींटैग्सः ·······

राजसमन्द की ख्यातनाम शख्सियत “कमर मेवाडी जी”

May 31st, 2011 · राजसमन्द जिला, शख्सियत

sambodhan

sambodhan

डा. दुर्गाप्रसाद जी जो “जोगलिखी” के नाम से ब्लाग चलाते हैं, उनकी टिप्पणी नें वाकई में मुझे सोचने के लिए मजबूर कर दिया की, आखिर एसा कैसे हो गया की में अब तक में इस राजसमन्द की साईट पर राजसमन्द की ही एक ख्यातनाम शख्सियत “कमर मेवाडी जी” का उल्लेख करना कैसे भूल गया ।

तो जानिए कुछ राजसमन्द की ख्यातनाम शख्सियत “कमर मेवाडी जी” के बारे में । कमर मेवाडी जी एक उम्रदराज साहित्यिक प्रतिभावान व्यक्ती है, और इनका जन्म 11 जुलाई सन् 1939 को कांकरोली में ही हुआ ! शुरुआती पढ़ाई के बाद पेशे से शिक्षक रहे | राजसमन्द ज़िले में रहते हुए भी हिन्दी साहित्य से काफी लम्बे अरसे से जुडे हुए है ।

कमर जी लगभग चार दशक से एक साहित्यिक पत्रिका ‘सम्बोधन’ को अपना अनुठा योगदान देते हैं। अभी कुछ समय पुर्व ही इस पत्रिका को देश के बहुत उंचे स्तर के साहित्यिक सम्मान से भी नवाजा गया है, इस बार का जिक्र किसी ब्लाग में भी देखा था पर अभी वह ढ़ुंढ़ने पर भी नहीं मिला है |

बी.बी.सी. हिन्दी पर भी एक दफा उनके साहित्य में योगदान के बारे में छपा था । कमर मेवाडी जी की हर बात कुछ अलग है, अधिकतर वे सफारी सूट पहनते हैं, और हर कहीं आते जाते नहीं हैं। बोली और व्यवहार में सच्चे, सीधे कमर जी साहित्यिक परिचर्चाओं मे बढ़ चढ़ कर भाग लेते हैं । उनका लेखन अनूठा है । कमर जी को उनके साहित्यिक योगदान के लिए जिला, राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर बहुत बार पुरस्कारों से नवाजा गया है ।

उनकी रचनायेः
तरूण साहित्य संगम
राजसमंद री थापना
विद्रोही री आंधी नावं री पोथी
जय बंगला देस और राजस्थान के शिक्षा विभाग मे उनकी कविताएं छपी !
सम्बोधन एक त्रेमासिक पत्रिका है और इसका मूल्य है 20/- रुपये मात्र | जिसके एडीटर है कमर मेवाडी जी | उनकी ये विशेष पत्रिका सम्बोधन आप भी प्राप्त कर सकते है ! उनको इमेल किजीये या सीधे फोन करने आग्रह करे !

फोन : 02952-223221, 09829161342
इमेल : qamar.mewari@rediffmail.com

→ 5 टिप्पणींयांटैग्सः ·········

भगवान को भी नशीले पदार्थ पसंद है, क्यों ?

May 26th, 2011 · उलझन

आज इंसान किसी ना किसी नशे में जकडा हुआ है, और चाहते हुए भी छोडता नहीं या फिर कुछ लोग छोडना भी नहीं चाहते ! क्यों कि आदमी मन पक्का कर ले तो कुछ भी हो सकता है बस जरुरत है तो

liquors

liquors

दृढ़ निश्चय की ! तो ये आदमी आखिर ये नशे वशे के चक्कर में पडा कैसे !

कई बार में अपने आस पास देखता हूं और पाता हुं कि भगवान को भी नशीले पदार्थ पसंद थे, एसा क्यों ? यह विचार मेने मन में कई बार आता है पर आखिर कुछ जानकारी मेनें जुटा ही ली इस बारे में ! तो प्रस्तुत है !

इन्द्र आदि देवताः
पढ़ने में आता है कि इन्द्र आदि देवता व्यसनी थे, और वे हमेशा आमोद प्रमोद में ही तल्लीन रहते थे, तभी असुरों नें भी उन पर युद्ध से विजय करने की ठानी ! सुन्दर अप्सराएं और सुरा आदि उनके खास शौक में से थे ! रंभा, मेनका और उर्वषी आदि अप्सराओं की उस जमाने में भला क्या जरुरते थी, राजा थे तो लाईन से लाईन चलते और सद्कार्य करते ताकि कुछ अच्छी मिसाल बनती !

भगवान शिव जीः
कहते हैं कि समुद्र मंथन के दौरान निकला विष भी भगवान शिव ने पी लिया था ताकि दुसरो पर आंच ना आये ! पर भगवान शिव भी भांग और धतुरा आदि नशीले पेय पसंद करते थे और आज भी हर शिव मंदिर में भांग को प्रसाद माना जाता है लोग बडे चाव से इसका सेवन करते हैं, अपने आप को महान शिव भक्त मानते हैं ! हो सकता है कि कम मात्रा में लेने पर ये भांग से भी शरीर को कई तरह से फायदा पहुंचता हो पर नशा तो नशा ही है ना ! कालभैरव मंदिर में तो भगवान शिव को शराब का भोग लगाया जाता है और लोगों की मान्यता भी है कि शिवजी यह ग्रहण करते हैं और प्रसाद चढ़ाते वक्त बोतल में से शराब कम होती देखी जा सकती है !

माता जीः
हिन्दुओ में देवी मां पूज्जनीय है और उनका नवरात्री प्रमुख उत्सव होता है ! पर उनके भक्त बहानेबाज है, अक्सर प्रसादियों आदि में शराब का सेवन किया जाता है ! बल्कि ये भी कह सकते हैं कि शराब के शौकिन लोग ही कुछ लोगों में अपना प्रभाव जमाने मात्र के लिये और बताने के लिये की हम कितने सक्षम है, किसी कार्य के सिद्ध हो जाने पर मन्नत को पुरा करते हैं, और पार्टी की शक्ल में प्रसादियां आदि करते हैं ! फिर ये भी है कि जो लोग शराब आदि पीये हुए हैं वे संयम पूरा रखते हैं ! वे मंदिर में नहीं जाते बाहर से ही प्रणाम करते हैं, या फिर पीने से पहले दर्शन कर लेते हैं ताकि देवी मां के कोप से बचा जा सके !

राजस्थान में धार्मिक मेलों मेः
राजस्थान मेलों का राज्य है ! कई तरह के मेले यहां हर साल लगते है ‌और जिनमें से रमदेवरा भी एक है ! यह भी देखा जाता है कि धार्मिक मेलों मे लोग पदयात्राये करते है और मन्नत आदि के पुरी होने की आशा में कई किलोमीटर पैदल चलते हैं कुछ लोटते हैं और कई लोग साईकिल यात्रायें करते हैं ! पर जैसे ही गन्तव्य स्थान पर पहुंचे नहीं कि फिर जैसे अनुशासन कहीं खो जाता है और फिर वे नशे में गिरफ्तार हो जाते हैं, इस तरह के कई लोगों मेले में या सडकों पर नशे की हालत में लडाईयां या उल जुलुल हरकते करते हुए देखा जा सकता है ! आखिर वे ये सब क्या कर रहे हैं अपनी थकान मिटा रहें है या फिर वाकई में वे भक्तिभाव से परिपूर्ण है !

लोकल गांवो के भेरु जी देवरों मेः
आस पास के गांवो में जहां ग्रामीण लोगों की आस्था लोकल भगवान भेरु जी आदि में बहुत होती है वहां मंदिर को देवरे कहा जाता है और कहते है कि यहां दर्शन करने, प्रसाद ग्रहण करने आदि से सारे आने वाले के सारे कष्ट दूर होते हैं ! पर मंदिर तो पवित्र स्थान है ना यहां के प्रांगण में भी कई ग्रामीण लोगों को बीडीयां फुंकते हुए देखा जा सकता है ! कहीं कहीं तो अमल महाप्रसाद यानी अफिम का पानी भी बडी मनुहार करके एक दूसरे को पिलाया जाता है ! क्या अफिम में नशा नहीं होता !

पता नहीं क्यों हजारों लाखों लोग ना ना प्रकार के नशे की समस्याओ से ग्रस्त है, हर कोई गुटखे, पान, पान मसाला, सिगरेट, शराब, भांग, अफिम और ना जाने क्या क्या ! जाने कब ये दुनिया इन सब नशीली वस्तुओं से मुक्त होगी ! कहते है कि पीने वालों को पीने का बहाना चाहिये, क्या सही नहीं है ये ! जब हमारे समाज में देवी देवता भी इन ना ना प्रकार के नशों से अछुते नहीं रहा पाये तो इंसान क्या खाक दूर रह सकता है, ये बडा ही शोचनीय प्रश्न है !

→ 2 टिप्पणींयांटैग्सः ········

जय बाबा रामदेव

May 6th, 2011 · उलझन

अचानक कुछ ही सालों में बाबा रामदेव ने जाने कैसा मन्तर फूंका की पुरे भारतवर्ष के लोग उनके दीवाने हो गये ! ए॓सा क्या हुआ कि रमता जोगी हजार करोडो रुपयों में खेलने लगा !  योग और प्राणायाम करने कराने के लिये तो ऋषि मुनि सदियों से कहते आ रहे हैं पर इस विधा की मार्केटिंग रामदेव जी महाराज नें ए॓सी कि है कि बस ! शहर के शहर पोस्टरों से रंग दिये जाते हैं जहां उनके जाने का प्रोग्राम तय होता है ! उनके ही एक कम्पिटिटव साधु महाराज तो साफ कहते हैं कि रामदेव जी एडवर्टिजमेंट पर धन का एक हुत बडा हिस्सा सालाना खर्च करते हैं ! अगर सही है तो व्यापारी ही हुए॓ ना वे कहां के बाबा रहे ! टीं.वी. एंकर जब मुस्कुरा कर पुछती है तो वे कहते हैं कि सालाना हमारा टर्नओवर करोडों रुपये का होता है और वे  कहते हैं कि बाजार भाव से हमारे प्राडक्ट सस्ते व अच्छे क्वालिटी के हैं !

बाबा की योग और प्राणायाम विधियां टी. वी. पर बडी प्रसिद्ध हैं ! चौतरफा उनकी जय जयकार हो रही है ! अब तो हर जिले स्तर पर पतंजलि की यानी बाबा रामदेव की दुकाने खुल गई हैं ! लोग रामदेव जी की टीम के मेम्बर बन कर सेवा और मेवा दोंनों कूट रहे हैं ! सारा माल टुथपेस्ट हो या शेम्पू या फिर कोई दवाई या गोलियां सब कुछ एम. आर. पी. पर धडल्ले से बिकता है ! किसी भी वस्तु कि एम. आर. पी. रेट से कम देने का आग्रह करने का हर उपभोक्ता रखता है और ये बात “जागो ग्राहक जागो” वाले भी कहते है ! पर रामदेव जी कि दुकान वाले दुकानदार महाशय से एम. आर. पी. से कुछ कम कह कर देख लिजिये, भडक उठेंगें !

टी.वी. पत्र पत्रिकायें सब तरफ उनका ही चर्चा है ! चमत्कार है ये तो ! हम सबकी अपनी अपनी शैली है अभिव्यक्ती कि और बाबाजी की तो बहुत ही ग्रेट है ! चीख चीख कर और बारम्बार कहने से उन बातों का सुनने वाले के मन पर असर तो पडता ही है ! और हर चीज को करने के अपने सही ढ़ंग है सो योगा के भी अपने कायदे है, पर आजकल जिसे देखो वही ये ही धुनी रमा रहा है ! इसकी अति होने से घर पर बच्चे भी हर कैसे ही फां फूं कर रहे हैं जो कि गलत तो है हि और स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डालने वाला है ! अभी कुछ रोज पहले समाचार में सुना कि लौकी का ज्युस पीने से एक आदमी मरा क्योंकि जो लौंकी का वे ज्युस पी रहे थे वह कीटनाशक व इंजेक्शन आदि के कारण जहरीली हो चुकी थी ! तो किसी चीज वस्तु या क्रिया का अंधानुकरण करना गलत है !

पर फिर भी बाबा रामदेव प्रशंसा के पात्र है क्यो कि थोडा या बहुत पर कुछ तो योगदान है ही उनका स्वस्थ भारत के निर्माण में ! उनके कहने से लोग सुबह जल्दी उठ कर कुछ तो व्यायाम कर रहे हैं जो कि फायदेमंद है !

→ 6 टिप्पणींयांटैग्सः ······

राजसमन्द में अब हेलमेट पहनना अनिवार्य

April 15th, 2011 · नई खबरें

हेलमेट पहनना अनिवार्य

हेलमेट पहनना अनिवार्य

हां जी सही सुना, महानगरों की ही तर्ज पर राजसमन्द में भी अब हेलमेट पहनना अनिवार्य हो चुका है ! अबकी बार परिवहन विभाग ने भी ठानी है कि सबको हेलमेट पहिना के ही छोडेंगें ! वैसे सही भी है सबसे ज्यादा दुर्घटना से मौत सिर पर चोट लगने के कारण ही होती है और इसको रोकने के लिये हेलमेट पहनने से अच्छी कोई चीज भी नहीं है !

वैसे हेलमेट पहनने पर चालक की आंखों में ना तो कचरा जाता है ना चेहरे पर हवा लगने से स्कीन प्रोबलम्स होती हैं और ना ही हवा से बालों के डेमेज होने का खतरा है ! और तो और कहीं लम्बी यात्रा करनी पडे तो भी बंदा फ्रेश ही रहता है !

हेलमेट पहनने पर कार जैसा ही महसुस होता है यानी कुल मिला कर मुनाफे का ही सौदा है ! कोई नुकसान नहीं ! हां पर अब गर्मी के मौसम में पसीने की समस्या जरुर हो सकती है !

पिछले सडक सुरक्षा सप्ताहों के जैसा ये अब नही है जो कि सिर्फ सात दिनों के लिये कर के छोड दिया जाए ! अब आम दिन हो या खास सभी हेलमेट पहन रहे हैं ! कोई चाचा, कहीं लडकियां, कहीं बुजुर्ग, कोई बच्चे सब एक ही हेलमेटी रंग में रंगे हुये नजर आ रहे हैं ! और ट्रेफिक वाले किसी कि भी नहीं सुन रहे हैं, ना कोई फोन से बात, ना किसी का जेक, सीधे जलचक्की पर चालान ! अब इसही बात का एक व्य्ग्यात्मक पुट ये भी है कि नगरपालिका की सडकों पर तो हजारों गड्ढ़े हैं जिससे आम आदमी स्पीड से जा नहीं सकते हां कोई नवयुवक अल्सर पल्सर से जरुर स्टंट बताते हुए गाडीयां भगाते है ! अब कोई स्पीड पे नहीं चलता तो एक्सीडेंट होने के भी चांस शून्य हैं ! पर नहीं हेलमेट तो पहनना ही होगा !
पर फिर भीः

“हेलमेट है सुरक्षा नहीं है ये बोझ,
लगालो अभी से, नही तो चालान बनेंगे रोज”

→ अब तक कोई टिप्पणीं नहींटैग्सः ····