Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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माधव नागदा एक बेहतरीन कवि और लेखक

April 2nd, 2012 · शख्सियत

लेखक और कवि माधव नागदा :

माधव नागदा एक बहुत ही उम्दा लेखक व कवि हैं जो कि राजसमंद के नाथद्धारा शहर में रहते हैं | अपने पेशे से ये व्याख्याता है | माधव जी की लेखन शैली बडी ही आकर्षक हैं ‌‌साथ ही ये अपने ब्लाग में भी लिखते हैं, वहां आप उनसे संबंधित बहुत सारी रचनाएं व लेख प्रप्त कर सकते हैं | छोटी छोटी लघु पर जीवन के विभिन्न भावों का सजीव चित्रण करती इनकी रचनाएं आप जरुर पढ़िये, बहुत गजब की लेखन शक्ति हैं इनकी |

राजस्थानी ‌और हिन्दी भाषा में ये लिखते हैं व काफी सारी पत्र-पत्रिकाओं में इनकी रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं | ‘उसका दर्द’, ‘शाप मुक्ति’, ‘अकाल और खुशबू’, ‘आग’,पहचान, ‘उजास’, ‘सोनेरी पांखा वाळी तितलियाँ ‘, “उसका दर्द” और “ठहरा हुआ वक्त” जैसी जोरदार रचनाएं आपने लिखी हैं जो कि अपने आप में बेजोड रचनाएं हैं | इन्हें अपने लेखन के लिये राजस्थान की साहित्य अकादमी से पुरस्कृत भी किया गया है |

माधव जी के बलाग का पता हैः  http://madhavnagda.blogspot.in/

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धूल के उडते घुबार और हमारा शहर

January 29th, 2012 · नई खबरें

जी हां हमारा प्रिय शहर धूल के ढेर में तब्दील हो चुका है ? शहर वासी इसका खामियाजा भी श्वांस संबंधी परेशानियों की अधिकता के रूप में भुगतने लगे है। वैसे भी मार्बल व अन्य खनिज संबंधित इकाइयो के कारण प्रदूषण तो काफी है ही और अब शहर में धूल से वायु की गुणवत्ता का गिरना वाकई में चिंता का विषय बन चुका है। इसकी मुख्य वजह है ये वाहनों की बढ़ती संख्या, रुडिप के पाइप लाइन के प्रोजेक्ट, बहुत ज्यादा औद्योगिकीकरण और हमारी सुस्त सरकार है। धीरे धीरे शहर की आबोहवा में प्रदूषण के कारण जहर का स्तर बहुत बढ़ रहा है ।

धूल रुपी जहर शहरवासीयों के शरीर मेः

सार की बात यही है कि सडके उजाड दी गई हैं, शहर में पिछले कई समय से सीवरेज पाईप के प्रोजेक्ट चल रहे हैं और पाईपों को सडक के बीच दबा कर यूं ही धूल से ढ़का जा रहा हैं जिससे ये है की यही है कि कांकरोली, राजनगर व आस पास शहर में धूल कणों का घनत्व बहुत बढ़ गया है।

शहर की आबोहवा में घुला जहर (धूल कण) अब शहरवासियों के लिए स्वास्थ्य पर असर डालने लगा है। डॉक्टरों के अनुसार बच्चों से लेकर बड़ों तक में धूल कण की अधिकता के कारण श्वांस और एलर्जी की शिकायतों वाले रोगियों की संख्या बढ़ रही है। टूटी सडक और धूल पर आस पास के व्यापारी च निवासी कुछ कुछ देर से पानी डाल रहे हैं ताकी धूल कम उडे और उन लोगों की दुकानों पर कम जमे | पर सारे प्रयास बेकार हो जा रहे हैं | धूल के कारण लगातार बार बार छींकें आना, नाक में सनसनाहट होने आदि की शिकायतें बढ़ रही हैं। साथ ही इसका सर्वाधिक विपरीत प्रभाव ट्रैफिक पुलिस के जवानों पर देखा गया है | पता नहीं कब फिर से सही सडके होंगी | पर एक उम्मीद ये भी है कि अभी चाहे कितनी ही धूल फांकनी पड जाये पर कुछ रोज बाद आसान सुविधाएं भी जनता को ही मिलने वाली है | 

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आखिर क्यों हम लोग बीमार व विकलांग लोगो की कद्र नहीं करते ?

January 25th, 2012 · उलझन

विकलांग लोगों के साथ सदव्यवहार:

हम अपने आस पास काफी विकलांग लोगो को देखते हैं, बीमार या विकलांग होना कोई गुनाह नहीं है, दुर्घटनाएं किसी के साथ भी हो सकती हैं और बीमार कोई भी हो सकता हैं, फिर चाहे आप हो या हम | पर फिर भी हम रोजाना की जिंदगी में देखते हैं कि विकलांग लोगों को बहुत ही हेय नजर से देखा जाता हैं | मानो किसी बस में यदि कोई विकलांग आदमी या औरत चढ़ उतर रहे होते हैं तो सबको उस समय ही बडी जल्दी मचती हैं | कोई यूं नहीं की एक आध मिनट कम ज्यादा हो गया तो क्या हुआ, आगे जल्दी जा कर भी क्या तीर मार लिया जायेगा |

बीमार विकलांग व इस तरह के लोगों को हमारी हमदर्दी व एहसानों की जरुरत नहीं हैं, जरुरत है तो सिर्फ हमारे स्नेह, प्यार और मित्रवत व्यवहार की | अगर थोडी सी मदद अगर हम कर पायें तो क्या जाता हैं | अभी कुछ समय पहले मेनें ए॓सी ही एक लडकी को देखा जो उसी के स्कूल की हमउम्र आंशिक विकलांग लडकी की खास सहेली हैं | वे दोनो बहुत खास दोस्त हैं और उनमें तालमेल ही कुछ ए॓सा बैठा है कि किसी को कोई कमी नजर नहीं आती | पर सोचो जो भी लोग विकलांग लोगों के साथ सदव्यवहार करते हैं ये बडी तारीफ की बात हैं | काश सभी लोगों के मन में ए॓से भाव आयें |

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प्रसिद्ध रचनाकार कमर मेवाडी जी का परिचय

January 15th, 2012 · शख्सियत

राजसमन्द के प्रसिद्ध रचनाकार  व साहित्यकार कमर मेवाडी :

कमर मेवाडी जी

कमर मेवाडी जी

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मेरी हद

January 11th, 2012 · उलझन

मैं हमेशा से ही अपने हद में रहना पसंद करता हूं, वो हद खर्च करने की हो, चाहे किसी रोजमर्रा के कार्य से जुडी कोई बात हो या कोई और पर अपनी हद में रह कर अपनी हैसियत के मुताबित काम करना ही मेरी नजर में सही है | किसी मशहूर लेखक ने लिखा है कि हर किसी को अपनी हद में रहना चाहिये जैसे की किसी आदमी को सडक पर चलते चलते छडी घुमाने की आदत हैं या उसका ये शौक है पर अगर सडक खाली है तो मजे से घुमाओ पर यदि किसी राह चलते को छडी छूती भी है तो यह उस दूसरे आदमी की आजादी का हनन है | सही मायनों में यह शौक दूसरे के लिये दुविधा है, फफूंद हैं और जी का जंजाल है |

पर जाने क्यों आस पास के ही कुछ लोग, वे ही सब कुछ हैं दुनिया में, कोई दूसरा तो जैसे है कि नहीं | दूसरों की आजादी की कद्र करना भी तो कुछ बात होती है पर नहीं, हम तो लकीर के फकीर हैं, वहीं अपनी धुनी रमायेगें, दुसरों को परेशानी हो तो अपने ठेंगे से |

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