Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

Rajsamand District, Rajasthan header image 2

हर किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता

April 11th, 2007 · 2 टिप्पणीयां · उलझन, राजसमन्द जिला

हमारा एक परम मित्र चाहता है कि वो फिर से एक बार देस की मिट्टी की खुशबु को महसुस करे, छोटा गांव जैसा दिखने वाला शहर ही सही पर है तो यह अपना, बचपन से लेकर अब तक कई सारी सेंकडों यादे जुडी हुई है इस छोटे से शहर से, स्कुल की, साथीयों की दोस्तों की । सारे सुख दुख यहीं तो देखे थे अपनी ही आंखों से। पर अफसोस रोटी के लिये मिट्टी से दुर होना भी तो उसकी मजबुरी है।

वो आना चाहता है वापस, दौडना चाहता है अपने खेतों की खुली जमीन में, झम कर हुई बारिश के बाद मिट्टी की सोंधी सोंधी खुशबु को फिर से अपने आप में रचा बसा लेना चाहता है, पर मजबुरी यह है कि अब जिन्दगी के ईस पडाव पर आकर बडे शहर में जमे जमाए अपने कारोबार को भी नहीं छोड सकता । सालों की मेहनत से अब जाकर बढ़ते हुए अपने व्यापार को एसे किसी भी हाल में घटते हुए नही देख सकता।

वो किसी प्रसिद्ध शायर नें कहा है ना कि -‍

हर किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता ।
किसी को जमीं तो किसी को आसमां नहीं मिलता ।।

जो जमीन पर है उसे उंचाइयां अच्छी लगती है व वह किसी भी हाल में अपने आप को उस स्तर पर पहुंचा देखना चाहता है जिसके बारे में वह सोचता है या सपने देखता है। दुसरी ओर चंद लोग ए॓से भी हैं जो उन्नति के शिखर को पा चुके है पर अपनी जमीन चाहते है, शहर की तडक भडक से दुर वे गांवो सी सादगी व सौम्यता चाहते हैं, चाहते हैं कि काश ये फोन, मोबाईल, इमेल, टी.वी., इन्टरनेट व तमाम इस तरह की व्यस्तता से कुछ दिन के लिये छुटकारा मिल जाए, पर उन्हें भी ये सब नहीं मिल पाता, सुना है कि दुनिया में स्वर्ग यहीं है व नर्क भी यहीं है तो कहीं एसा तो नहीं कि ईस तरह हर कोई अपने अपने हिस्से का नर्क भोग रहा हैं ।

कभी कभी सोचता हुं काश कुछ एसा हो कि जो सोचो वह हो जाए। दुनिया में ए॓से बहुत सारे लोग हैं जो मस्त मौला है व स्वभाव से काफी अच्छे हैं पर यह यह दाल रोटी का चक्कर ही एसा है कि कोई इससे निकल ही नही पाता । सबको 10 है तो 20 चाहिये और 20 है तो 40 पर क्या संतोष धन भी तो कुछ है कि नहीं । सब भाग रहे हैं अपनी अपनी कतार में, हर कोई अपने प्रतिद्वंदी से काफी आगे निकल जाना चहता है पर भगवान जाने यह दौड कब जाकर खत्म होगी………

टैग्सः ····

2 टिप्पणीयां ↓

  • सागर चन्द नाहर

    सच कहते हैं आप, मुझे भी उस मुकम्मल जहाँ की तलाश है।

  • श्रीश शर्मा 'ई-पंडित'

    बिल्कुल सत्य कहा आपने। यहाँ वाले सोचते हैं बाहर वाले सुखी और बाहर वाले सोचते हैं यहाँ वाले सुखी।

अपनी टिप्पणी करें, आपकी टिप्पणीयां हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण हैं, आप हिन्दी या अंग्रेजी में अपनी टिप्पणी दे सकते हैं, साथ ही आप इस वेबसाईट पर और क्या क्या देखना चाहेंगे, अपने सुझाव हमें दें, धन्यवाद