Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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भगवान सब देख रहा है !

April 4th, 2008 · 2 टिप्पणीयां · नई खबरें, राजसमन्द जिला

पिछले दो तीन दिन से अप्रेल के महिने में बेमौसम की जोरदार बारिश और धूल भरी आंधीयों से यह तो साबित हो ही गया है कि भगवान सब देख रहा है ! कुछ तीन चार महिने पहले कि बात ही थी कि राजसमन्द के आस पास के गांव वाले किसान वगेरह लोगों ने सिंचाई हेतु उचित पानी दिये जाने के बावजुद भी एक और पाणेत (सिंचाई) की मांग की थी । और नगरपालिका प्रशासन के ना मानने ले बावजूद किसान लोगों के द्वारा हाथों में गेंती, फावडे, कूंट, लट्ठ आदि हथियारों सहित शहर को बन्द करवाने का आव्हान किया गया था । शहर बन्द करवाया भी गया, और लडाईयां भी हुई ।

प्रशासन व राजसमन्द के स्थानिय निवासियों के सामने उनका विद्रोह सिर्फ पानी के लिए था, वहीं पर राजसमन्द के स्थानिय निवासी यह चाहते थे कि उचित पानी झील में ही रहे ताकि झील का सौन्दर्य बना रहे साथ ही स्थानिय पानी कि आपुर्ती में भी व्यवधान ना हो पर …..

अब उन लोगों की फसल पक कर एकदम तैयार खडी थी, बस कटाई ही बाकी थी कि उपर वाले ने भी एसा चक्कर चलाया कि उन लोगों को रुपये की अठ्न्नी भी नहीं मिल पा रही है । इसी लिये कहते हैं कि भगवान सब देख रहा है, किसी का सिर्फ और सिर्फ अपने ही स्वार्थ के लिए सोचना या कार्य करना कभी कभी गलत भी पड जाता है !

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2 टिप्पणीयां ↓

  • Brijmohanshrivastava

    आपने पुराने गाने ” आसमा पे है ख़ुद और जमीन पे हम -आजकल वो इस तरफ देखता है कम – के विपरीत लेख लिखा है खैर
    यह तो बताइए की १६ अप्रिल के बाद आपका कौनसा व्यंग्य प्रकाशित हुआ है

  • Deepak Kumar Verma

    महाप्रलय के पश्चात् भगवान योग निद्रा में लीन हो जाते हैं| अनन्तकाल के पश्चात योग निद्रा से जागने पर पुनः श्रृष्टि की रचना करने हेतु महातत्वों के योग से दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच भूतों से युक्त पुरुष रूप ग्रहण करते हैं| उनकी नाभि से एक कमल प्रकट होकर क्षीर सागर से ऊपर आता है और उस कमल से ब्रह्मा की उत्पत्ति होती है| क्षीरशायी भगवान का विराट रूप होता है| उस विराट रूप के सहस्त्रों सिर, सहस्त्रों कर्ण, सहस्त्रों नासिकाएँ, सहस्त्रों मुख, सहस्त्रों भुजाएँ तथा सहस्त्रों जंघायें होती हैं| वे सहस्त्रों मुकुट, कुण्डल, वस्त्र और आयुधों से युक्त होते हैं| उस विराट रूप में समस्त लोक ब्रह्माण्ड आदि व्याप्त रहते हैं, उसी के अंशों से समस्त प्राणियों की श्रृष्टि होती है तथा योगीजन उसी विराट रूप का अपनी दिव्य दृष्टि से दर्शन करते हैं|
    भगवान का यही विराट स्वरूप भक्तों की रक्षा और दुष्टों के दमन के उद्देश्य से बार-बार अवतार लेते हैं|
    धर्म हेतु प्रभू लें अवतारा| प्रगटें भू पर बारम्बारा॥ भक्तन हित अवतरत गोसाईं| तारें दुष्ट व्याध की नाईं॥
    * भगवान ने कौमारसर्ग में सनक, सनन्दन, सनातन तथा सनत्कुमार ब्रह्मऋषियों का अवतार लिया| यह उनका पहला अवतार था|
    * पृथ्वी को रसातल से लाने के लिये भगवान ने दूसरी बार वाराह का अवतार लिया|
    * तीसरी बार ऋषियों को साश्वततंत्र, जिसे कि नारद पाँचरात्र भी कहते हैं और जिसमें कर्म बन्धनों से मुक्त होने का निरूपन है, का उपदेश देने के लिये नारद जी के रूप में अवतार लिया|
    * धर्म की पत्नी मूर्ति देवी के गर्भ से नारायण, जिन्होंने बदरीवन में जाकर घोर तपस्या की, का अवतरण हुआ| यह भगवान का चौथा अवतार है|
    * पाँचवाँ अवतार माता देवहूति के गर्भ से कपिल मुनि का हुआ जिन्होंने अपनी माता को सांख्य शास्त्र का उपदेश दिया|
    * छठवें अवतार में अनुसुइया के गर्भ से दत्तात्रयेय प्रगट हुये जिन्होंने प्रह्लाद, अलर्क आदि को ब्रह्मज्ञान दिया|
    * सातवीं बार आकूति के गर्भ से यज्ञ नाम से अवतार धारण किया|
    * नाभिराजा की पत्नी मेरु देवी के गर्भ से ऋषभदेव के नाम से भगवान का आठवाँ अवतार हुआ| उन्होंने परमहँसी का उत्तम मार्ग का निरूपण किया|
    * नवीं बार राजा पृथु के रूप में भगवान ने अवतार लिया और गौरूपिणी पृथ्वी से अनेक औषधियों, रत्नों तथा अन्नों का दोहन किया|
    * चाक्षुषमन्वन्तर में सम्पूर्ण पृथ्वी के जलमग्न हो जाने पर पृथ्वी को नौका बना कर वैवश्वत मनु की रक्षा करने हेतु दसवीं बार भगवान ने मत्स्यावतार लिया|
    * समुद्र मंथन के समय देवता तथा असुरों की सहायता करने के लिये ग्यारहवीं बार भगवान ने कच्छप के रूप में अवतार लिया|
    * बारहवाँ अवतार भगवान ने धन्वन्तरि के नाम से लिया जिन्होंने समुद्र से अमृत का घट निकाल कर देवताओं को दिया|
    * मोहिनी का रूप धारण कर देवताओं को अमृत पिलाने के लिये भगवान ने तेरहवाँ अवतार लिया|
    * चौदहवाँ अवतार भगवान का नृसिंह के रूप में हुआ जिन्होंने हिरण्यकश्यपु दैत्य को मार कर प्रह्लाद की रक्षा की|
    * दैत्य बलि को पाताल भेज कर देवराज इन्द्र को स्वर्ग का राज्य प्रदान करने हेतु पन्द्रहवीं बार भगवान ने वामन के रूप में अवतार लिया|
    * अभिमानी क्षत्रिय राजाओं का इक्कीस बार विनाश करने के लिये सोलहवीं बार परशुराम के रूप में अवतार लिया|
    * सत्रहवीं बार पाराशर जी के द्वारा सत्यवती के गर्भ से भगवान ने वेदव्यास के रूप में अवतार धारण किया जिन्होंने वेदों का विभाजन कर के अने उत्तम ग्रन्थों का निर्माण किया|
    * राम के रूप में भगवान ने अठारहवीं बार अवतार ले कर रावण के अत्याचार से विप्रों, धेनुओं, देवताओं और संतों की रक्षा की|
    * उन्नसवीं बार भगवान ने सम्पूर्ण कलाओं से युक्त कृष्ण के रूप में अवतार लिया|
    * बुद्ध के रूप में भगवान का बीसवाँ अवतार हुआ|
    * कलियुग के अन्त में इक्कीसवीं बार विष्णु यश नामक ब्राह्मण के घर भगवान का कल्कि अवतार होगा|
    जब जब दुष्टों का भार पृथ्वी पर बढ़ता है और धर्म की हानि होती है तब तब पापियों का संहार करके भक्तों की रक्षा करने के लिये भगवान अपने अंशावतारों व पूर्णावतारों से पृथ्वी पर शरीर धारण करते हैं|

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