Rajsamand District, Rajasthan

राजसमन्द जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल, ए॓तिहासिक पर्यटन स्थल, मंदिर, किले, मुख्य त्योहार एवं व्यवसाय आदि की विस्तृत जानकारी, साथ ही हर घटना को देखने का लेखक का अपना व्यक्तीगत व्यंग्यात्मक नजरिया आज की इस तिरछी दुनिया के सन्दर्भ में…

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हमारा वो कार ड्राइविंग सीखना

February 18th, 2007 · अब तक कोई टिप्पणी नहीं की गई · तकनिकी, राजसमन्द जिला

आज यूं ही बातों बातों में वो कार चलाना सीखने के दौरान हुए अच्छे अनुभव की बात निकल पडी । अभी कुछ ही समय पुर्व हमने हमारे राजसमन्द के भारत मोटर ड्राईविंग स्कुल वाले पंवार साहब के सानिध्य में अपने छुटके भैया सहित मारुती कार चलाना सीखा। अब हमारे घर तो कार नहीं है जो हम भी अपने शौक पुरे कर सकें पर मन की इच्छा को जैसे हमने तो दबाना कभी सीखा ही नहीं । एक दिन सुबह गार्डन भ्रमण के दौरान ही हमने विचार बनाया की अब तो कार चलाना सीख ही लिया जाए, फिर सोचा अब एक दो दिन में कार ड्राईविंग स्कुल वाले महाशय से बात करेंगे व फिर चालू करते हैं पर उस दिन हुआ क्या कि रास्ते में हमें वो पंवार साहब अपनी कार सहित नजर आ गए। छोटे भाई नें कहा की काल करे सो आज कर, तो हमने उनसे तत्काल, रुकते ही । इस बारे में बात की व कार चलाने सीखने की इच्छा जाहिर की। हमने कहा की दो ग्राहक एक साथ हैं कुछ कन्सेशन तो करो भाई । वे भी जेसे हमारे लिये ही आए थे उस दिन, उन्होने कहा की कल से शुरु करते हें। पर हमरे छूटके भैया ने पुछा की क्या आप आज फ्री नहीं हें क्या ? तो उन्होने सोचते हुए कहा,कि आ जाओ फिक्स एक घन्टे के बाद यहीं जे.के. मोड पर।

हम दोनो भाई तो जैसे एक एक पल गिन रहे थे। थोडी ही देर में नियत स्थान पर पहुंच गए व कार में सबसे पहले ड्राईविंग सीट को हासिल किया  हमने। उन्होने कहा की पहला दिन सिर्फ थ्योरी का है,. सब कुछ बताया उन्होने कि गियर केसे पडते है, हेन्ड ब्रेक का क्या काम होता है, कार पार्क केसे करते है, चालू बन्द करना, ब्रेक फेल होने पर क्या करे आदि काफी कुछ।

फिर दुसरे दिन से असली मजा चालू हुआ, हम दोनो ने एक एक करके सबसे पहले स्टीयरिंग व्हील पर अपना हाथ साफ किया, उस दौरान ब्रेक, गियर, क्लच सब ट्युटर के हाथ में ही थे। बडा मजा आया था। फिर अगले दिन ब्रेक, एक्सीलेटर व क्लच का उपयोग करने के साथ साथ स्टीयरि्ग पर केसे हाथा जमाने हैं यह सीखाया गया। तीसरे दिन से तो हम दोनो ने गियर डालना, स्टीयरि्ग सभांलना ब्रेक, क्लच, एक्सीलेटर का प्रयोग करना आदि की प्रेक्टीस की जो काफी दिन तक चली । फिर कुछ दिन के बार रिवर्स करना व चढ़ाई व ढ़लान पर केसे चलाएँ आदि का अभ्यास किया। लगभग तीसरे या चोथे दिन तो हम एसे कार चला रहे थे, की जेसे सब कुछ सीख चुके हें। ट्युटर महोदय नें भी आश्चर्य व्यक्त किया कि ये दोनो अच्छी लगन से व काफी जल्दी सब कुछ सीख रहें हें।

पहले खाली खाली सडकों पर व फिर बाद में आम रास्तों पर , उसके बाद हाई वे पर हमने कार को चलाने में अपने अपने हाथ को जमाया। बडे ही अच्छे दिन थे वो, पर इतने जल्दी निकल गए कि पता ही नहीं चला। किसी ने कहा हे ना की अच्छे दिन जल्दी से निकल जाते है व बुरे दिन तो बडे लम्बे लगते हैं । सोचा की जल्दी ही हम भी बेकार से (कार वाले) भले बनेंगे। पर कार वाले मित्र लोगों को जब हम देखते हें तो सोचते हें कि जेसे हें वो ही ठीक है, कार से सुख सुविधाएँ तो हे ही पर हजार परेशानियां भी तो होती हे । कभी कभी सोचता हुं की दुनिया में आए है तो हमें हर तरह के गेजेट को ओपरेट करना (चलाना)आना बहुत जरुरी है। एकदम जेम्स बांड के माफिक बनने का है अपुन को भी। सुना हे कि अभ्यास से ही हर चीज संभव है, क्या सही हे ये ।

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